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गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

एक कुत्ते की व्यथा (व्यंग्य)........

एक दिन हमनें ,
अपने शहर की सोती हुई पुलिस जगा दी ।
सौ रुपये देकर ,
थाने में एक हजार की रिपोर्ट लिखवा  दी ।
शाम को पुलिस हमारे घर आई 
साथ में एक  कुत्ता भी लायी ।
कुत्ते ने हमें सूंघा, और हमारे घर को देखा ।
कुत्ता बोला आप हमारे, 
बेईमान होने का फायदा उठाते हो।
अपने शान बढ़ाने के लिए 
चोरी की झूठी रिपोर्ट लिखाते हो । 
तभी उस कुत्ते के अन्दर का कुत्ता जागा।
सीधा थाने की तरफ भागा।
जिसे देख कर हमारा आत्मविश्वास भी जागा ।
यह क्या ! वह लौट कर बापस आया और बोला 
आप क्या सोंचते हैं ?
मै क्या, थानेदार की गिरफ्तारी करूँगा ।
मैंने तो पुलिस का नमक खाया हैं ।
मै क्या? नमकहरामी करूँगा ।
आज मै अपने ओहदे का इस्तेमाल करूँगा ।
इन सडक पर बैठे हुए,
भिखारी को जेल के अंदर करूँगा।
वर्षों से यह हमारे हक मार जाते हैं 
कचरे में पड़ी हुई रोटी
हमसे पहले मार जाते हैं ।
बात रोटी तक तो, हम सहन करते हैं ।
पर अब तो यह हमारा और हमारी नस्ल का
यह अपमान करते हैं ।
अपने को इंसान कहते हैं ।
पर हमारी तरह जीते और हमारी तरह मरते हैं । 

  

गुरुवार, दिसंबर 15, 2011

एक नवोदित कवि का दर्द......( व्यंग्य)

आज एक पूर्वप्रकाशित रचना प्रस्तुत है कारण यह है कि यह रचना मेरे उस समय की है |
जब मेरे ब्लॉग पर पाठकों कि संख्या बहुत कम होती थी|   

जब हम कविता लिख रहे होते है तब हम शब्द पकड़ते है| 
जब रचना लिख चुके होते है तब श्रोता पकड़ते है |
इस धर पकड़ के खेल का अंत तब हो जाता है |
जब किसी नवोदित कवि की पकड़ में कोई श्रोता आ जाता है  |
जब वह कवि श्रोताओं के पकड़ने की कला में पारंगत हो जाता 
तब जाकर किसी कवि-सम्मलेन का निमंत्रण पाता  है |
कवि-सम्मेलन में सबसे पहले सरस्वती वंदना की बारी आती है |
पहले एक कवयित्री  सरस्वती वंदना करती है |
फिर चार रचनाओं के बाद भी बंद  ना करती है |
नवोदित कवि हर रचना पर ज़ोर से ताली  बजाता है |
अपने मंच पर होने की याद, संचालक को दिलाता है |
तब जाकर वह कवि मंच पर पुकारा जाता , 
और देशी तमंचे की तरह एक फायर करके वापस आता है |
फिर मंच पर एक स्थापित कवि आता है |
वह मशीन गन की तरह फायर पे फायर करता जाता है |
कार्यक्रम के बाद स्थापित कवि को चेक थमा कर ,
कार में बिठाया  जाता है |
और नवोदित कवि को धन्यवाद दे कर, 

उसके रूट की  बस का नंबर बताया जाता है |
थका हारा कवि घर आता है |

मेज पर पड़े हुए संपादक के खेद सहित पत्रों को 
अपना मुंह चिढ़ाता हुआ पाता है |
आज वह अपनी रचनाओं को निठ्ल्लें पुत्र के समान पाता है |
अपने भविष्य के बारे में सोंच कर वह वर्तमान में मर जाता है |




गुरुवार, अगस्त 11, 2011

मेरी सौंवी पोस्ट ......

