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रविवार, दिसंबर 30, 2012

एक पिता कि चिन्ता .....





कूद कर मेरी बेटी का 
गोद में बैठ जाना 
गलें  में बाहें डाल कर ,
कुछ माँगना
और हँसकर,मेरा उसकी ,
 मांग को पूरी करना |
मगर आज, माँगा है उसने ,
सलवार और कुर्ता,
फ्राक के बदले |
क्योंकि वह हो गयी है बड़ी|
अचानक मेरा ,
गहरी सोंच में डूब जाना   
डर कर सहम जाना |
उसे इस वहशी समाज ,
 से कैसे है बचाना ?


(पुन: प्रकाशित) 

मंगलवार, सितंबर 04, 2012

कैसे कैसे लोग........

टैक्सी ड्राईवर ने स्टेशन के सामने जाकर गाड़ी पार्क कर दी । साहब ने गाड़ी का मीटर देखा 
और ड्राईवर पर चिल्लाने लगे तुम लोग हेरा फेरी करे बिना नहीं मानते इतना मीटर कैसे 
आ सकता हैं । ड्राईवर ने मुस्करा कर कहा सर आप मीटर की जाँच करवा सकते हैं हम गरीब जरुर हैं मगर चोर नहीं । चलिए आप दस रुपये कम दे दीजिये । साहब ने जल्दी से 
अपना सामान निकाला और प्लेटफ़ॉर्म की तरफ चल दिए|थोड़ी देर बाद ड्राईवर ने देखा कि 
मेमसाहब का पर्स पीछे की सीट पर पड़ा हैं वह तुरंत उसे लेकर उनके पीछे भागा मगर तब 
तक वह लोग बहुत आगे निकल चुके थे । वह चिंता में था कैसे उनका पर्स उन तक पहुंचे। 
रास्ते  की बातों से उसे इतना तो मालूम पड़ गया था वह लोग मुंबई जा रहे हैं ।मगर कौन 
सी ट्रेन कौन सा कोच यह कुछ भी नहीं पता था ।  प्लेटफोर्म पर पहुँच  कर वह एक एक डिब्बे में झांक झांक कर उन्हें खोजने लगा । आखिर उसने उनको एक एसी कोच में ढूंढ़    
लिया ।पास जाकर बोला " आपका पर्स गाड़ी में रह गया था"। साहब ने खुश हो कर अंग्रेजों 
से उधार लिए दो शब्द उसकी तरफ उछाल दिए" थैंक्स थैंक्स" ।जब वह बहां से जाने लगा 
तो मेमसाब बोली  उसको  रोको पहले देख तो लें कुछ गायब तो नहीं हैं ?  

  

सोमवार, अगस्त 13, 2012

यह भी एक बेटी है ......






बेटी बचाओ 

बेटे और बेटी में ,
भेद मत कीजिये |
बेटियों को जीने का
अधिकार आप दीजिये |
इंदिरा और कल्पना की,
उड़ान तुमने देखी है |
अब अपनी सायना की
शान अब देखिये |
एक दिन नाम यह
तुम्हारा कर जाएँगी
बस एक बेटी घर में
पाल के तो देखिये

(आज एक पूर्व प्रकाशित रचना) 

रविवार, जुलाई 22, 2012

किसकी चली ?


ना हिन्दू की चली ना मुस्लिम की चली ,
तभी तो रमजान में राम और दीवाली में अली ।
किसकी चली ?

 मजहबी दंगे में मेरे  शहर में दो  लाशें   मिली,
 एक लाश  दफ़न हुई और दूसरी जली।
 किसकी चली ?

बना तो दीं  एक सी, मगर तासीर अलग अलग ,
एक नमक का गर्रा तो दूसरी मिश्री की डली ।
किसकी चली ?    

