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रविवार, अगस्त 18, 2013

आम आदमी


तुमको तुम्हारे शहर की 
सड़कों पर पड़ी ,
जिन्दा लाशों की कसम 
मत डालना तुम ,
इन पर झूठी सहानुभूति का कफ़न 
इनको यूँही पड़ा रहने दो 
चीखने दो चिल्लाने दो 
तुम्हारी सभ्यता की कहानी 
इनको ही सुनाने दो 
सड़क पर पड़े हुए यह लोग 
हमारे बहुत काम आते है |
तभी तो हमारे राजनेता 
इनके भूखे नंगे तपते हुए पेटों पर 
राजनीति की रोटियां सेंक जाते है |
इनको तरह तरह से  
उपयोग में लाया जाता है |
कभी राम कभी अल्लाह के नाम पर ,
इनका  ही  तो खून बहाया जाता है 
और कभी कभी अपनी सियासत, 
चमकाने और ताकत दिखाने के लिए 
इन आम आदमियों के नाम पर 
भारत बंद बुलाया जाता है | 
चुनावों के समय हम ,
इनको आम जनता कहते है |
और फिर आने वाले चुनावों तक ,
आम की तरह चूसते रहते है |
यह रोते है तो रोने दो 
मत जगाओ, सोने दो |
जिस दिन यह सोता हुआ, 
आम आदमी जाग जायेगा ,
उस दिन से संसद का रास्ता 
बहुत कठिन  हो जायेगा |


(यह रचना आज के समय में बहुत ही सार्थक प्रतीत होती है । इस लिए 
इसको पुन: प्रकाशित कर रहा हूँ )


रविवार, दिसंबर 30, 2012

एक पिता कि चिन्ता .....





कूद कर मेरी बेटी का 
गोद में बैठ जाना 
गलें  में बाहें डाल कर ,
कुछ माँगना
और हँसकर,मेरा उसकी ,
 मांग को पूरी करना |
मगर आज, माँगा है उसने ,
सलवार और कुर्ता,
फ्राक के बदले |
क्योंकि वह हो गयी है बड़ी|
अचानक मेरा ,
गहरी सोंच में डूब जाना   
डर कर सहम जाना |
उसे इस वहशी समाज ,
 से कैसे है बचाना ?


(पुन: प्रकाशित) 

मंगलवार, मई 08, 2012

आख़िर ऐसा क्यों हुआ ...............

