गुरुवार, जनवरी 19, 2012

यह कैसा पथ ........

एक पथ पर 
एक पग आगे बढ़ा कर ,
एक द्रष्टि 
जब मैं पीछे डालता हूँ ।
क्यों पाता हूँ ?
अपने को नितांत अकेला ।
क्यों नहीं सुनाई देता 
ध्वनि का मधुर कोलाहल ,
क्यों नहीं दिखाई देते 
वह अपने लोग ,
क्यों फैला है दूर तक ,
नीरवता का अंतहीन साम्राज्य ।
ढेर सारे उत्तरविहीन,
प्रश्नों का अम्बार।
एक बार पुन: 
सोंचने पर लाचार।
क्यों चुना मैंने यह पथ !
जो कहाँ जाता हैं ?
जिस पर एक पग चल 
व्यक्ति अपनों से 
कितना दूर हो जाता हैं ।



41 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. एक बार पुन:
      सोंचने पर लाचार।
      क्यों चुना मैंने यह पथ !
      जो कहाँ जाता हैं ?
      जिस पर एक पग चल
      व्यक्ति अपनों से
      कितना दूर हो जाता हैं ।
      Aah! Kitna dard hai samaya hua!

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  2. हर पग में दो दो भाव छिपे,
    कुछ अपनों के, कुछ औरों के।

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  3. rahoo mein kai saathi milate hain aur bichadate hain
    yahi jeevan hain
    acchi kavita hain

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  4. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    --
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।

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  5. संबंधों की शिथिल होती संवेदना पर बहुत सुंदर कविता.

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  6. २२३ लोगो के साथ चल रहे हो सुनील जी, फिर भी कहते हो की अकेला हूँ ???????बहुत बढ़िया ..

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  7. जिस पर एक पग चल
    व्यक्ति अपनों से
    कितना दूर हो जाता हैं ।

    अत्यंत लाजवाब हैं...वाकई उम्दा रचना से अवगत करने का आभार |

    मैं आपको मेरे ब्लॉग पर सादर आमन्त्रित करता हूँ.....

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  8. जब एक पग से दूर हो जाता है तो जो सरपट भाग रहे है भगवान् जाने वे कहाँ होते होंगे..

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  9. एकला चलो रे... अन्ततः तो अकेले ही जाना है क्यों न अभ्यास कर लिया जाये.

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  10. कभी-कभी ऐसा महसूस होता है लेकिन अपनों से कोई कभी दूर नहीं होता...
    एक बार फिर से देखो तो सब साथ खड़े होते हैं...

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  11. बेहद भावपूर्ण रचना समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका सवागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  12. सुनिल जी, आप आगे बढिये, हम आपके साथ हैं :)

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  13. बहुत खूब,...अच्छी प्रस्तुति,बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन
    new post...वाह रे मंहगाई...

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  14. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 21/1/2012 को। कृपया पधारें और अपने अनमोल विचार ज़रूर दें।

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  15. बेहद सार्थक और भावपूर्ण अभिव्यक्ति..

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  16. यही कशमकश रहती है ... अच्छी प्रस्तुति

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  17. असमंजस.....बड़ा जानलेवा है.

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  18. namaskar sunil ji
    bahut sunder ..........एक बार पुन:
    सोंचने पर लाचार।
    क्यों चुना मैंने यह पथ !
    जो कहाँ जाता हैं ?
    जिस पर एक पग चल
    व्यक्ति अपनों से
    कितना दूर हो जाता हैं ।..........gahari se antarman ko bayan karti hui rachna .

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  19. खतरनाक परस्थितियाँ . सुंदर प्रस्तुति.

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  20. पग आगे बढ़ा कर दृष्टि पीछे नहीं डालते...चलना मुश्किल हो जाता है। चलो तो चलते रहो..मंजिल से पहले रूकना क्या!

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  21. कहीं आपका इशारा ब्लागिंग के पथ की ओर तो नहीं है !

    सही अर्थों में कविता बहुत संवेदनशील है।

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  22. सुनील जी आप अकेले कहाँ है ??? हम जो आप के साथ-साथ चल रहे है..भावपूर्ण और संवेदनशील अभिव्यक्ति..

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  23. क्यों चुना मैंने यह पथ !
    जो कहाँ जाता हैं ?
    जिस पर एक पग चल
    व्यक्ति अपनों से
    कितना दूर हो जाता हैं ।

    ....बहुत सच..आज हम क्यों अकेलेपन का दर्द भोग रहे हैं? बहुत संवेदनशील प्रस्तुति..

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  24. मनोभावों की सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  25. शादी की सालगिरह मुबारक हो।

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  26. प्रश्नों के अम्बार लगे है
    उत्तर चुप है ....

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  27. अत्यधिक गहनता लिए सार्थक अभिव्यक्ति ...

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