मैं बहुत दिनों से इसी उधेड़बुन में था कि मेरी सौंवी पोस्ट किस विधा में हो ताकि सौ 
टिपण्णी तो मिल जायें|कभी सोंचा कि कोई कहानी  (मगर इस के पढने वाले कम है )
क्यों ना कविता, ग़ज़ल लेख या गीत लिखूं इसी सोंच में डूबा मै सड़क पर जा रहा था |
अचानक मेरी निगाह एक प्लास्टिक कि बोतल पर पड़ी सोंचा क्यों ना बोतल को उठा कर 
कचरे के डिब्बे में डाल दूँ इस बहाने क्लीन सिटी ग्रीन सिटी मेरा योग्यदान भी हो जायेगा|
और रास्ता भी साफ़ मगर जैसे ही बोतल को उठा कर ढक्कन खोला ...उसमें से एक 
जिन्न निकल कर बाहर आया और बोला मुझे कुछ काम बताओ नहीं तो मैं तुम्हें मार 
दूंगा मैंने जल्दी से कहा " एक कप चाय ला "| वह तुरंत ही चाय लेकर हाजिर ...
मैंने पूछा तुम सब काम कर सकते हो वह बोला हाँ मगर दो काम छोड़ कर एक तो 
ईमानदार नेता और दूसरा भ्रष्टाचार मुक्त सरकार |उसकी बात सुन कर मैंने  कहा मुझे तो 
तुम फर्जी जिन्न लगते हो | वह हाथ जोड़ कर बोला मैं हर संभव कार्य कर सकता हूँ |
वैसे हमने अपनी विरादरी के कुछ जिन्न आम आदमी के लिए जमीन पर छोड़ रखें है |                      जैसे तत्काल का रेल टिकट ,पासपोर्ट ,ड्राइविंग लाइसेंस और किसी भी सरकारी कार्यालय के काम
जो एक आम आदमी नहीं कर सकता| वह करते है,वह बोतल में नहीं होटल में रहते हैं |
जिन्न अब हमारे कब्जे में आ चूका था तुरंत ही हमने अपने मन की  बात रख दी |
मेरी इस पोस्ट पर सौ टिपण्णी दिला दे थोड़ी देर बाद वह बोला सारगर्भित, उच्चकोटि, 
की रचनाएँ तो पच्चीस तीस टिपण्णी पर दम तोड़ देती है और तुम सौ टिपण्णी माँग रहे हो 
लालची कहीं के ! मैंने कहा यार दूसरे ब्लॉग तो देख जिनमें सौ से ऊपर टिपण्णी है |
कुछ देर बाद उसने कहा देखो उनमें कुछ तो वरिष्ठ ब्लोगर हैं जिनको लोगों ने नमन किया 
है | रही दुसरे ब्लॉग की बात आधे से अधिक तो लोगों के आने का आभार व्यक्त किया है 
उसने राय भी दी कुछ शिष्टाचार सीखो मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद करो आने का आभार करो
अगर यह सब नहीं कर सकते, तो मुझे फिर से बोतल में बंद कर दो |
जाते जाते वह कुछ अमूल्य सुझाव  दे गया जिस तरह फिल्मों को प्रमोट करते है या किसी 
उत्पाद को, तुम भी अपने ब्लॉग को प्रमोट करो |

दिल की बातें 
(साहित्य का सुपर मार्केट)
एक ही ब्लॉग में मिलेगा आपको सब कुछ, यानि कविता, कहानी  लघुकथा ,शेर ओ शायरी
हास्य ,व्यंग्य ,ग़ज़ल और गीत |

हमारी विशेषताएं :- 

हम बेनामी टिपण्णी भी स्वीकार करते है|
रेडीमेड टिपण्णी कॉपी पेस्ट के लिए उपलब्ध है|

सौंवी पोस्ट पर हार्दिक बधाई , यूँ ही लिखते रहिये , सृजन जारी रहना चाहिए  ,  
बहुत सुंदर , बढ़िया ,दिल को छूने वाली रचना ,सुंदर भावाव्यक्ति,संवेदनशील ,वेहतरीन 
मार्मिक झकझोर देने वाली पोस्ट ,सार्थक पोस्ट, ज्ञानपरक पोस्ट, मजा आ गया और 
निशब्द ....
  


रविवार, जुलाई 03, 2011

क्या व्यंग्यात्मक कविताएँ सन्देश देने में सक्षम है ?


मेरे मन में अक्सर यह विचार आता है कि क्या व्यंग्यात्मक कविताएँ सन्देश देने में सक्षम है ?
क्योंकि व्यंग्य के माध्यम से हम गंभीर मुद्दों को आम जनता तक पहुँचाने का प्रयास करते है | 
कहीं हमारा   यह प्रयास व्यर्थ तो नहीं है या कहाँ तक हम सफल  हुए |
आज प्रस्तुत  एक पुन :सम्पादित रचना ! देखते है  क्या ख्याल है आपका !    

