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मंगलवार, नवंबर 20, 2012

यही सत्य हैं.....

आज बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर आया हूँ ।अपनी एक पुरानी  रचना ले कर , जो मेरी पसंद की हैं ।
आशा करता हूँ आपको भी पसंद आएगी ।

 यही सत्य हैं....

झाँक कर देखा खिड़की से
उमड़ते हुए बादलों को
दौड़ कर आँगन में आया | 
और आकाश में बादलों का एक झुंड पाया | 
और शुरू हो गया तलाश का,
एक अंतहीन सिलसिला
अचानक खिल उठा चेहरा |
और प्रसन्न हुआ अंतर्मन
क्योंकि मिल गयी थी मुझे ,
मुन्नी की गुड़िया और पत्नी का कंगन
फिर अचानक कुछ सोंच कर डर गया ।
यथार्थ के धरातल पर गिर गया |
दौड़ कर अन्दर आया
बंद कर ली खिड़की और दरवाजे
कहीं भिगो न दे यह,
मेरे तन का एकमात्र कपड़ा |


बुधवार, मार्च 21, 2012

असफल प्रयास.......





आँखों से छलका ।
एक आंसू ,
पलकों ने किया 
असफल प्रयास
गिरने से, रोकने का ।
बचाने का , 
उसके अस्तिव को  ।
अंतत  ,
वह गिर गया  ।
संवेदनहीनता की ,
रेतीली ज़मीन पर।  

बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

पापा! मुझे क्या बनना है .....(.लघुकथा)

पिता जी प्लेटफार्म पर उदास बैठे थे मैं और बुआ जाती हुई ट्रेन को देख रहे थे। जिसमें   अंजली मुझे हमेशा के लिए छोड़  कर जा रही थी ।मेरे बहुत समझाने बुझाने का उसका पर   कोई असर नहीं हुआ आखिर जीत उसकी ही हुई जाने का निर्णय अंतिम सिद्ध हुआ ।
कुछ देर बाद मै  पिता जी और बुआ को लेकर घर आ गया और अपने कमरें में लेट कर   सोंचने लगा आखिर क्या बदला, कुछ भी तो नहीं मात्र पात्र बदले, उस घटना के जो आज से  पच्चीस साल मेरे पिता जी के साथ हुई थी कारण था पिता की कम आमदनी और घर का  बढ़ता हुआ खर्चा, माँ इस बात को लेकर पिता जी से  अक्सर लड़ती थी। जब पैसा नहीं
पूरे घर का बोझ क्यों उठा रहे हो, अपने भाई और बुआ को से अलग रहो} यह उनको     अच्छा नहीं लगता था । घर जिम्मेदारी को बह अपना कर्तव्य समझते थे । जिसे छोड़ना 
उनके लिए असंभव था ।पिता जी की एक ही रट थी  मुझे बड़ा आदमी बनना है बस बड़ा 
आदमी.....मैंने भी उनकी इस इच्छा को सम्मान दिया और पूरा ध्यान पढाई में लगा 
कर बन गया एक बड़ा आदमी जिस के पास नौकर, चाकर, कोठी, कार और सब कुछ 
था बड़ा आदमी कहलाने के लिए ।कुछ दिन बाद पिता जी इच्छानुसार मेरी शादी हो गयी
मेरे साथ विधवा बुआ का परिवार और पिता जी थे ।कुछ दिन तक सब कुछ सामान्य रहा 
इस बीच  मेरे घर एक पुत्र का आगमन भी हुआ । कुछ दिन बाद अचानक अंजलि ने अलग 
रहने की बात कह कर सबको सकते में ला दिया।फिर शुरू हुआ समझाने बुझाने का चक्र 
लेकिन वह तो अपनी बात से टस से मस नहीं हुई ।उसके इस व्यहार से घर में भूचाल 
ला दिया था । आखिर आज वह हम सबको छोड़ कर चली गयी ।परिवार के सब लोग एक 
दुसरे की और  देख रहे थे कौन है वास्तविक अपराधी ? मै ,पिता जी, बुआ जी या मेरे संस्कार या एक  संयुक्त परिवार की इच्छा .......मेरा  तीन  वर्ष का बेटा मेरी तरफ देख रहा था जिसकी आँखों में एक प्रश्न था पापा मुझे क्या बनना है ...........     
   