उसका नाम था अनुपमा , देखने में आकर्षक व्यक्तिव और उम्र लगभग चालीस साल परिवार 
के नाम पर दो बच्चे और पति ।वह एक निजी कंपनी में स्टेनो के पद पर कार्य करती थी ।
उसके पति एक कंपनी में इंजिनियर थे ।अच्छा वेतन, कोठी, कार,या यूँ कहें की खुश रहने    के मापदंडों के काफी करीब था वह परिवार .......अनुपमा के परिवार में दो छोटी 
बहिनें मां  और पिता जी मान एक स्कुल में अध्यपिका थीं और पिता जी आर्मी के 
रिटायर कैप्टन जो पेंशन  के साथ साथ शराब की आदत भी अपने साथ लाये थे । रोज़ 
किसी ना किसी बहाने से मां  के साथ लड़ाई गाली  गलौज होना निश्चित था ।या यूँ कहें 
यह  भी दिनचर्या का एक हिस्सा था ।यह देख कर अनु को बहुत कोफ़्त होती थी क्या दो 
चुटकी सिंदूर मांग में भर देने से पुरुष को अत्याचार करने का अधिकार यह समाज क्यों 
दे देता हैं। उसे सबसे ज्यादा गुस्सा अपनी माँ पर आता जो रात की पिटाई को सुबह भूलने 
की आदी हो चुकी थी उस पर निर्जल व्रत रख कर सज धज कर करवाचौथ के दिन उसकी 
आरती उतारती .....मैं अनुपमा की पति को जानता  था एक हंसमुख इंसान जो हर बात 
पर जोक सुनाता हो और शेर ओ शायरी में अच्छी दखलंदाजी रखता हो ।अनुपमा की सारी 
बातें उसी ने मुझें बताई थीं ।
एक दिन अनुपमा मुझे मिली वह थोड़ी उदास लग रही थी मैंने पूछा "क्या बात हैं कुछ 
झगडा हुआ क्या ? वह बोली क्या  बताऊँ भाई साहेब मुझे ऐसा लगता हैं कि आजकल 
वह मुझे इग्नोर कर रहें  हैं।यह मैं किसी कीमत पर सहन नहीं कर सकती और वह गुस्से 
में कापने लगी । मैंने किसी तरह समझा बुझा कर घर भेजा और अगले दिन उसके पति 
से बात करने का मन बना लिया ।ऑफिस में इधर उधर की बात करने के बाद मैंने उससे 
अनुपमा की बात की वह अचानक ही संजीदा हो गया और कहने लगा तुमको तो मालूम ही 
हैं आजकल मंदी चल रही हैं और मेरी नौकरी गए हुए एक महिना हो गया यह बात मैंने 
अनु को नहीं बताई ।कल ही उसको बताया की मेरी नौकरी चली गयी उसने हंस कर कहा 
यह तुम्हारी समस्या है जिसका हल तुम्हें निकालना  हैं। मैं कुछ नहीं जानती ।
          कुछ दिनों बाद मेरे दोस्त से फिर मुलाकात हुई मैंने हालचाल पूछा उसने 
कहा सब ठीक हैं  पर अनु मुझे छोड़ कर चली गयी । मै सन्न रह गया ।
उसने हंस कर कहा यार एक शेर नहीं सुनोगे 
बागबां  ने जब लगायी मेरे नशेमन में आग़ 
जिनपे तकिया था वही  पत्ते हवा देने लगे ।
एक बार फिर वह हंस कर बोला दाद नहीं दोगे मै  स्तब्ध था और निशब्द .......

       
 ( पुन: सम्पादित रचना ) 
                 
      

मंगलवार, मई 01, 2012

शुक्र है कि टौमी बच गया ....(लघुकथा)

चमचमाती कार बंगले  के अन्दर तेज़ गति से घुसी और अचानक ही ड्राइवर ने  ब्रेक लगा 
कर कार रोक दी क्योंकि कार के आगे साहेब का विदेशी कुत्ता टौमी आ गया था ।
ड्राइवर ने किसी तरह टौमी को बचा दिया ।मगर इस हादसे में घर में काम करने वाली 
आया का चार साल के  बच्चे  को चोट आ गयी ।साहेब ने जल्दी से कार से उतर कर  
आये और आया  को सौ रुपये दिए और कहा जाओ इसकी मलहम पट्टी करवा लो ।
थोड़ी देर बाद घर कें अंदर सबके चेहरे  खिले हुए थे और जुवान पर एक बात थी ।
भगवान का शुक्र है कि टौमी बच गया ...... 


सोमवार, अप्रैल 16, 2012

मैन इज सोशल ए एनीमल.....

मैन इज सोशल ए एनीमल यह पंक्तियाँ आजकल मुझे अक्सर याद आतीं हैं और किसी  
हद तक बहुत सार्थक प्रतीत होती हैं इसकी एक छोटी से बानगी यहाँ देखिये ।


पहले हम कुत्ते की तरह भौंकतें हैं ।
जब कोई शेर की तरह दहाड़ता है 
हम भींगी बिल्ली बन जाते हैं ।
और चूहे की तरह अपने बिल में घुस जातें हैं ।
शायद इसीलिए हम सामाजिक प्राणी कहलाते हैं ।


दूसरों के धन पर गिद्ध द्रष्टि डालते हैं 
अपने धन पर साँप की तरह कुंडली मार कर बैठते हैं
लोमड़ी की तरह चालाकी करके दूसरों के धन को 
मौका पाते ही हम अजगर की तरह निगल जाते हैं
शायद इसीलिए हम सामाजिक प्राणी कहलाते हैं ।



गुरुवार, दिसंबर 22, 2011

काश !