बुधवार, जनवरी 04, 2012

"टिनटिन एक्प्रेस " (लघुकथा)

एक महानगर की सोसाइटी, पाँच अपार्टमेन्ट वह भी तीन मंजिल के   कुल मिला कर एक सामान्य सी
सोसाइटी थी  | उसका वाचमैन जगदीश उसकी पत्नी और उनका बेटा , यह  स्टाफ था सुरक्षा के लिए |
जगदीश जब रात  की ड्यूटी करके सोता तो उसका आठ साल का  बेटा  टिनटिन गेट पर तैनात हो जाता |
बीच बीच में किसी मेमसाब की आवाज सुन कर जाता और उनका कोई छोटा मोटा काम जैसे बाज़ार से
ब्रेड लाना या कोई सब्जी खरीद कर लाना और बदले में उसे मिलता था उनके बच्चों के नाश्ते में बची हुई
ब्रेड या कोई फल |दिन भर एक  बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग भागता रहता था| इस लिए उसका नाम पड़ गया
"टिनटिन एक्प्रेस " यह सब उसकी एक सामान्य दिनचर्या  बन चुकी थी |
एक दिन अचानक टिनटिन दिखाई नहीं दिया| सोसाइटी की सभी औरतों की परेशानी बढ़ती जा रही थी |             आखिर टिनटिन कहाँ चला गया घर का बहुत  सा काम रुका हुआ था |शाम को कुछ औरतें वाचमैन के
घर पहुंची और टिनटिन के बारे में मालूम किया, क्या हुआ उसको ? वह ठीक तो है ना !
टिनटिन की माँ ने बताया की एक साहेब आये थे उन्होंने टिनटिन का नाम एक स्कूल में लिखा दिया है |
वही उसके खाने पीने और फीस का इंतजाम करंगे | और टिनटिन भी खुश है |
सभी औरतें जब घर से बाहर निकलीं तो उनके चेहरे पर खीझ और दिल में गालियाँ थी  उस अनजान
आदमी के लिए ................


शनिवार, सितंबर 24, 2011

जीने का यह अंदाज़.........


जो अपने उसूलों पर, 
अपनी जिन्दगी जी रहा होगा |
जरुर उसका दोस्ताना भी, 
मुफ़लिसी से रहा  होगा |

जब वह इन्सान बनने की,
कोशिश कर रहा होगा| 
जरुर कोई इसको उसका,
पागलपन कह रहा होगा |


मंगलवार, सितंबर 20, 2011

बेटियों पर यह कैसा अत्याचार .......

बेटियों पर हो रहा, 
यह कैसा अत्याचार है |
एक आँख  रो रही है, 
और एक शर्मसार  है |

सृष्टि की रचना तो, 
देवों का उपकार है|
फिर क्यों उस मानव का, 
यह दानव सा व्यवहार है |

लक्ष्मी और दुर्गा का, 
नाम यहाँ पाती हैं|
जो कोख में तो बच गयीं 
फिर यहाँ मारी जाती है|

बेटी चाहे निर्धन की हो 
या हो वह धनवान की|
बेटी चाहे हिन्दू को 
या हो मुसलमान की  
बाज़ारों में बिकती है 
तो बेटी बस इन्सान की| 
और विदेशों में बिकती है जब, 
तो बस इज्ज़त हिंदुस्तान की|  


सोमवार, सितंबर 12, 2011

सीनियर सिटिजन स्पेशल....(.लघुकथा)


बस स्टेंड के पास एक चाय की छोटी सी दुकान जिसमें केवल चाय और बिस्कुट के 
सिवा कुछ भी नहीं इसके अतिरिक्त दो बेंच और अलग अलग भाषाओँ के तीन अख़बार
इन सब का मालिक है शंकर हँसमुख| नाम तो केवल शंकर था हँसमुख तो उसके व्यवहार 
को देख कर इस महानगर के लोगो ने लगा दिया था | शंकर की इंट्री बीस साल पहले  इस 
शहर में छोटू यानि होटल में काम  करने वाले बच्चों  के रूप में हुई थी | आज वह एक तेरह 
 साल के लड़के का बाप है| जिसे ड्रेस पहन  कर और टाई लगा कर स्कुल जाते देख उसकी 
ख़ुशी छिपाए नहीं छिपती | एक पाँच  रुपये का सिक्का शंकर के जेब में हर सुबह रहता बेटे 
की जेबखर्च के लिए या यूँ कहें ज़रूरत के लिए ........
सुबह छ बजे से लेकर नौ बजे तक का पीक आवरऔर उसके बाद शुरू होता घर के बूढ़े लोगों 
का आना जो कोई सामान खरीदने के नाम से निकलते  और एक  कट चाय जिसका नाम
सीनियर सिटिजन स्पेशल रखा था , पी कर, बतियाकर और सभी अख़बारों को 
आराम से पढ़ कर जाते थे | इस बीच में शंकर भी उनसे हाल - चाल पूछ लेता था |
शंकर ने गुप्ता जी से पूछा " साब आजकल शर्मा जी नहीं आ रहे हैं तबियत तो ठीक है ना "
गुप्ता जी ने कहा ऐसी कोई बात नहीं है मै तो रोज उन्हें छत पर अकेले बैठे हुए देखता हूँ |
अचानक एक दिन शर्मा जी दुकान के सामने से निकले तो शंकर ने पूछ ही लिया "क्या बात 
तबियत तो ठीक है सुगर उगर तो नहीं बढ़ा , चाय क्यों बंद कर दी?
शर्मा जी ने जबरदस्ती की मुस्कराहट चेहरे पर लाते हुए कहा भाई मंहगाई बढ़ गयी और 
बेटे ने जेबखर्च बंद कर दिया है |
यह सुनते ही शंकर ने अपनी जेब में पड़े हुए पाँच के सिक्के को जो उसने अपने बटे के जेबखर्च 
के लिए रखा था कस कर भींच लिया ...............
                                                                           
