आज मै आपके सामने कुछ शेर ऐसे पेश कर रहा हूँ जिनके साथ शरारत की गयी है ।
जिनके हांथों मैंने दिया था फूल कभी ।
उन्हीं के हाँथ का पत्थर आज मेरी तलाश में हैं ।
बरसती हुई बरसातों में और टपकती हुई रातों में ।
अक्सर हम यह सोंचते हैं खटिया कहाँ पे डाली जाये ।
देख हम तेरी जुल्फ़ के कितने चाहने वाले हैं ।
तभी तो तेरे दो चार गेसू , हर निवाले में हैं ।
जिनके हांथों मैंने दिया था फूल कभी ।
उन्हीं के हाँथ का पत्थर आज मेरी तलाश में हैं ।
बरसती हुई बरसातों में और टपकती हुई रातों में ।
अक्सर हम यह सोंचते हैं खटिया कहाँ पे डाली जाये ।
देख हम तेरी जुल्फ़ के कितने चाहने वाले हैं ।
तभी तो तेरे दो चार गेसू , हर निवाले में हैं ।

