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मंगलवार, मई 31, 2011

सत्य कथा विशेषांक ( हास्य कविता )



अक्सर हास्य कवियों पर यह आरोप लगते है कि वह लतीफों को पंक्तिबद्ध 
करके रचनाएँ लिखते है | मगर मेरा मानना है कि हास्य कवि दोहरी भूमिका 
निभाता है | इस व्यथित समाज को हँसाने के साथ  साथ सन्देश भी देता है |
चलिए एक आरोप और लगा दीजिये |


एक सम्पादक के मन में 
एक विचार आया | 
 और तुरंत ही उसने ,
एक विज्ञापन छपवाया |
हमारा अगला अंक ,
 सत्य कथा विशेषांक होगा |
और घटनाओं  की सत्यता ,
चयन का आधार होगा |
तब हो गया एक चमत्कार ,
रचना आयीं पूरी पचास हज़ार |
मगर एक ही शीर्षक,
आ रहा था बार बार 
नेताओं का भ्रष्टाचार , नेताओं का भ्रष्टाचार