  

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

यह कैसा पथ ........

एक पथ पर 
एक पग आगे बढ़ा कर ,
एक द्रष्टि 
जब मैं पीछे डालता हूँ ।
क्यों पाता हूँ ?
अपने को नितांत अकेला ।
क्यों नहीं सुनाई देता 
ध्वनि का मधुर कोलाहल ,
क्यों नहीं दिखाई देते 
वह अपने लोग ,
क्यों फैला है दूर तक ,
नीरवता का अंतहीन साम्राज्य ।
ढेर सारे उत्तरविहीन,
प्रश्नों का अम्बार।
एक बार पुन: 
सोंचने पर लाचार।
क्यों चुना मैंने यह पथ !
जो कहाँ जाता हैं ?
जिस पर एक पग चल 
व्यक्ति अपनों से 
कितना दूर हो जाता हैं ।



रविवार, दिसंबर 25, 2011

नारी के रूप और चेतावनी ........


बेटी जो पुकारोगे तो,
गले में झूल जाएगी |
बहन जो बनाओगे तो,
राखी बांध जाएगी |


पत्नी जो मानोगे तो,
यह प्यार बरसायेगी|
समझोगे माँ इसे  तो,
आँचल में छिपाएगी |


खिलौना जो समझोगे तो, 
यह खेल भी दिखाएगी   |
पर  खेल ही खेल में,
यह प्राण हर जाएगी |




गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

फिर यह क्यों ना बदला ..........


हम  बदले , तुम बदले 
जग बदला , सब बदला 
फिर यह क्यों ना बदला  
अब भी यही कहानी है| 
 भैया का तो नया है नेकर 
 बहन की फ्राक पुरानी हैं| 


(चित्र गूगल के सौन्जय से )

मंगलवार, नवंबर 22, 2011

कुछ अजीब से हालात है ..........



तुम छिप छिप कर अब  मुझसे मिलने आना,
अब हर रस्ते पर कुछ आँखें पहरा देती हैं |

आना , मिलना पर कुछ ना कहना तुम मुझसे,
अब तो दीवारें भी  हरदम  चौकन्नीं   रहती हैं |

तुमने कब ,क्या बोला अब कुछ भी याद नहीं ,
अब बस अनकही बात ही मेरे जहन में रहती है |

कसमें -वादे, प्यार की बातें  यह , दिल की मज़बूरी है ,
माना यह सब सच हों, पर मुझको झूठी लगती हैं |


(चित्र गूगल के सौंजन्य से )

शनिवार, नवंबर 05, 2011

व्यर्थ आंसू .......




मत बहाओ,
व्यर्थ
तुम अपने  यह आँसू |
ना ही कोई
दया का सागर उमडेगा
और ना ही कोई ,
आएगा
भावनाओं का सैलाब |
क्योंकि
गिर रहे हैं
तुम्हारे यह आँसू
संवेदनहीनता  की रेत पर|
 
 

मंगलवार, नवंबर 01, 2011

टुकड़ों -टुकड़ों में बँटी हुई ज़िन्दगी......


टुकड़ों -टुकड़ों में 
बँटी हुई यह जिन्दगी |
हर एक  टुकड़ा 
मांगता है अपना हिसाब 
मजबूर हूँ तलाशने को ,
उनके लिए रोज़ , 
नये नये जबाब| 
अपने दायित्वों का, 
बोझ में बदल जाना |
जिन्दगी की रफ़्तार को 
कुछ और कम कर जाना |
थकें मांदें सूरज का 
झूठा आश्वासन 
कल नया सूरज देगा, 
एक नया जीवन |
अब बन चुका है 
एक  चक्र ,
मन के सन्नाटे में, 
गूंजता है केवल एक प्रश्न |
क्या यही है जीवन ?
सुनाई पड़ती है प्रतिध्वनि
हाँ यही है जीवन ..............



