शनिवार, दिसंबर 31, 2011

नये साल से नयी आस.....

कुछ ग़म कुछ परेशानियों से, 
पहचान अपनी अच्छी हैं|
फिर नए साल में उनको अपना दोस्त, 
बनाने में बुराई क्या हैं |

हमको मालूम है कि नहीं बदलेगी, 
नए साल में किस्मत अपनी |
फिर  भी नये साल से नयी आस| 
लगाने में बुराई क्या हैं| 


                नव वर्ष की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें  



बुधवार, दिसंबर 28, 2011

चंद शेर इधर उधर से......

जब कभी भी आँधियों का ज़िक्र  आयेगा |
तब टूटे हुए  गुंचे भी याद आयेंगे |


जिस बज़्म में वफ़ा का ज़िक्र हो रहा होगा |
उस वक्त हम भी ज़रूर याद  आयेंगे |

रुख से नकाब हटाने से क्या फायदा होगा |
चाँद शरमा कर छुप जायेगा अँधेरे छा जायेंगे 

लचकती साख पर जो ज़ोर आजमा रहा होगा |
नाम उनके कमजोर की फ़ेहरिस्त में आयेंगे |

रविवार, दिसंबर 25, 2011

नारी के रूप और चेतावनी ........


बेटी जो पुकारोगे तो,
गले में झूल जाएगी |
बहन जो बनाओगे तो,
राखी बांध जाएगी |


पत्नी जो मानोगे तो,
यह प्यार बरसायेगी|
समझोगे माँ इसे  तो,
आँचल में छिपाएगी |


खिलौना जो समझोगे तो, 
यह खेल भी दिखाएगी   |
पर  खेल ही खेल में,
यह प्राण हर जाएगी |




गुरुवार, दिसंबर 22, 2011

काश !

चौराहे पर खड़ा 
एक मोटर साईकिल सवार| 
कर रहा था 
हरी बत्ती का इंतज़ार|
पड़ोस में खड़ी थी एक कीमती कार,
आधी खुली  खिड़की से कुत्ते का बच्चा
झाँक रहा था बाहर|
वह सवार, उस कुत्ते के बच्चे को ,
निहार रहा था बार बार 
कर रहा था उसको दुलार |
तभी पीछे से आवाज़  आई
भूखा हूँ दे दो कुछ मेरे भाई|
वह जानता था उसकी किस्मत में ,
गालियाँ  के सिवा खाने को कुछ नहीं है |
मगर प्रयास करने में जाता कुछ नहीं हैं |
कुत्ते के बच्चे की मिल रहा था, 
प्यार और दुलार| 
और उसको मिल रहीं थीं ,
गालियाँ और दुत्कार |
गाड़ियाँ चली गयीं थी 
बत्ती हरी हो गयीं थी |
कुछ सोंच कर मुस्कराया 
और मुंह से निकला  काश ! 

सोमवार, दिसंबर 19, 2011

बाल विवाह एक अभिशाप .........




गुड्डे और गुड़ियों का
व्याह जो रचाती है |
अगले ही पल वह ,
ख़ुद दुल्हन बन जाती हैं |

 जो पिता नहीं कह पाती, 
वह पत्नी क्या कहलाएगी | 
जो दूध अभी पीती है, 
वह दूध क्या पिलाएगी |

नाम तो दिया हैं तुमने,
इसको कन्यादान का| 
और दान दे दिया ,
 एक कन्या की जान का |

(चित्र गूगल के सौंजन्य से )

गुरुवार, दिसंबर 15, 2011

एक नवोदित कवि का दर्द......( व्यंग्य)

आज एक पूर्वप्रकाशित रचना प्रस्तुत है कारण यह है कि यह रचना मेरे उस समय की है |
जब मेरे ब्लॉग पर पाठकों कि संख्या बहुत कम होती थी|   