हम थे चार यार,
चारों थे बेरोजगार
घूम रहे थे इधर उधर
देखने पहुंचे चिड़ियाघर |
तभी सामने एक  चिंपाजी  आया
जिसे देख कर हमारा दोस्त  चिल्लाया |
यही है हमारे  पूर्वज महान
हम सब है इनकी संतान
इस पर चिंपाजी गुर्राया
क्यों हमको  अपना पूर्वज बताते हो
क्यों  हमारा मजाक उड़ाते हो
यदि तुम हमको नंगे देख कर
हमारी हँसी उड़ाते
पर  तुम तो  कपड़ों में भी,
हम से ज्यादा नंगे नज़र आते हो|
तभी हमने उसको अपने पास बुलाया
और प्यार से इस तथ्य की,
सत्यता को समझाया|
सभ्यता और विकास की दौड़ में,
हम थोड़ा आगे बढ गए
और आप थोड़ा पिछड़ गए |
इस पर उसने  घूर  कर हमको देखा
जैसे वह कर लेगा  हमारा भक्षण
और वह जोर से चिल्लाया
अगर हम है पिछड़े
तो कहाँ है हमारा आरक्षण
प्रश्न उसका तलवार की तरह
हमारे ऊपर लटका हुआ था |
उत्तर सूखी डबल रोटी की तरह  
हमारे गले अटका में  हुआ था |
हमने उसे अपने पास,  
प्यार से बुलाया और समझाया 
आरक्षण का सपना ,
आप का उस दिन साकार होगा |
जिस दिन आप को ,
वोट डालने का अधिकार होगा | 

मंगलवार, मई 31, 2011

सत्य कथा विशेषांक ( हास्य कविता )



अक्सर हास्य कवियों पर यह आरोप लगते है कि वह लतीफों को पंक्तिबद्ध 
करके रचनाएँ लिखते है | मगर मेरा मानना है कि हास्य कवि दोहरी भूमिका 
निभाता है | इस व्यथित समाज को हँसाने के साथ  साथ सन्देश भी देता है |
चलिए एक आरोप और लगा दीजिये |


एक सम्पादक के मन में 
एक विचार आया | 
 और तुरंत ही उसने ,
एक विज्ञापन छपवाया |
हमारा अगला अंक ,
 सत्य कथा विशेषांक होगा |
और घटनाओं  की सत्यता ,
चयन का आधार होगा |
तब हो गया एक चमत्कार ,
रचना आयीं पूरी पचास हज़ार |
मगर एक ही शीर्षक,
आ रहा था बार बार 
नेताओं का भ्रष्टाचार , नेताओं का भ्रष्टाचार 

शुक्रवार, मई 06, 2011

ब्लाग जगत की टिपण्णी और उनका सम्बन्ध



 एक  दिन  अचानक हमारे एक मित्र ने ब्लागिंग से सम्बंधित कुछ  प्रश्नों के उत्तर जाननें 
के लिए हमसे संपर्क किया | उनकी जिज्ञासा टिप्पणियों के प्रतीकों और उनके आकार 
को लेकर थी | जैसे .....

(१)  )),  ..... ,(.)   इन टिप्पणियों का क्या अर्थ है ?
मैंने कहा इस प्रकार की टिप्पणीकार, प्रतिशोध भावना से ग्रसित  होते है | जब पूरी रचना 
पढ़ने के बाद भी उनकी समझ में यह नहीं कि रचना साहित्य की किस विधा में है और उसका 
उद्देश्य क्या है ( लिखने के सिवा ) तब वह इस प्रकार की टिपण्णी करते है | जब तुम्हारा  
 लिखा हम नहीं समझ सके, तो हमारा  लिखा तुम समझ कर दिखाओ |

(२) बढ़िया , सुन्दर , वाह  ,  इन टिप्पणियों का क्या अर्थ है ?
               इस प्रकार की टिपण्णी ब्लागर की वरिष्ठता को दर्शाती है |
तब हमने उसे एक व्यवहारिक उदहारण दे कर समझाया जिस प्रकार किसी कनिष्ठ लिपिक 
के बच्चे के जन्म दिन पर मुख्य प्रशासनिक अधिकारी घर आके ग्यारह रुपये दे कर , 
बिना कुछ खाए चला जाये यह भी ठीक उसी प्रकार है | 