शनिवार, अक्टूबर 15, 2011

ठूँठ और झाड़ी.........



झाड़ी की कुटिल मुस्कान 
और ठूंठ पर कटाक्ष ,
क्या मिला तुमको ?
सह कर आँधियों के  थपेड़े ,
और मौसम का कहर |
बढ़ना सूखना और टूट कर गिरना ,
यही था तुम्हारा जीवन चक्र 
फिर लकड़हारों की टोलियों का 
तुम पर टूट पड़ना |
पल भर में ,
बना देना तुम्हें एक ठूँठ |
और मैं हंसती खेलती हूँ 
हवाओं के साथ आज भी |
ठूँठ की मधुर मुस्कान,
और दिया झाड़ी को उत्तर   
मैंने दिया , निमंत्रण पास आने का 
पथिकों को छाया 
और परिंदों को आशियाँ |
और तुमने दिया भय, 
काँटों के चुभने का 
और सबको तुमसे दूर रहने का |


मंगलवार, अक्टूबर 11, 2011

ऐसा भी होता है ............




ज़मीं पर जब जुगनुओं की
एक  महफ़िल सजी , 
आसमां पर सितारों के   , 
 ना जाने क्यूँ, दिल जल गए |

 और मेरा महबूब जब    
उस बज़्म में शामिल हुआ  ,
तब चाँद की पेशानी पे, 
ना जाने क्यूँ,सैकड़ों बल पड़ गए |


(चित्र गूगल के सौंजन्य से)

शुक्रवार, अक्टूबर 07, 2011

इसे मैं क्या कहूँ ?........





मैंने आज तक उसको, 
कभी  बेवफा कहा ही नहीं |
मगर वफ़ा की बात हो तो ,
उसका ज़िक्र भी अच्छा नहीं लगता |

ज़रूर उसकी बेवफायी भी
एक मज़बूरी रही होगी |
मेरे इस भरम का टूटना भी , 
मुझे कभी अच्छा नहीं लगता |

(चित्र गूगल के सौंजन्य से) 


शनिवार, अक्टूबर 01, 2011

रिश्तों का सोफ्टवेयर














रिश्तों की फाइल से, 
बना है परिवार का फोल्डर |
क्यों नहीं होता ओपन ?
क्या लगा है कोई वायरस |
मंथन के एंटीवायरस से 
स्केन करने पर पाता हूँ ,
रिश्ते की एक फाइल में 
अहंकार का वायरस |
रिमूव  करने के
कई  असफल प्रयास ,
और पूरी फाइल को डिलीट करने का 
अंतिम निर्णय |
मगर  फिर हो जाता हूँ असफल ,
क्योंकि मेरे ह्रदय के सिस्टम में
इंस्टॉल है ,
प्रेम और आत्मीय संबंधों का 
एक सोफ्टवेयर   .............





मंगलवार, सितंबर 20, 2011

बेटियों पर यह कैसा अत्याचार .......

बेटियों पर हो रहा, 
यह कैसा अत्याचार है |
एक आँख  रो रही है, 
और एक शर्मसार  है |

सृष्टि की रचना तो, 
देवों का उपकार है|
फिर क्यों उस मानव का, 
यह दानव सा व्यवहार है |

लक्ष्मी और दुर्गा का, 
नाम यहाँ पाती हैं|
जो कोख में तो बच गयीं 
फिर यहाँ मारी जाती है|

बेटी चाहे निर्धन की हो 
या हो वह धनवान की|
बेटी चाहे हिन्दू को 
या हो मुसलमान की  
बाज़ारों में बिकती है 
तो बेटी बस इन्सान की| 
और विदेशों में बिकती है जब, 
तो बस इज्ज़त हिंदुस्तान की|  


बुधवार, अगस्त 24, 2011

एक अप्रवासी वापसी....( आज मेरी पसंद से )


अपनी गली का रास्ता पूछते है, 
आज हम बस्ती की नयी दुकानों से |
हो रही हैं  पहचान अब अपनी, 
बस्ती के पुराने मकानों से |