 

रविवार, जुलाई 17, 2011

सहानुभूति, आक्रोश और समझौता ....


गाड़ी ने धीरे धीरे रेंगना शुरू कर दिया था जब  सभी यात्री अपना सामान ठीक से रख चुके | तब शुरू हुआ औपचरिक प्रश्नों का सिलसिला जैसे आप भी यहीं चढ़े है क्या , कहाँ जायेंगे , आजकल तो टिकट मिलना मुश्किल हो गया है , कितने दिन पहले लिया | थोड़ी देर में कुछ  लोगों ने आत्मीयता कि परिधि में प्रवेश करना शुरू कर दिया | आजकल  दहेज़ कि मांग ज्यादा हो आगयी है | सामने बैठी लगभग साठ साल  की  औरत ने प्रश्न किया आपके कितने बच्चे है ?उसने कहा जी दो तुरंत ही उस औरत  ने प्रश्न किया एक लड़का और एक लड़की ? उस आदमी ने कहा जी नहीं दोनों लड़की |  उस औरत ने दयनीय भाव से देखा और सहानुभूति पूर्वक कहा कोई बात नहीं अगली बार लड़का होगा | यह कह कर वह उठ खड़ी हुई शायद उसका स्टेशन आने वाला था | फिर शुरू हुई एक अंतहीन बहस लड़का और लड़की के बीच , कोई कह रहा विचारधारा बदलने कि आवश्यकता है | आजकल कोई फर्क नहीं है | किसी ने अपने दो लड़की बता कर और खुश रहने कि बात कह कर विषय को विराम देना चाहा| कुछ लोग तो लड़कियों के पक्ष में बोल कर अपने को महान सिद्ध कर रहे थे |अचानक गाड़ी  ने तेज आवाज कि शायद पटरी बदल रही थी तभी सामने बैठी एक औरत  उम्र लगभग पेंतालिस साल , जो अब ताक शान्त थी उसने बोलना शुरू किया | क्या आप मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर देंगे ?
       क्या आप अपनी  बीस बाईस साल कि लड़की को रात में अकेले दवाई लेने भेज सकते है ?
       अगर आपकी लड़की स्कूल या कालेज से दो घंटे लेट आये तो  क्या चैन की नींद सो सकते है ?
        बिना दहेज़ की शादी की बात आप क्या सोंच सकते है ?
जिस देश में प्रत्येक पांच मिनट में बलात्कार और प्रतिदिन बहुओं को जलाने की परंपरा बन चुकी हो वहां आप दोनों को एक कैसे मान सकते है? क्यों बार बार तुलना करते है एक दूसरे में जबकि तुलनात्मक अध्यन दो विभिन्न तत्वों का किया जाता है|   दोनों को सामान बता कर आप अपनी मानसिक कमज़ोरी को छिपाने  का प्रयास क्यों कर रहे हैं ? एक व्यक्ति की विचारधारा बदलने से कुछ नहीं होगा बदलना है तो समाज की सोंच को बदलो |
 लगातार बोलने से उसका गला रुंध गया था थोड़ा पानी पीने के वह बोली सामने की वर्थ पर मेरी बेटी है जिसका एड्मिसन कालेज में हुआ छोड़ने जा रही हूँ इसके पिता जी अस्पताल में भर्ती  है मुझे तो सभी धर्म निभाने है कहीं कोई चूक हो गयी तो सब कहेंगे गैर जिम्मेदार औरत .........................
अपनी बात ख़त्म करने के बाद वह उसी मुद्रा में पढ़ने लगी |हम सभी लोग उसकी बातों पर  विचार  करने की मुद्रा में बैठे रहे | एक सन्नाटा छाया  रहा...........................
तभी सामने बैठी एक पच्चीस छब्बीस साल की औरत ने चुप्पी तोड़ी और बोली आप लोग संतरे लेंगे क्या ? सबने ना में सिर हिला दिया |और बोली इस समस्या का हल सब अपने हिसाब से निकालते है | लगभग पांच साल पहले मेरी शादी हुई थी बहुत धूमधाम से एक अच्छी शादी का अर्थ तो आप समझ ही गए होंगे | कुछ दिन पति ने अपना आदमी का रूप दिखाना शुरू कर दिया |शराब पी कर मारा पीटी, गली गलौज एक दिनचर्या बन चुकी थी और उसे सिर झुका कर सहन करना मेरी आदत , मैंने अपनी बुजदिली को सहनशीलता का नाम दे दिया था |और एक दिन उसने तलाक के पेपर मेरे सामने रख दिए मैंने चुपचाप हस्ताक्षर कर दिए | बेटी , पत्नी , माँ और ना जाने कितने नाम के साथ एक नाम और जुड़ गया परित्यक्ता ..................        उसकी बात सुनकर हम सब स्तब्ध थे और अपना मुंह छिपाने के लिए इधर उधर देख रहे थे | अब गाड़ी रुक चुकी थी  मै  खिड़की से  बाहर देखने लगा अचानक अपनी ऑंखें बंद कर ली क्योंकि प्लेटफोर्म पर लगा भारत सरकार का महिला सशक्तिकरण  का विज्ञापन मेरा मुंह चिढ़ा रहा था .................

