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बुधवार, अक्टूबर 01, 2014

मेरा सूरज

मेरी छत पर आकर सूरज
क्यों ? जल्दी ढल जाता है |

उगते सूरज की पहली किरण ,
जब मेरे आँगन में पड़ती है |
फटा बिछौना टूटी खटिया ,
यही तो उसको दिखती है |

धीरे धीरे तपता  सूरज ,
जब मेरी रसोई में आता है |
खली बर्तन ,ठंडा चूल्हा ,
और नहीं कुछ वह पाता है |

लिए लालिमा सूरज ,
जब मेरी खिड़की पर आता  है|
बूढ़ी माँ का पीला चेहरा ,
शायद वह देख ना पाता है |

इसी लिए तो मेरी छत पर ,
आकर सूरज जल्दी से ढल जाता है |


बुधवार, अप्रैल 03, 2013

कवि की मज़बूरी ....

मेरे एक मित्र का फोन आया कि आप तो कवि  हैं एक जल्दी से हमारे विद्यालय के 
वार्षिक उत्सव पर कविता लिख कर मेल कर दो, समय दिया केबल एक घंटे का ...
पत्नी ने धिक्कारा ऐसे तो कवि बने फिरते  हो एक काम नहीं कर सकते 
हमारे अन्दर का कवि जग उठा और पंद्रह मिनट में रच डाली मज़बूरी की कविता ....


विद्या का यह  मंदिर हैं 
डॉन बास्को इसका नाम 
ज्ञानार्थ प्रवेश हैं इसमें 
और सेवार्थ प्रस्थान । 

गुरुओं का सम्मान सिखाते 
चरित्र निर्माण का पाठ  पढ़ाते 
अध्ययन अपना पूरा करके 
विधार्थी बनता अच्छा इन्सान । 

विद्या का यह  मंदिर हैं 
डॉन बास्को इसका नाम 
 

माता  पिता की सेवा करते 
गुरुओं का सम्मान वह करते 
निर्बल पर अन्याय ना करते 
रखते  सबका पूरा ध्यान । 

विद्या का यह  मंदिर हैं 
डॉन बास्को इसका नाम 

हरे भरे हैं खेत यहाँ पर 
मिला हो जैसे प्रकृति का वरदान 
रंग बिरंगे फूल  देख कर 
आती चेहरे  पर मुस्कान । 

विद्या का यह  मंदिर हैं 
डॉन बास्को इसका नाम 
ज्ञानार्थ प्रवेश हैं इसमें 
और सेवार्थ प्रस्थान ।  


कैसा लगा यह मज़बूरी का प्रयास 

मंगलवार, नवंबर 20, 2012

यही सत्य हैं.....

आज बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर आया हूँ ।अपनी एक पुरानी  रचना ले कर , जो मेरी पसंद की हैं ।
आशा करता हूँ आपको भी पसंद आएगी ।

 यही सत्य हैं....

झाँक कर देखा खिड़की से
उमड़ते हुए बादलों को
दौड़ कर आँगन में आया | 
और आकाश में बादलों का एक झुंड पाया | 
और शुरू हो गया तलाश का,
एक अंतहीन सिलसिला
अचानक खिल उठा चेहरा |
और प्रसन्न हुआ अंतर्मन
क्योंकि मिल गयी थी मुझे ,
मुन्नी की गुड़िया और पत्नी का कंगन
फिर अचानक कुछ सोंच कर डर गया ।
यथार्थ के धरातल पर गिर गया |
दौड़ कर अन्दर आया
बंद कर ली खिड़की और दरवाजे
कहीं भिगो न दे यह,
मेरे तन का एकमात्र कपड़ा |


सोमवार, अगस्त 13, 2012

यह भी एक बेटी है ......






बेटी बचाओ 

बेटे और बेटी में ,
भेद मत कीजिये |
बेटियों को जीने का
अधिकार आप दीजिये |
इंदिरा और कल्पना की,
उड़ान तुमने देखी है |
अब अपनी सायना की
शान अब देखिये |
एक दिन नाम यह
तुम्हारा कर जाएँगी
बस एक बेटी घर में
पाल के तो देखिये

(आज एक पूर्व प्रकाशित रचना) 

सोमवार, अप्रैल 16, 2012

मैन इज सोशल ए एनीमल.....