कभी जिन गलियों में छिपते थे  ,
हम डर कर पकड़े  जाने से |
आज उन्हीं में घूमते रहे हम ,
बस यूहीं घंटों बेगाने से |


जहाँ थे लहलहाते खेत कभी ,
खड़ी है वहां अब इमारतें ऊँची|
रास्ता धूप का रोक लेती  है वह 
अब मेरी खिड़की में आने से |


याद आती है आज भी वह ,
मेरे गाँव की बूढी काकी |
जो अक्सर फूटकर रो पड़ती थी
बस हमारे झूठे रूठ जाने से |




(एक पूर्व  प्रकाशित पुन: सम्पादित रचना)
  

गुरुवार, अगस्त 11, 2011

मेरी सौंवी पोस्ट ......

मैं बहुत दिनों से इसी उधेड़बुन में था कि मेरी सौंवी पोस्ट किस विधा में हो ताकि सौ 
टिपण्णी तो मिल जायें|कभी सोंचा कि कोई कहानी  (मगर इस के पढने वाले कम है )
क्यों ना कविता, ग़ज़ल लेख या गीत लिखूं इसी सोंच में डूबा मै सड़क पर जा रहा था |
अचानक मेरी निगाह एक प्लास्टिक कि बोतल पर पड़ी सोंचा क्यों ना बोतल को उठा कर 
कचरे के डिब्बे में डाल दूँ इस बहाने क्लीन सिटी ग्रीन सिटी मेरा योग्यदान भी हो जायेगा|
और रास्ता भी साफ़ मगर जैसे ही बोतल को उठा कर ढक्कन खोला ...उसमें से एक 
जिन्न निकल कर बाहर आया और बोला मुझे कुछ काम बताओ नहीं तो मैं तुम्हें मार 
दूंगा मैंने जल्दी से कहा " एक कप चाय ला "| वह तुरंत ही चाय लेकर हाजिर ...
मैंने पूछा तुम सब काम कर सकते हो वह बोला हाँ मगर दो काम छोड़ कर एक तो 
ईमानदार नेता और दूसरा भ्रष्टाचार मुक्त सरकार |उसकी बात सुन कर मैंने  कहा मुझे तो 
तुम फर्जी जिन्न लगते हो | वह हाथ जोड़ कर बोला मैं हर संभव कार्य कर सकता हूँ |
वैसे हमने अपनी विरादरी के कुछ जिन्न आम आदमी के लिए जमीन पर छोड़ रखें है |                      जैसे तत्काल का रेल टिकट ,पासपोर्ट ,ड्राइविंग लाइसेंस और किसी भी सरकारी कार्यालय के काम
जो एक आम आदमी नहीं कर सकता| वह करते है,वह बोतल में नहीं होटल में रहते हैं |
जिन्न अब हमारे कब्जे में आ चूका था तुरंत ही हमने अपने मन की  बात रख दी |
मेरी इस पोस्ट पर सौ टिपण्णी दिला दे थोड़ी देर बाद वह बोला सारगर्भित, उच्चकोटि, 
की रचनाएँ तो पच्चीस तीस टिपण्णी पर दम तोड़ देती है और तुम सौ टिपण्णी माँग रहे हो 
लालची कहीं के ! मैंने कहा यार दूसरे ब्लॉग तो देख जिनमें सौ से ऊपर टिपण्णी है |
कुछ देर बाद उसने कहा देखो उनमें कुछ तो वरिष्ठ ब्लोगर हैं जिनको लोगों ने नमन किया 
है | रही दुसरे ब्लॉग की बात आधे से अधिक तो लोगों के आने का आभार व्यक्त किया है 
उसने राय भी दी कुछ शिष्टाचार सीखो मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद करो आने का आभार करो
अगर यह सब नहीं कर सकते, तो मुझे फिर से बोतल में बंद कर दो |
जाते जाते वह कुछ अमूल्य सुझाव  दे गया जिस तरह फिल्मों को प्रमोट करते है या किसी 
उत्पाद को, तुम भी अपने ब्लॉग को प्रमोट करो |