जब हम कविता लिख रहे होते है तब हम शब्द पकड़ते है| 
जब रचना लिख चुके होते है तब श्रोता पकड़ते है |
इस धर पकड़ के खेल का अंत तब हो जाता है |
जब किसी नवोदित कवि की पकड़ में कोई श्रोता आ जाता है  |
जब वह कवि श्रोताओं के पकड़ने की कला में पारंगत हो जाता 
तब जाकर किसी कवि-सम्मलेन का निमंत्रण पाता  है |
कवि-सम्मेलन में सबसे पहले सरस्वती वंदना की बारी आती है |
पहले एक कवयित्री  सरस्वती वंदना करती है |
फिर चार रचनाओं के बाद भी बंद  ना करती है |
नवोदित कवि हर रचना पर ज़ोर से ताली  बजाता है |
अपने मंच पर होने की याद, संचालक को दिलाता है |
तब जाकर वह कवि मंच पर पुकारा जाता , 
और देशी तमंचे की तरह एक फायर करके वापस आता है |
फिर मंच पर एक स्थापित कवि आता है |
वह मशीन गन की तरह फायर पे फायर करता जाता है |
कार्यक्रम के बाद स्थापित कवि को चेक थमा कर ,
कार में बिठाया  जाता है |
और नवोदित कवि को धन्यवाद दे कर, 

उसके रूट की  बस का नंबर बताया जाता है |
थका हारा कवि घर आता है |

मेज पर पड़े हुए संपादक के खेद सहित पत्रों को 
अपना मुंह चिढ़ाता हुआ पाता है |
आज वह अपनी रचनाओं को निठ्ल्लें पुत्र के समान पाता है |
अपने भविष्य के बारे में सोंच कर वह वर्तमान में मर जाता है |




सोमवार, दिसंबर 12, 2011

ऐसी अपनी इच्छा हैं.........

अपने उर के स्पंदन को,
बस जीवन मैंने मान लिया|
अपने उर के क्रंदन को
गीतों का मैंने नाम दिया| 
रुके साँस के साथ कलम भी 
ऐसी अपनी इच्छा हैं |
पटाक्षेप ही जीवन नाटय का, 
देगा हमको इसका उत्तर|  
चली है उसकी अपनी मर्जी,  
या मेरी इच्छा को मान लिया| 

गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

फिर यह क्यों ना बदला ..........


हम  बदले , तुम बदले 
जग बदला , सब बदला 
फिर यह क्यों ना बदला  
अब भी यही कहानी है| 
 भैया का तो नया है नेकर 
 बहन की फ्राक पुरानी हैं| 


(चित्र गूगल के सौन्जय से )

मंगलवार, दिसंबर 06, 2011

माँ की ममता और पिता का फ़र्ज़



माँ की ममता के  क़सीदे
पढ़ने भी  वाजिब हैं |
मगर एक बाप का फ़र्ज़ भी, 
परवरिश में कुछ कम नहीं होता|

कहीं से ढूंढ़ कर लाओं , 
ऐसा बाप इस दुनिया  में |
जिसे अपनी औलाद की, 
नाकामियों पर ग़म नहीं होता | 

(चित्र गूगल के सौंजन्य से )

शुक्रवार, दिसंबर 02, 2011

हास्य कविता, जन्म दिन.........

क्यों ? कुछ लोग अपना,
जन्मदिन धूमधाम से मनातें है |
जबकि अपने सीमित जीवन का,
एक वर्ष व्यर्थ में ही गंवातें हैं |
जहन में हमारे यही एक सवाल था|
जबाब हमारे दोस्त का बेमिसाल था|
हमारे यहाँ तो केवल पत्नी का
जन्मदिन धूमधाम से होता हैं|
क्योंकि टेंशन का एक वर्ष,
हमारे जीवन से कम होता हैं |


          आज मेरी पत्नी का जन्मदिन है


                    डिस्क्लेमर 
(इस रचना का संबध किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति की पत्नी  या मेरी पत्नी से नहीं हैं )

सोमवार, नवंबर 28, 2011

मतला और एक शेर............

साज़िशें हवाओं ने कुछ
मेरे साथ  इस तरह कीं|
दिल सुलगता देखकर, 
रुख अपना हमारी ओर कर दिया |  


मेरी मुहब्बत का सिला ,
मेरे महबूब ने इस तरह दिया |
बुला कर बज़्म में अपनी, 
मुझको बेगाना कह दिया | 

शुक्रवार, नवंबर 25, 2011

यह भी हमारी ही बेटियाँ है........