मैन इज सोशल ए एनीमल यह पंक्तियाँ आजकल मुझे अक्सर याद आतीं हैं और किसी  
हद तक बहुत सार्थक प्रतीत होती हैं इसकी एक छोटी से बानगी यहाँ देखिये ।


पहले हम कुत्ते की तरह भौंकतें हैं ।
जब कोई शेर की तरह दहाड़ता है 
हम भींगी बिल्ली बन जाते हैं ।
और चूहे की तरह अपने बिल में घुस जातें हैं ।
शायद इसीलिए हम सामाजिक प्राणी कहलाते हैं ।


दूसरों के धन पर गिद्ध द्रष्टि डालते हैं 
अपने धन पर साँप की तरह कुंडली मार कर बैठते हैं
लोमड़ी की तरह चालाकी करके दूसरों के धन को 
मौका पाते ही हम अजगर की तरह निगल जाते हैं
शायद इसीलिए हम सामाजिक प्राणी कहलाते हैं ।



बुधवार, मार्च 21, 2012

असफल प्रयास.......





आँखों से छलका ।
एक आंसू ,
पलकों ने किया 
असफल प्रयास
गिरने से, रोकने का ।
बचाने का , 
उसके अस्तिव को  ।
अंतत  ,
वह गिर गया  ।
संवेदनहीनता की ,
रेतीली ज़मीन पर।  

शनिवार, मार्च 10, 2012

पेट की तपिश

ठंडे चूल्हे ने ,
मुस्कराते हुए
ख़ाली पतीली से पूछा ?
आज कब आओगी ।
और  क्या पकाओगी ?
और सूखी लकड़ियों ने
ख़ुशी मनाई ।
आज वह जलने से ,
बच गयीं  ।
पतीली ने मेरी तरफ,
शरमाते हुए देखा ।
और आ  लगी
मेरे जलते हुए पेट से ।

रविवार, फ़रवरी 19, 2012

मानव और नदी ............




एक नदी 
पहाड़ों से निकली 
पत्थरों से टकराकर 
राह बदल कर 
नए नए नाम  पाकर 
हंसती कूदती ,
जा मिली 
प्यार के सागर में ।
और एक मानव ,
पाषाण युग से 
निकल कर ।
कंक्रीट के जंगल में रह कर 
बन गया पत्थर , 
खो गया ,
पुन: पथरीली अँधेरी गुफाओं में ।


गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

एक कुत्ते की व्यथा (व्यंग्य)........

एक दिन हमनें ,
अपने शहर की सोती हुई पुलिस जगा दी ।
सौ रुपये देकर ,
थाने में एक हजार की रिपोर्ट लिखवा  दी ।
शाम को पुलिस हमारे घर आई 
साथ में एक  कुत्ता भी लायी ।
कुत्ते ने हमें सूंघा, और हमारे घर को देखा ।
कुत्ता बोला आप हमारे, 
बेईमान होने का फायदा उठाते हो।
अपने शान बढ़ाने के लिए 
चोरी की झूठी रिपोर्ट लिखाते हो । 
तभी उस कुत्ते के अन्दर का कुत्ता जागा।
सीधा थाने की तरफ भागा।
जिसे देख कर हमारा आत्मविश्वास भी जागा ।
यह क्या ! वह लौट कर बापस आया और बोला 
आप क्या सोंचते हैं ?
मै क्या, थानेदार की गिरफ्तारी करूँगा ।
मैंने तो पुलिस का नमक खाया हैं ।
मै क्या? नमकहरामी करूँगा ।
आज मै अपने ओहदे का इस्तेमाल करूँगा ।
इन सडक पर बैठे हुए,
भिखारी को जेल के अंदर करूँगा।
वर्षों से यह हमारे हक मार जाते हैं 
कचरे में पड़ी हुई रोटी
हमसे पहले मार जाते हैं ।
बात रोटी तक तो, हम सहन करते हैं ।
पर अब तो यह हमारा और हमारी नस्ल का
यह अपमान करते हैं ।
अपने को इंसान कहते हैं ।
पर हमारी तरह जीते और हमारी तरह मरते हैं । 

  

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

यह कैसा पथ ........

एक पथ पर 
एक पग आगे बढ़ा कर ,
एक द्रष्टि 
जब मैं पीछे डालता हूँ ।
क्यों पाता हूँ ?
अपने को नितांत अकेला ।
क्यों नहीं सुनाई देता 
ध्वनि का मधुर कोलाहल ,
क्यों नहीं दिखाई देते 
वह अपने लोग ,
क्यों फैला है दूर तक ,
नीरवता का अंतहीन साम्राज्य ।
ढेर सारे उत्तरविहीन,
प्रश्नों का अम्बार।
एक बार पुन: 
सोंचने पर लाचार।
क्यों चुना मैंने यह पथ !
जो कहाँ जाता हैं ?
जिस पर एक पग चल 
व्यक्ति अपनों से 
कितना दूर हो जाता हैं ।



रविवार, दिसंबर 25, 2011

नारी के रूप और चेतावनी ........