शनिवार, मई 28, 2011

मुझे जबाब चाहिए


 बात आज से लगभग बाईस तेईस साल पुरानी है हमारे पड़ोस में एक  ऍम . के . वशिष्ठ  नाम 
 के व्यक्ति रहते थे |उनके यहाँ जब दूसरी कन्या ने जन्म लिया तो आस पड़ोस के लोग शोक 
 मिश्रित बधाई देने पहुँचने लगे | कोई कहता की घर में लक्ष्मी आयी है | किसी का कहना था 
 की बेटी और  बेटे में कोई फर्क नहीं ,कुछ लोग तो एक कदम आगे बढ़ कर उनकी बेटियों की 
 तुलना इंदिरा  गाँधी से भी कर देते थे |
समय बीतता गया वशिष्ठ जी ने अपनी छोटी सी नौकरी में ही उन दोनों को शिक्षा दिलाई |
हाँ  ! इस बीच उनकी पत्नी का समुचित इलाज ना होने के कारण लम्बी बीमारी के बाद देहांत  
 हो गया |  वशिष्ठ जी ने हिम्मत नहीं हारी और ना ही उनकी बेटियों ने उन्हें निराश किया|
उच्च शिक्षा प्राप्त कर जल्दी ही अच्छी नौकरी भी कर ली | पिता ने सुयोग्य वर देख कर उनका
विवाह करके अपने को निवृत कर लिया | और रह गए नितांत अकेले ................
बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ ने उनको अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया | जैसे बेटी को सूचना
मिली तुरंत ही अपने घर ले जाकर उनका इलाज करवा कर अपने घर दो महीने रखा |
इस बीच उनके मिलने वाले आकर उनका हाल चाल पूछते और उनको सामाजिक मान्यताओं
का वास्ता दे कर समझाते कि" कन्यादान के बाद कन्या के घर का पानी भी ग्रहण नहीं करना
चाहिए यह पाप नहीं घोर पाप है "| अत: बेटी के मना करने के बाद भी जिद करके अपने घर
चले आये | कुछ दिनों के बाद फिर बीमार पड़े अब मोहल्ले वाले आकर दया दिखाते और
 कहते अच्छा होता कि एक बेटा होता !कोई उन्हें ओल्ड एज होम जाने कि सलाह देता |
 मगर बेटियां  इसको मानने को तैयार नहीं थीं | इसी कशमकश में कुछ दी बीत गए अब वह
  कहाँ जाएँ | अचानक एक दिन वह कहाँ चले गये, किसी को नहीं मालूम, उनकी तलाश जारी
 है  | और इस प्रश्न के उत्तर की भी तलाश है उन्हें कहाँ जाना चाहिए ?