चौराहे पर खड़ा 
एक मोटर साईकिल सवार| 
कर रहा था 
हरी बत्ती का इंतज़ार|
पड़ोस में खड़ी थी एक कीमती कार,
आधी खुली  खिड़की से कुत्ते का बच्चा
झाँक रहा था बाहर|
वह सवार, उस कुत्ते के बच्चे को ,
निहार रहा था बार बार 
कर रहा था उसको दुलार |
तभी पीछे से आवाज़  आई
भूखा हूँ दे दो कुछ मेरे भाई|
वह जानता था उसकी किस्मत में ,
गालियाँ  के सिवा खाने को कुछ नहीं है |
मगर प्रयास करने में जाता कुछ नहीं हैं |
कुत्ते के बच्चे की मिल रहा था, 
प्यार और दुलार| 
और उसको मिल रहीं थीं ,
गालियाँ और दुत्कार |
गाड़ियाँ चली गयीं थी 
बत्ती हरी हो गयीं थी |
कुछ सोंच कर मुस्कराया 
और मुंह से निकला  काश ! 

सोमवार, दिसंबर 19, 2011

बाल विवाह एक अभिशाप .........




गुड्डे और गुड़ियों का
व्याह जो रचाती है |
अगले ही पल वह ,
ख़ुद दुल्हन बन जाती हैं |

 जो पिता नहीं कह पाती, 
वह पत्नी क्या कहलाएगी | 
जो दूध अभी पीती है, 
वह दूध क्या पिलाएगी |

नाम तो दिया हैं तुमने,
इसको कन्यादान का| 
और दान दे दिया ,
 एक कन्या की जान का |

(चित्र गूगल के सौंजन्य से )

गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

फिर यह क्यों ना बदला ..........


हम  बदले , तुम बदले 
जग बदला , सब बदला 
फिर यह क्यों ना बदला  
अब भी यही कहानी है| 
 भैया का तो नया है नेकर 
 बहन की फ्राक पुरानी हैं| 


(चित्र गूगल के सौन्जय से )

शनिवार, अक्टूबर 22, 2011

कल आज और सच्चाई .....





कल 

कल सरेआम लुटी  थी  एक अस्मत ,
जो काफ़ी थी इंसानियत के शर्मसार के लिए |

और तरस कर पथरा गयीं आँखें उसकी,
देखने को बस एक अदद मददगार के लिए |

आज 

कल जो तमाशायी भीड़ का हिस्सा  बने थे लोग ,
वह आज सुना रहें हैं सज़ा गुनहगार के लिए |

कुछ कलम के सिपहसालार भी खुश हो कर घूमते है, 
अच्छी ख़बर मिली है कल के अख़बार के लिए |

सियासत के एक हलके को मुद्दा भी मिल गया ,
कल वह मुश्किल खड़ी करेंगे सरकार के लिए |

कुछ मजलिस ए खवातीन भी सड़कों पे आ गए 
मौका मिला था उनको अपने इश्तहार के लिए |

जो मुफ़लिसी के दौर से गुजर रहा था आजकल ,
कुछ राहत सी मिल गयी थी उस थानेदार के लिए |


सच्चाई 

हाँलाकि यह हादसा सब को कुछ ना कुछ दे गया, 
और बस एक ज़ख्म दे गया किसी खुद्दार के लिए | 




(चित्र गूगल के सौंजन्य से ) 

मंगलवार, अक्टूबर 18, 2011

एक पिता की चिंता .........




कूद कर मेरी बेटी का 
गोद में बैठ जाना 
गलें  में बाहें डाल कर ,
कुछ माँगना
और हँसकर,मेरा उसकी ,
 मांग को पूरी करना |
मगर आज, माँगा है उसने ,
सलवार और कुर्ता,
फ्राक के बदले |
क्योंकि वह हो गयी है बड़ी|
अचानक मेरा ,
गहरी सोंच में डूब जाना   
डर कर सहम जाना |
उसे इस वहशी समाज ,
 से कैसे है बचाना ?


