तो लीजिये एक बार फिर आ गयी होली | होली का पौराणिक महत्व
पर चर्चा करना तो आप पाठकों से साथ नाइंसाफी होगी |
आज मै आम आदमी और इस पर्व की विसंगतियां पर कुछ प्रकाश
डालना चाहता हूँ |
(१) यह पर्व अधिकतर उस माह में पड़ता है जिस माह का वेतन किसी
सरकारी कर्मचारी को नहीं मिलता है |
(२) अगर गलती से दुसरे माह में पड़ भी जाये तो उस माह का वेतन
आयकर की कटौती के बाद कुछ नहीं बचता है |
(३) यह पर्व उस माह में पड़ता है जब बच्चों की परीक्षाएं चल रही होती है |
फिर भी एक आम आदमी इस पर्व को धूमधाम से मनाता है | और इसकी
मस्ती में इतना डूब जाता है की अपने आप को भी भूल जाता है|
रंग से पुते चेहरे, फटे हुए कपड़ों में, नशे में धुत्त आप किसी सभ्य सुशिक्षित
बर्ग के आदमी को आसानी से पा सकते है | वह जोर जोर से चिल्ला रहा
होगा की होली है ....रंग बिरंगी होली है ...
क्या आपने किसी को दिवाली है या दशहरा है या रक्षाबंधन है चिल्लाते हुए देखा
दीवाली है ...या दशहरा है... तो निसंदेह आपका उत्तर होगा नहीं | यही तो इस त्यौहार की विशेषता है |
अंत में
दिल में भरी उमंग हो
बोतल में भरी भंग हो
मजा कुछ और बढ़ जाये
यदि कवियों का संग हो |
आप सभी को होली की शुभकामनायें