दिल की बातें 
(साहित्य का सुपर मार्केट)
एक ही ब्लॉग में मिलेगा आपको सब कुछ, यानि कविता, कहानी  लघुकथा ,शेर ओ शायरी
हास्य ,व्यंग्य ,ग़ज़ल और गीत |

हमारी विशेषताएं :- 

हम बेनामी टिपण्णी भी स्वीकार करते है|
रेडीमेड टिपण्णी कॉपी पेस्ट के लिए उपलब्ध है|

सौंवी पोस्ट पर हार्दिक बधाई , यूँ ही लिखते रहिये , सृजन जारी रहना चाहिए  ,  
बहुत सुंदर , बढ़िया ,दिल को छूने वाली रचना ,सुंदर भावाव्यक्ति,संवेदनशील ,वेहतरीन 
मार्मिक झकझोर देने वाली पोस्ट ,सार्थक पोस्ट, ज्ञानपरक पोस्ट, मजा आ गया और 
निशब्द ....
  


गुरुवार, जून 23, 2011

विचारों का जीवन चक्र



ज़ारी है अनवरत,
विचारों का अवागमन
मष्तिक के आँगन में
कुछ का एक पल ठहरना
और चले जाना
कुछ का आपसी
द्वन्द में ,
समाप्त हो जाना |
बचे हुए विजयी विचारों का
मष्तिक में,
हलचल पैदा करना|
और कुछ क्रियान्वित
होने से पूर्व,
परिणाम की सोंच कर
मर जाते है|
जो बचते है,
वही आदमी की,
पहचान बनाते है |




रविवार, मई 22, 2011

यह कैसा रिश्ता ? ( लघुकथा)



जैसे जैसे स्टेशन पास आ रहा था उनकी ख़ुशी   बढ़ती जा रही थी | गाड़ी स्टेशन पर रुकी तो 
एक आदमी उनका नाम पुकारते हुए उनकी सीट के पास आया और बोला  "आप ही है ए. के. 
शर्मा के रिश्तेदार ? उन दोनों पति - पत्नी ने खुश हो कर हाँ में सिर हिला  दिया | उसने कहा 
 साहब ने मुझे आपको लेने के लिए भेजा है | गाड़ी में बैठते ही उस बूढ़े आदमी ने पूछा
 क्या साहब घर पर नहीं है नहीं है "उत्तर में वह बोला नहीं घर पर ही है मेमसाब के साथ 
कहीं बाहर जाने का  प्रोग्राम है |
थोड़ी देर सन्नाटा छाया  रहा  फिर वह बोला " साहब अभी मुझे फिर स्टेशन आना क्योंकि 
दोपहर की गाड़ी से मेरे माँ और बाऊजी आ रहे है | मैंने तो आधे दिन की छुट्टी लगा दी है 
आख़िर माँ बाप आ रहे हैं ना ..".फिर उसने एक  प्रश्न  किया साहब से आपका क्या रिश्ता है 
बूढ़े आदमी मुस्कराते हुए कहा  " दूर के   रिश्तेदार है " क्योंकि वह अपने   बेटे को उसके 
अधीनस्थ  कर्मचारी की  निग़ाह में छोटा दिखाना नहीं चाहता था |



शुक्रवार, मई 13, 2011

जीवन और मृत्यू का द्वन्द



छिड़ा है  एक अंतहीन द्वन्द ,
जीवन और मृत्यू  के मध्य |
मृत्यु  का कहना 
मेरा अस्तिव ,
करता है तुम्हें सीमित |
और  क्रूर अट्ठाहस 
प्रत्युतर में ,
जीवन का कहना  
मात्र तुंम हो, एक पड़ाव 
मेरी यात्रा के |
और  मधुर मुस्कान |
हाँ , एक बार अवश्य 
आना है तुम्हारे पास 
करने अंतिम विश्राम |
क्योंकि करना है मुझे ,
नियति का सम्मान |
और छोड़ जाऊंगा 
फिर एक उत्तर विहीन प्रश्न, 
किसकी जय, किसकी पराजय ?