 फूलों को हमने हँसते देखा 
 और कलियों को मुस्काते |
 चंचल लहरों को भी देखा ,
 सागर में हरदम  मौज  उड़ाते |
 माना दुःख  से इनका  रिश्ता ,
 मगर ख़ुशी से परिचय भी है |
 थोड़ा सा  सुख दे कर देखो 
 तुम इनका यह चेहरा भी |
 जिसे देख कर लगेगा तुमको ,
 यह जानते हैं हँसना भी |  



आज एक  पूर्व प्रकाशित रचना मेरी पसंद से ..................

(चित्र गूगल के सौंजन्य से   

मंगलवार, नवंबर 22, 2011

कुछ अजीब से हालात है ..........



तुम छिप छिप कर अब  मुझसे मिलने आना,
अब हर रस्ते पर कुछ आँखें पहरा देती हैं |

आना , मिलना पर कुछ ना कहना तुम मुझसे,
अब तो दीवारें भी  हरदम  चौकन्नीं   रहती हैं |

तुमने कब ,क्या बोला अब कुछ भी याद नहीं ,
अब बस अनकही बात ही मेरे जहन में रहती है |

कसमें -वादे, प्यार की बातें  यह , दिल की मज़बूरी है ,
माना यह सब सच हों, पर मुझको झूठी लगती हैं |


(चित्र गूगल के सौंजन्य से )

रविवार, नवंबर 20, 2011

फिर चुनाव आने वाला है ..........

एक बार फिर चुनावों का बिगुल बज गया तरह तरह के  वादों  के साथ हमारे नेतागण
मैदान में आ गए |कोई स्विस बैंक से पैसा बापस ला रहा है तो कोई भ्रष्टाचार मिटा रहा 
है |कोई देश को एक बार फिर स्वतंत्र कराने की बात कर रहा है तो कोई गढ़े मुर्दे उखाड़  
कर, न्याय दिलाने की बात, कुल मिलकर बात ही बात ......
कभी कोई  गंगा आरती करती हैं तो कभी कोई  अजमेर शरीफ में चादर चढ़ाता है ... 
कितना अच्छा लगता है यह सब  देख कर कि यहाँ सब धर्म एक सामान हैं |
हमारे नेता हर आदमी को जागरूक कर रहे हैं तुम एक आदमी ही नहीं तुम हिदू हो ,सिख
हो मुसलमान हो या ईसाई |कुछ तो इसके आगे भी समझा रहे हैं | (जो मैं लिख नहीं सकता)कहने का अर्थ यह है एक आम आदमी इनके लिए बस एक वोट बन गया हैं |



क्यों लिए फिरता है वह मजहब के  झंडे हाथ में,
क्या मालूम हो गया अपना मजहब  उसको  या  फिर चुनाव आने वाला है |

क्यों सुनाई दे रहीं मस्जिदों से घंटियाँ और मंदिरों से अजान,
या तो कोई सिरफिरा गया है उधर या फिर चुनाव आने वाला है |

यह गुजरात और गोधरा फिर क्यों सुर्ख़ियों में हैं,
या तो  अपनी गलतियों का अहसास हुआ है उन्हें  या फिर चुनाव आने वाला है |

यह आज कौन बनके हमदर्द मेरे घर आया,
या तो वह शख्स इन्सान बना है अभी या फिर चुनाव आने वाला हैं |



बुधवार, नवंबर 16, 2011

ओल्ड एज होम ( लघुकथा)