बेटी जो पुकारोगे तो,
गले में झूल जाएगी |
बहन जो बनाओगे तो,
राखी बांध जाएगी |


पत्नी जो मानोगे तो,
यह प्यार बरसायेगी|
समझोगे माँ इसे  तो,
आँचल में छिपाएगी |


खिलौना जो समझोगे तो, 
यह खेल भी दिखाएगी   |
पर  खेल ही खेल में,
यह प्राण हर जाएगी |




गुरुवार, दिसंबर 22, 2011

काश !

चौराहे पर खड़ा 
एक मोटर साईकिल सवार| 
कर रहा था 
हरी बत्ती का इंतज़ार|
पड़ोस में खड़ी थी एक कीमती कार,
आधी खुली  खिड़की से कुत्ते का बच्चा
झाँक रहा था बाहर|
वह सवार, उस कुत्ते के बच्चे को ,
निहार रहा था बार बार 
कर रहा था उसको दुलार |
तभी पीछे से आवाज़  आई
भूखा हूँ दे दो कुछ मेरे भाई|
वह जानता था उसकी किस्मत में ,
गालियाँ  के सिवा खाने को कुछ नहीं है |
मगर प्रयास करने में जाता कुछ नहीं हैं |
कुत्ते के बच्चे की मिल रहा था, 
प्यार और दुलार| 
और उसको मिल रहीं थीं ,
गालियाँ और दुत्कार |
गाड़ियाँ चली गयीं थी 
बत्ती हरी हो गयीं थी |
कुछ सोंच कर मुस्कराया 
और मुंह से निकला  काश ! 

सोमवार, दिसंबर 19, 2011

बाल विवाह एक अभिशाप .........




गुड्डे और गुड़ियों का
व्याह जो रचाती है |
अगले ही पल वह ,
ख़ुद दुल्हन बन जाती हैं |

 जो पिता नहीं कह पाती, 
वह पत्नी क्या कहलाएगी | 
जो दूध अभी पीती है, 
वह दूध क्या पिलाएगी |

नाम तो दिया हैं तुमने,
इसको कन्यादान का| 
और दान दे दिया ,
 एक कन्या की जान का |

(चित्र गूगल के सौंजन्य से )

गुरुवार, दिसंबर 15, 2011

एक नवोदित कवि का दर्द......( व्यंग्य)

आज एक पूर्वप्रकाशित रचना प्रस्तुत है कारण यह है कि यह रचना मेरे उस समय की है |
जब मेरे ब्लॉग पर पाठकों कि संख्या बहुत कम होती थी|   

जब हम कविता लिख रहे होते है तब हम शब्द पकड़ते है| 
जब रचना लिख चुके होते है तब श्रोता पकड़ते है |
इस धर पकड़ के खेल का अंत तब हो जाता है |
जब किसी नवोदित कवि की पकड़ में कोई श्रोता आ जाता है  |
जब वह कवि श्रोताओं के पकड़ने की कला में पारंगत हो जाता 
तब जाकर किसी कवि-सम्मलेन का निमंत्रण पाता  है |
कवि-सम्मेलन में सबसे पहले सरस्वती वंदना की बारी आती है |
पहले एक कवयित्री  सरस्वती वंदना करती है |
फिर चार रचनाओं के बाद भी बंद  ना करती है |
नवोदित कवि हर रचना पर ज़ोर से ताली  बजाता है |
अपने मंच पर होने की याद, संचालक को दिलाता है |
तब जाकर वह कवि मंच पर पुकारा जाता , 
और देशी तमंचे की तरह एक फायर करके वापस आता है |
फिर मंच पर एक स्थापित कवि आता है |
वह मशीन गन की तरह फायर पे फायर करता जाता है |
कार्यक्रम के बाद स्थापित कवि को चेक थमा कर ,
कार में बिठाया  जाता है |
और नवोदित कवि को धन्यवाद दे कर, 

उसके रूट की  बस का नंबर बताया जाता है |
थका हारा कवि घर आता है |

मेज पर पड़े हुए संपादक के खेद सहित पत्रों को 
अपना मुंह चिढ़ाता हुआ पाता है |
आज वह अपनी रचनाओं को निठ्ल्लें पुत्र के समान पाता है |
अपने भविष्य के बारे में सोंच कर वह वर्तमान में मर जाता है |




सोमवार, दिसंबर 12, 2011

ऐसी अपनी इच्छा हैं.........