शनिवार, अक्टूबर 01, 2011

रिश्तों का सोफ्टवेयर














रिश्तों की फाइल से, 
बना है परिवार का फोल्डर |
क्यों नहीं होता ओपन ?
क्या लगा है कोई वायरस |
मंथन के एंटीवायरस से 
स्केन करने पर पाता हूँ ,
रिश्ते की एक फाइल में 
अहंकार का वायरस |
रिमूव  करने के
कई  असफल प्रयास ,
और पूरी फाइल को डिलीट करने का 
अंतिम निर्णय |
मगर  फिर हो जाता हूँ असफल ,
क्योंकि मेरे ह्रदय के सिस्टम में
इंस्टॉल है ,
प्रेम और आत्मीय संबंधों का 
एक सोफ्टवेयर   .............





बुधवार, जून 15, 2011

रिश्तों का महल

सहमीं है आज,
रेतीली बुनियाद पर खड़ीं 
रिश्तों की कच्ची दीवारें|
समाया है डर मन में ,
अमीर-गरीब और, 
छोटे बड़े के आघात का|
एक पल में बिखर जाने का 
एक घर के,
खंडहर में बदल जानें का|
एक उनके प्यार की 
कहानी सुनाएगा |
तो दूसरा उनकी,
बर्बादी की याद दिलाएगा |

शनिवार, मई 28, 2011

मुझे जबाब चाहिए


 बात आज से लगभग बाईस तेईस साल पुरानी है हमारे पड़ोस में एक  ऍम . के . वशिष्ठ  नाम 
 के व्यक्ति रहते थे |उनके यहाँ जब दूसरी कन्या ने जन्म लिया तो आस पड़ोस के लोग शोक 
 मिश्रित बधाई देने पहुँचने लगे | कोई कहता की घर में लक्ष्मी आयी है | किसी का कहना था 
 की बेटी और  बेटे में कोई फर्क नहीं ,कुछ लोग तो एक कदम आगे बढ़ कर उनकी बेटियों की 
 तुलना इंदिरा  गाँधी से भी कर देते थे |
समय बीतता गया वशिष्ठ जी ने अपनी छोटी सी नौकरी में ही उन दोनों को शिक्षा दिलाई |
हाँ  ! इस बीच उनकी पत्नी का समुचित इलाज ना होने के कारण लम्बी बीमारी के बाद देहांत  
 हो गया |  वशिष्ठ जी ने हिम्मत नहीं हारी और ना ही उनकी बेटियों ने उन्हें निराश किया|
उच्च शिक्षा प्राप्त कर जल्दी ही अच्छी नौकरी भी कर ली | पिता ने सुयोग्य वर देख कर उनका
विवाह करके अपने को निवृत कर लिया | और रह गए नितांत अकेले ................
बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ ने उनको अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया | जैसे बेटी को सूचना
मिली तुरंत ही अपने घर ले जाकर उनका इलाज करवा कर अपने घर दो महीने रखा |
इस बीच उनके मिलने वाले आकर उनका हाल चाल पूछते और उनको सामाजिक मान्यताओं
का वास्ता दे कर समझाते कि" कन्यादान के बाद कन्या के घर का पानी भी ग्रहण नहीं करना
चाहिए यह पाप नहीं घोर पाप है "| अत: बेटी के मना करने के बाद भी जिद करके अपने घर
चले आये | कुछ दिनों के बाद फिर बीमार पड़े अब मोहल्ले वाले आकर दया दिखाते और
 कहते अच्छा होता कि एक बेटा होता !कोई उन्हें ओल्ड एज होम जाने कि सलाह देता |
 मगर बेटियां  इसको मानने को तैयार नहीं थीं | इसी कशमकश में कुछ दी बीत गए अब वह
  कहाँ जाएँ | अचानक एक दिन वह कहाँ चले गये, किसी को नहीं मालूम, उनकी तलाश जारी
 है  | और इस प्रश्न के उत्तर की भी तलाश है उन्हें कहाँ जाना चाहिए ?