(३) कॉपी - पेस्ट  लम्बी टिपण्णी  इन टिप्पणियों का क्या अर्थ है ?
इस प्रकार की टिपण्णी का प्रयोग अधिकतर  नए ब्लागर करते है इसका उद्देश्य ज्यादा से  
 ज्यादा ब्लॉगों पर जाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करना होता है | (अब हम भी मैदान में है)
और काम की बात सबसे नीचे लिखी होती है  कृपया मेरे ब्लाग पर आयें I

(४) पाँच से अधिक शब्दों की रचना से सम्बंधित टिपण्णी 
मैंने  कहा यह वह ब्लागर जिन्होंने स्कूल में सूर, कबीर, तुलसी रहीम को पढ़ा और कॉलेज में 
पन्त , निराला , महदेवी वर्मा ,  रामचंद्र शुक्ल को पढ़ा और साहित्य में रूचि रखने लगे |
आज उनकी यह मज़बूरी बन गयी है कि साहित्य को जिन्दा रखने के लिए वह टिप्पणी करें |

अपने प्रश्नों का उत्तर पा कर जब वह उठने लगा तो हमने कुछ समझदार  टिप्पणीकार जो
बिना पढ़े ही कॉपी -पेस्ट सुविधा का लाभ उठाते हुए ही दो अलग अलग टिपण्णी को जोड़कर 
 टिपिया देते है उनके बारे में बताया  वह  टिप्पणियाँ  ब्लाग पर कुछ इस प्रकार दिखती है I 


संवेदनशील ,अच्छा व्यंग्य , बधाई.... 
मर्मस्पर्शी , मजा आ गया .....




गुरुवार, अप्रैल 28, 2011

ब्लागर और मंचीय कवि



ब्लागर और मंचीय कवियों में कुछ असमानता होती है जैसे कि ब्लागर की रचना साहित्य 
से जुड़े हुए या साहित्य की किसी भी विधा में सृजन कर रहे व्यक्ति के लिए होती है |जबकि 
मंचीय कवि का उद्देश्य एक आम श्रोता को आनंद पहुँचाना होता है |ब्लागर को किसी मानदेय
या धनराशि की आशा नहीं होती | मंचीय कवि अधिकतर लिफाफे की इच्छा तो रखता ही है |
मगर एक समानता दोनों में है , एक टिपण्णी चाहता है तो दूसरा तालियाँ ....एक विशेष बात 
यह है की दोनों सीधे- सीधे  नहीं मांगते बलागर कुछ इस तरह मांगता है |

कृपया अपना आशीर्वाद यहाँ दें ..
यहाँ तक आये है तो .....
आपने कुछ कहा .....
कृपया अपनी  राय अवश्य दें ....
मेरा मार्गदर्शन करें ......
एक टिपण्णी भेंजें ......          कुछ ब्लागर मेरे जैसे यह अधिकारपूर्वक मांगते है |
( जैसे पत्नी मायके गयी हो तो ससुर जी को लिखते है पत्नी को भेंजें )
अर्थात आप बिना टिपण्णी के मत जाइये 

अब कुछ बात मंचीय कवियों की वह भी घुमा फिर कर मांगते है 

दुआओं की दरकार है ......
इस पंक्ति पर आपका आशीर्वाद चाहूँगा ......
आप मेरे साथ शिरकत करें ........
इस शेर की हिफ़ाजत कीजियेगा .....
पुरे सदन का ध्यान चाहूँगा ..........
अर्थात तालियाँ जरुर बजाएं ...

मेरे जैसे कवि कुछ इस तरह तालियाँ मांगते  है |

गीत और छंद का आनंद आप लीजिये |
मगर करतल ध्वनि का दान हमें दीजिये 
सरस्वती पुत्र, आप श्रोता  सब महान है |
कवि नहीं कविता का सम्मान तो कीजिये |


(कृपया ब्लागर मित्र इसे अन्यथा ना लें )


