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सोमवार, दिसंबर 12, 2011

ऐसी अपनी इच्छा हैं.........

अपने उर के स्पंदन को,
बस जीवन मैंने मान लिया|
अपने उर के क्रंदन को
गीतों का मैंने नाम दिया| 
रुके साँस के साथ कलम भी 
ऐसी अपनी इच्छा हैं |
पटाक्षेप ही जीवन नाटय का, 
देगा हमको इसका उत्तर|  
चली है उसकी अपनी मर्जी,  
या मेरी इच्छा को मान लिया| 

मंगलवार, नवंबर 22, 2011

कुछ अजीब से हालात है ..........



तुम छिप छिप कर अब  मुझसे मिलने आना,
अब हर रस्ते पर कुछ आँखें पहरा देती हैं |

आना , मिलना पर कुछ ना कहना तुम मुझसे,
अब तो दीवारें भी  हरदम  चौकन्नीं   रहती हैं |

तुमने कब ,क्या बोला अब कुछ भी याद नहीं ,
अब बस अनकही बात ही मेरे जहन में रहती है |

कसमें -वादे, प्यार की बातें  यह , दिल की मज़बूरी है ,
माना यह सब सच हों, पर मुझको झूठी लगती हैं |


(चित्र गूगल के सौंजन्य से )

बुधवार, अगस्त 24, 2011

एक अप्रवासी वापसी....( आज मेरी पसंद से )


अपनी गली का रास्ता पूछते है, 
आज हम बस्ती की नयी दुकानों से |
हो रही हैं  पहचान अब अपनी, 
बस्ती के पुराने मकानों से |


कभी जिन गलियों में छिपते थे  ,
हम डर कर पकड़े  जाने से |
आज उन्हीं में घूमते रहे हम ,
बस यूहीं घंटों बेगाने से |


जहाँ थे लहलहाते खेत कभी ,
खड़ी है वहां अब इमारतें ऊँची|
रास्ता धूप का रोक लेती  है वह 
अब मेरी खिड़की में आने से |


याद आती है आज भी वह ,
मेरे गाँव की बूढी काकी |
जो अक्सर फूटकर रो पड़ती थी
बस हमारे झूठे रूठ जाने से |




(एक पूर्व  प्रकाशित पुन: सम्पादित रचना)
  

मंगलवार, अप्रैल 05, 2011

ब्लाग जगत में मेरी पहली वर्षगांठ



यह एक साल  यूँ बीत गया कुछ पता ही नहीं चला | एक मशीन की तरह 
सुबह पोस्ट देखना , कुछ टिपण्णी करना और  कुछ को कॉपी - पेस्ट में 
निपटा देना | ( मुझे भी तो कुछ टिपण्णी चाहिए )| इस एक साल मैंने आपके 
सामने जो भी कुछ परोसा वह  आपने एक  सभ्य अतिथि  की भांति ग्रहण किया |
 और  अच्छी लगी   , सुन्दर अभिव्यक्ति , उम्दा , दिल को छू गयी ,बहुत बढ़िया आदि 
कह कर आपने  मेरा हौसला बढाया | उसके लिए मै आपको धन्यवाद देता हूँ |
अब मेरा फर्ज  बनता है कि मै अपना रिपोर्ट कार्ड आपके सामने प्रस्तुत  करूँ |
तो यह  रहा मेरा रिपोर्ट कार्ड ........

 कुल प्रवष्टियां                                 ६५ 
 कुल अनुसरण कर्ता                      १०८ 
 कुल टिपण्णी                              १४४४  

न्यूनतम  टिपण्णी                      २   ( चलो कुछ तो मिलीं )
अधिकतम टिपण्णी                   ४७  ( अर्धशतक से चूके )


अब कुछ विशेष  ( मेरे लिए )

पहली अनुसरण  कर्ता                    Shikha Deepak
पहली टिपण्णी                             Shikha Deepak


 एक मात्र ब्लागर जिनसे मैं मिला 
    ( और किसी ने मौका ही नहीं दिया )

एक मुलाकात जाकिर अली रजनीश  से




वह तीन ब्लागर जिनसे फ़ोन पर बात हुई :

                             श्री    कुंवर कुसुमेश , विजय  माथुर, और  शिखादीपक 


बात जो दिल को छू गयी 


दीपक 'मशाल' ने कहा…आज मेरी बेटी का जन्म दिन है पर 

तकलीफ तब होती है जब सफलताओं के शिखर पर बैठी एक बेटी के लिए भी माँ-बाप कह देते हैं कि 'उसने तो बेटे की कमी पूरी कर दी' या 'वो तो बेटे से बढ़ के' या 'बेटा है मेरे लिए'.. जैसे संबोधन ही पाती है.. क्यों आखिर हमेशा तुलना बेटे से ही क्यों? क्या एक बेटी बेटी रह कर कमाल नहीं कर सकती? क्या हम उसे सिर्फ बेटी नहीं मान सकते जिसकी तुलना किसी बेटे से की जाने की जरूरत ही नहीं..
 दीपक 'मशाल' ने कहा…
ये धारणाएं भी अजीब होतीं हैं.. कोफ़्त होती है कभी-कभी खुद पर ही कि क्यों ऐसे समाज का हिस्सा हैं हम.. शिवांगी को शुभकामनाएं और आपको बधाई सर..

 वह जिन्होंने गुरु की भूमिका निभाई
राजेश उत्‍साही ने कहा…
अच्‍छी कोशिश। सुनील भाई अगर शब्‍दों के चयन और उनकी जगह पर थोड़ा सा और ध्‍यान दें तो आपकी कहन में पैनापन आ जाएगा।

उस्ताद जी ने कहा
शोहरत की धूल पर 
2/10
साधारण
डा.सुभाष राय ने कहा…
सुनील जी आप का व्यंग्य प्रयोग अच्छा है. थोडा और तीखपन लाने की जरूरत है. जुटे रहिये. नित-नित के अभ्यास से पैनापन बढ्ता जायेगा. शुभकामनायें.

वह  जिन्होंने  मुझे सराहा 

दर्शन कौर धनोए ने कहा…
सुनील कुमार जी ,आपके ब्लोक पर पहली बार आई हु --माता -पिता की तस्वीर देखकर मेरा दिल बहुत खुश हुआ --जो इन्सान माँ -बाप की इतनी इज्जत करता हे --वो यकीनन शानदार हे --अपना फ़्लोअर(दोस्त ) बनाना चाहुगी --धन्यवाद !

उस्ताद जी ने कहा…
जीवन का गणित पर 
6.5/10

एक उत्कृष्ट और मौलिक कविता
जीवन की विडम्बना और वेदना की विलक्षण अभिव्यक्ति
कविता समाप्त होते ही पाठक के मन में अकथनीय अनुभूति होती है.

                   अंत में अगर मै इसमें सफल हुआ हूँ तो एक कहावत के अनुसार 
                               हर सफल व्यक्ति के पीछे एक स्त्री होती है |


                                       मेरी धर्मपत्नी श्रीमती दीप्ति श्रीवास्तव
                   ( क्षमा  करें केवल पत्नी, क्योंकि धर्मबहन और धर्मभाई कभी सगे नहीं होते )

अगर असफल रहा हूँ तो !


                                      मै सुनील कुमार, मेरे कर्म और मेरा भाग्य !



  एक बार फिर मै आप सबका  आभार व्यक्त करना  चाहता हूँ वह पाठक जो जानबूझ कर या गलती से मेरे ब्लाग पर आये और टिपण्णी के रूप में अपना आशीर्वाद दिया |