अपने उर के स्पंदन को,
बस जीवन मैंने मान लिया|
अपने उर के क्रंदन को
गीतों का मैंने नाम दिया| 
रुके साँस के साथ कलम भी 
ऐसी अपनी इच्छा हैं |
पटाक्षेप ही जीवन नाटय का, 
देगा हमको इसका उत्तर|  
चली है उसकी अपनी मर्जी,  
या मेरी इच्छा को मान लिया| 

शनिवार, नवंबर 05, 2011

व्यर्थ आंसू .......




मत बहाओ,
व्यर्थ
तुम अपने  यह आँसू |
ना ही कोई
दया का सागर उमडेगा
और ना ही कोई ,
आएगा
भावनाओं का सैलाब |
क्योंकि
गिर रहे हैं
तुम्हारे यह आँसू
संवेदनहीनता  की रेत पर|
 
 

मंगलवार, नवंबर 01, 2011

टुकड़ों -टुकड़ों में बँटी हुई ज़िन्दगी......


टुकड़ों -टुकड़ों में 
बँटी हुई यह जिन्दगी |
हर एक  टुकड़ा 
मांगता है अपना हिसाब 
मजबूर हूँ तलाशने को ,
उनके लिए रोज़ , 
नये नये जबाब| 
अपने दायित्वों का, 
बोझ में बदल जाना |
जिन्दगी की रफ़्तार को 
कुछ और कम कर जाना |
थकें मांदें सूरज का 
झूठा आश्वासन 
कल नया सूरज देगा, 
एक नया जीवन |
अब बन चुका है 
एक  चक्र ,
मन के सन्नाटे में, 
गूंजता है केवल एक प्रश्न |
क्या यही है जीवन ?
सुनाई पड़ती है प्रतिध्वनि
हाँ यही है जीवन ..............



मंगलवार, अक्टूबर 18, 2011

एक पिता की चिंता .........




कूद कर मेरी बेटी का 
गोद में बैठ जाना 
गलें  में बाहें डाल कर ,
कुछ माँगना
और हँसकर,मेरा उसकी ,
 मांग को पूरी करना |
मगर आज, माँगा है उसने ,
सलवार और कुर्ता,
फ्राक के बदले |
क्योंकि वह हो गयी है बड़ी|
अचानक मेरा ,
गहरी सोंच में डूब जाना   
डर कर सहम जाना |
उसे इस वहशी समाज ,
 से कैसे है बचाना ?


शनिवार, अक्टूबर 15, 2011

ठूँठ और झाड़ी.........



झाड़ी की कुटिल मुस्कान 
और ठूंठ पर कटाक्ष ,
क्या मिला तुमको ?
सह कर आँधियों के  थपेड़े ,
और मौसम का कहर |
बढ़ना सूखना और टूट कर गिरना ,
यही था तुम्हारा जीवन चक्र 
फिर लकड़हारों की टोलियों का 
तुम पर टूट पड़ना |
पल भर में ,
बना देना तुम्हें एक ठूँठ |
और मैं हंसती खेलती हूँ 
हवाओं के साथ आज भी |
ठूँठ की मधुर मुस्कान,
और दिया झाड़ी को उत्तर   
मैंने दिया , निमंत्रण पास आने का 
पथिकों को छाया 
और परिंदों को आशियाँ |
और तुमने दिया भय, 
काँटों के चुभने का 
और सबको तुमसे दूर रहने का |


शनिवार, अक्टूबर 01, 2011

रिश्तों का सोफ्टवेयर














रिश्तों की फाइल से, 
बना है परिवार का फोल्डर |
क्यों नहीं होता ओपन ?
क्या लगा है कोई वायरस |
मंथन के एंटीवायरस से 
स्केन करने पर पाता हूँ ,
रिश्ते की एक फाइल में 
अहंकार का वायरस |
रिमूव  करने के
कई  असफल प्रयास ,
और पूरी फाइल को डिलीट करने का 
अंतिम निर्णय |
मगर  फिर हो जाता हूँ असफल ,
क्योंकि मेरे ह्रदय के सिस्टम में
इंस्टॉल है ,
प्रेम और आत्मीय संबंधों का 
एक सोफ्टवेयर   .............