सोमवार, मार्च 21, 2011

भिखारी और हम


सड़क पर बैठा भिखारी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहा था 
और अपने खाली डिब्बे को बजा रहा था
हमने पूछा क्यों मचा रहा बबाल है 
वह प्यार से बोला राम के नाम पर एक रुपये का सवाल है |
हमने कहा सड़क पर भीख माँगते शर्म नहीं आती ?
वह हंसकर   बोला " क्या ऑफिस खोल लूँ "?
फिर गुस्से में बोला हम  सड़क पर बैठते साब
इसलिए राम के नाम पर नोट मांगते है |
ऑफिस तो वह खोलते है जो राम के नाम पर वोट मांगते है |
उसके इस उत्तर ने हमें खुश कर दिया |
और हमने एक सिगरेट पेश कर दिया |
वह बोला क्या इससे   फायदा ?
हमने समझया सिगरेट पिएगा तो वक्त से पहले मार जायेगा| 
इस गरीबी से निजात पा जायेगा 
गरीबी तो हट नहीं सकती एक गरीब हट जायेगा |
गरीबी हटाओ का नारा देने वाला नेता 
चुनाव में दो चार वोट ज्यादा पा जायेगा |
और किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री बन जायेगा |
वह बोला क्या इससे   फायदा ?
हमने याद दिलाया वह गाना 
है फर्ज आदमी का औरों  के काम आना |
वह बोला क्यों जी हमें बुद्धू बनाते हो 
और ज़िंदगी की कीमत मौत बताते हो |
हमने कहा चल दो चार पल और जी ले 
यह ले दारू एक पेग पी ले |
वह बोला क्या इससे   फायदा ?
हमने कहा एक पेग पिएगा तो बोतल की आदत पड़  जाएगी |
कुछ दिनों में तेरी दोनों किडनी सड़ जाएगी 
जब तू किसी डाक्टर के चुंगल में आएगा 
तो अपनी दोनों किडनी वापस लेकर आयेगा|
क्यूंकि ख़राब किडनी कोई नहीं निकलता 
एक डाक्टर किडनी चोरी के पाप से बच जायेगा |
अब उसने नही पूछा क्या फायदा 
क्योंकि याद आ गया वह गाना 
 है फर्ज आदमी का औरों  के काम आना ...


शुक्रवार, मार्च 18, 2011

होली और आम आदमी


तो लीजिये एक बार फिर  आ गयी होली | होली का पौराणिक महत्व 
पर चर्चा करना तो आप पाठकों से साथ नाइंसाफी होगी |
आज मै  आम आदमी  और इस पर्व की विसंगतियां पर कुछ प्रकाश 
डालना चाहता हूँ | 

(१) यह पर्व अधिकतर उस माह में पड़ता है जिस माह का वेतन किसी 
सरकारी कर्मचारी को नहीं मिलता है |

(२) अगर गलती से दुसरे माह में पड़ भी जाये तो उस माह का वेतन 
आयकर की कटौती के बाद कुछ नहीं बचता है |

(३) यह पर्व उस माह में पड़ता है जब बच्चों की परीक्षाएं चल रही होती है |

 फिर भी एक  आम आदमी  इस पर्व को धूमधाम से मनाता है | और इसकी
मस्ती में इतना डूब जाता है की अपने  आप को भी भूल जाता है|
रंग से पुते चेहरे, फटे हुए कपड़ों में, नशे में धुत्त आप किसी सभ्य सुशिक्षित 
बर्ग के  आदमी  को आसानी से पा सकते है | वह जोर जोर से चिल्ला रहा 
होगा की होली है ....रंग बिरंगी होली है ...
क्या आपने किसी को दिवाली है या दशहरा है या रक्षाबंधन  है चिल्लाते हुए देखा 
दीवाली है ...या दशहरा है... तो निसंदेह आपका उत्तर होगा नहीं | यही तो इस त्यौहार की विशेषता है |


अंत में 

दिल में भरी  उमंग हो 
बोतल में भरी  भंग हो 
मजा कुछ और बढ़ जाये 
यदि कवियों का संग हो |

आप सभी को होली की शुभकामनायें 

शनिवार, जनवरी 22, 2011

मंच की कविता




मंचीय कवितायेँ हमेशा ,
पुलिस ,पोलिटिशियन     और पाकिस्तान की आभारी हैं |
यह भी एक इत्तफ़ाक है ,
यही तीनों हमारे देश पर भारी है |


मैं इन तीनों को रचना के माध्यम से नमन करता हूँ  |



 एक नये शहर में हम पहली बार आये
सोचा क्यों ना पुलिस की सहायता ली जाये |
हमने पूछा १६ नंबर की बस कहाँ से जाएगी ?
वह बोला क्या यह  भी आपको पुलिस बताएगी |



