शनिवार, मार्च 10, 2012

पेट की तपिश

ठंडे चूल्हे ने ,
मुस्कराते हुए
ख़ाली पतीली से पूछा ?
आज कब आओगी ।
और  क्या पकाओगी ?
और सूखी लकड़ियों ने
ख़ुशी मनाई ।
आज वह जलने से ,
बच गयीं  ।
पतीली ने मेरी तरफ,
शरमाते हुए देखा ।
और आ  लगी
मेरे जलते हुए पेट से ।

28 टिप्‍पणियां:

  1. अलग हट के |

    सुन्दर बिम्ब ।।

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  2. एक गरीब की जिंदगी का कटु सत्य ....दर्द भरा

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  3. चंद लाइनों में गरीबी का कटु सत्य ,जो आधी आबादी की कहानी है.
    बहुत खूब लिखा है आपने. बधाई

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  4. pora ka poora garibi ka khakha kheench diya............

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  5. अद्भुत बिम्ब प्रयोग... सुन्दर रचना...
    सादर.

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  6. badhai bhahut sahi satik likha aapne . alag andaj kuch khas .

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  7. गरीब के जीवन के यथार्थ को एक अलग ही अंदाज़ में दर्शाती रचना...

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  8. एक आग दूसरे को बुझाती हुयी...सुन्दर साम्य..

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  9. अलग अंदाज में बढ़िया सृजन किया है आपने,...

    सुनील जी,..बहुत दिनों से मेरे पोस्ट पर नही आये
    जब कि मै आपका नियमित पाठक हूँ,....आइये,...

    RESENT POST...काव्यान्जलि ...: बसंती रंग छा गया,...

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  10. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है।
    चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं....
    आपकी एक टिप्‍पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  11. ओह !!
    पेट की जलन के साथ अति मार्मिक रचना ,आँख भर आई

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  12. वाह!!!
    अदभुद अभिव्यक्ति...

    बहुत खूब.

    सादर.

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  13. पुरानी समस्या....नया अंदाज़...
    गहरी सोच..

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  14. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 27 अगस्त 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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