गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

एक कुत्ते की व्यथा (व्यंग्य)........

एक दिन हमनें ,
अपने शहर की सोती हुई पुलिस जगा दी ।
सौ रुपये देकर ,
थाने में एक हजार की रिपोर्ट लिखवा  दी ।
शाम को पुलिस हमारे घर आई 
साथ में एक  कुत्ता भी लायी ।
कुत्ते ने हमें सूंघा, और हमारे घर को देखा ।
कुत्ता बोला आप हमारे, 
बेईमान होने का फायदा उठाते हो।
अपने शान बढ़ाने के लिए 
चोरी की झूठी रिपोर्ट लिखाते हो । 
तभी उस कुत्ते के अन्दर का कुत्ता जागा।
सीधा थाने की तरफ भागा।
जिसे देख कर हमारा आत्मविश्वास भी जागा ।
यह क्या ! वह लौट कर बापस आया और बोला 
आप क्या सोंचते हैं ?
मै क्या, थानेदार की गिरफ्तारी करूँगा ।
मैंने तो पुलिस का नमक खाया हैं ।
मै क्या? नमकहरामी करूँगा ।
आज मै अपने ओहदे का इस्तेमाल करूँगा ।
इन सडक पर बैठे हुए,
भिखारी को जेल के अंदर करूँगा।
वर्षों से यह हमारे हक मार जाते हैं 
कचरे में पड़ी हुई रोटी
हमसे पहले मार जाते हैं ।
बात रोटी तक तो, हम सहन करते हैं ।
पर अब तो यह हमारा और हमारी नस्ल का
यह अपमान करते हैं ।
अपने को इंसान कहते हैं ।
पर हमारी तरह जीते और हमारी तरह मरते हैं । 

  

23 टिप्‍पणियां:

  1. आपने तो निःशब्द कर दिया..
    बहुत बहुत बढ़िया..
    गहन भाव भी हैं और कविता होने का सम्पूर्ण एहसास भी है..

    मुझे बेहद पसंद आई.

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  2. व्यवस्था और इंसान की फितरत पर अच्छा व्यंग

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  3. अपने को इंसान कहते हैं ।
    पर हमारी तरह जीते और हमारी तरह मरते हैं ।
    व्यंग के साथ गहन भाव... आभार

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  4. bahut khoob shaandar sir
    maja aa gaya

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  5. व्‍यवस्‍था पर करारी चोट।
    बढिया व्‍यंग्‍य।

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  6. अपने को इंसान कहते हैं .
    पर हमारी तरह जीते और हमारी तरह मरते हैं.

    अच्छा व्यंग.

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  7. इस सार्थक प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें.

    कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नवीनतम पोस्ट पर पधारकर अपना स्नेह प्रदान करें.

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  8. करारा व्यंग..सार्थक प्रस्तुति

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  9. शुक्र है कुत्ते ने आपको छोड़ दिया, काटा नहीं।:)

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  10. बहुत ही सुन्दर जनाब, व्यवस्था पर करारी चोट की है आपने।

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  11. सिहरन पैदा कर देने वाला व्यंग. सार्थक प्रस्तुति के लिये बधाई सुनील जी.

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  12. हास्यरस का अंत करुण रस में।
    बहुत अच्छा।

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  13. बहुत सटीक व्यंग जो दिल को छू गया...

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  14. सार्थक एवं सशक्त प्रस्तुत ...समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  15. इसमें कुत्ते की तो कोई व्यथा है नहीं। जो है,बस इन्सान की ही है।

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  16. सार्थक प्रस्तुति .... बधाई ...

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