 टीवी में लोकसभा की कार्यवाही को देख कर  
एक दिन हमारी बच्ची ने पूछा
श्वेत वर्ण तो शांति का प्रतीक है |
फिर  यह क्यों इतना हल्ला मचा रहे है | 
फिर यह सफ़ेद कपड़े पहन कर  ,
क्या किसी मातम में जा रहे है  | 
मैंने  कहा  हाँ , यह संसद  में  जायेगे | 
वहां  लोकतंत्र  की अर्थी  को कन्धा  लगायेगे |



देख रहे थे  सुबह का अख़बार
सामने था   एक इश्तहार ,
चूहे दवाई खाकर ,
मरते है घर से बाहर जा कर ,
हमने सोचा काश !
ऐसी दवा आतंकवादियों की बना पाते |
तो सारी की सारी लाशें ,
हम पड़ोसी   मुल्क में पा जाते  |  



शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

इनसे कुछ ना कहना

    अपनी बात आरम्भ करने से पहले मै यह बताना चाहता हूँ कि
रचनाकार कि कलम ना ही राजनीति के बृक्ष कि साख से बनती
है और ना ही इसमें किसी पार्टी कि स्याही का प्रयोग होता है |
पिछले  कुछ दिंनों से संसद में अवरोध बना हुआ है |  कारण है कुछ
घोटाले जो कि हमारे लिए एक आम बात बन चुके है  अब प्रश्न यह उठता 
जिस प्रकार सरकारी कर्मचारी के काम ना करने पर उसका वेतन" नो वर्क
नो पे" के आधार पर काट लिया जाता है| 
क्या इनके साथ भी यही होता है ?
क्या इनको सरकारी कार्यों में व्यवधान पहुँचाने का संविधानिक अधिकार है 
कुछ साल पहले तिरंगा यात्रा और दागी मंत्री का मुद्दा भी छाया  रहा था |
समय व्यर्थ मत कीजिये एक मंचीय रचना के माध्यम से इनका हाल देखिये

रोज रोज नये नये कुछ मुद्दे ढूंढ़  लाते है| 
भूख और गरीबी का यह मुद्दा भूल जाते है |
सिर अपना शर्म से कुछ और झुक जाता है 
जब देश का तिरंगा एक मुद्दा बन  जाता है 
|
                 दागी मंत्री 

दागी दागी , दागी कुछ दागी चिल्लाते है ,
शांत शांत , शांत कुछ शोर मचाते है |
दूसरों के दागों कि कहानी वह  सुनाते है, 
पर अपने दागों को जो देख नहीं पाते है|
दाग कैसे देखेंगे जब आँखें मूंद रखी है ,
और आइना भी ऐसा जिसमें कालिख पोत रखी है| 



बुधवार, जुलाई 07, 2010

इन आम आदमियों को भूल मत जाना


आम आदमी

तुमको तुम्हारे शहर की
सड़कों पर पड़ी ,
जिन्दा लाशों की कसम
मत डालना तुम ,
इन पर झूठी सहानुभूति का कफ़न
इनको यूँही पड़ा रहने दो
चीखने दो चिल्लाने दो
तुम्हारी सभ्यता की कहानी
इनको ही सुनाने दो
सड़क पर पड़े हुए यह लोग
हमारे बहुत काम आते है |
तभी तो हमारे राजनेता
इनके भूखे नंगे तपते हुए पेटों पर
राजनीति की रोटियां सेंक जाते है |
इनको तरह तरह से 
उपयोग में लाया जाता है |
कभी राम कभी अल्लाह के नाम पर ,
इनका  ही  तो खून बहाया जाता है
और कभी कभी अपनी सियासत,
चमकाने और ताकत दिखाने के लिए
इन आम आदमियों के नाम पर
भारत बंद बुलाया जाता है |
चुनावों के समय हम ,
इनको आम जनता कहते है |
और फिर आने वाले चुनावों तक ,
आम की तरह चूसते रहते है |
यह रोते है तो रोने दो
मत जगाओ, सोने दो |
जिस दिन यह सोता हुआ,
आम आदमी जाग जायेगा ,
उस दिन से संसद का रास्ता
बहुत कठिन  हो जायेगा |