आज अचानक किसी ओल्ड एज होम में जाने का विचार आया , केवल यह देखने के लिए
कैसे रहते हैं वह लोग जिनके अपने, उन्हें यहाँ छोड़ गए हैं |यह विचार कई बार मन में  
आया ऐसी कौन सी मज़बूरी होती है जिन माँ बाप, जिहोने उन्हें पाला पोसा जीवन के  
सारे सुख दिए| आज वह यहाँ मरने के दिन गिन रहे हैं |जैसे ही अन्दर गया वातावरण    बिलकुल सामान्य लगा कुछ लोग पेपर पढ़ रहे थे कुछ टीवी देखने में व्यस्त थे |
कुछ बुढ़ी ओरतें पूजा पाठ में लगीं थीं तो कुछ बात करने में |कुल मिला का एक सामान्य 
वातावरण की सारी शर्तें पूरी हो रहीं थीं |
उसी कमरे के एक कोने में बैठे हुए बूढ़े व्यक्ति से मैंने कहा " अंकल नमस्ते "उसने सर 
उठा कर हाँ कहा और बोला आप किसी पत्रिका या अखवार से है जो  हमारे जीवन पर कोई 
कहानी लिख रहे हैं |लिख दीजिये हम यहाँ अपने हाल पर खुश हैं हमें किसी की दया नहीं 
चाहिए | तभी उसने बोलना शुरू किया मेरा नाम सुरेन्द्र मोहन शर्मा है मैं एक निजी कंपनी 
में हेड क्लर्क के पद से रिटायर हुआ मेरी शादी आज से तीस साल पहले हुई और  दो   
साल के बाद ही वह दूसरी शादी करके छोड़ कर चली गयी, कारण संस्कारों की दीवार थी |
छोड़ गयी एक बच्चा ....एक कहावत के अनुसार यदि माँ हुई दूसरी तो बाप हुए तीसरे 
मैंने शादी नहीं की | दो साल पहले वह भी शादी करके अलग हो गया कारण था बदलता 
वक्त ..... और फिर मैं यहाँ  आ गया |यह कह कर उसने पीछे रखे टीन के बक्से में 
से एक शादी का लाल जोड़ा और एक जोड़ी बचपन के छोटे कपडे निकाल कर दिखाए |
यही वह दो निशानी जब मैं खुश था | मैंने कहा अंकल कोई फोटो नहीं हैं ? वह बोला 
थे मगर फाड़ दिए |क्योंकि उनकी फोटो देख कर जब मैं और लोगों को देखता था तो  
उनकी शक्ल इस दुनिया के बहुत से लोगों से मिलती थी | जिसे देख कर मैं सहम जाता  
था| वैसे मैं यह जानता हूँ कि सब लोग एक जैसे  नहीं होते ........और मुस्करा कर 
बोला "यह दुनिया बहुत खूबसूरत है" .............. 
  

शनिवार, नवंबर 12, 2011

जबरदस्ती की मुबारकबाद (ब्लोगिंग के नाम चंद शेर )

लीजिये हम भी शामिल हो गए दो सौ फालोअर के ब्लोगरों  की जमात में ( इसमें मेरा कोई योग्यदान नहीं है )अब मेरा नैतिक  कर्तव्य होता है कि मै आप सभी का आभार व्यक्त करूँ ,धन्यवाद दूँ और प्राथर्ना करूँ किअब मुझे छोड़ कर मत जाना ( बड़ी बदनामी होती है ) छोडिये इन बातों को , यह आवश्यक औपचारिकता के अंतर्गत आतीं हैं |
लगभग बीस महीने कि ब्लोगिंग में मेरा जो अनुभव रहा वह शेरों में कहने कि कोशिश कर रहा हूँ |यह बदलते मिज़ाज की ग़ज़ल हैं |

दिल में जो भी आये  वह ब्लॉग में  लिख दीजिये ,
क्यों बेवजह दिल में बातों का एक ज़खीरा बनाया जाये |

छिपे हैं दर्द, जो मेरे दिल के किसी कोने में,
चलो एक  पोस्ट के  जरिये, उन्हें अब सामने लाया जाये |

वह पौधा , जो कल एक दरख़्त की शक्ल पा जायेगा   |
आओ उसमें कुछ मशविरे की खाद और हौसले का पानी लगाया जाये |

ग़र फ़ुरसत मिल गयी हो किसी नामचीं शायर को दाद देने से , 
चलो अब कुछ नौजवानों को भी हौसला बढ़ाया जाये |

आओ चलो दो चार नए ब्लोगों को टिपिया जाये |
और अपने लिए एक नया फालोअर  भी कहीं से लाया जाये |

किसी की टांग का खींचना यहाँ खेल अगर ब्लोगिंग है|
तो फिर क्यूँ ना यह खेल, ओलम्पिक में भी खिलवाया जाये |


   

बुधवार, नवंबर 09, 2011

यह सब क्या है ? ( चंद शेर )



कुछ लोग मरने मारने को तैयार हुए बैठे हैं|
और कुछ लोग अपने हांथों में तलवार लिए बैठे हैं, 

ना जानें किस  फ़ितरत के मालिक हैं वह,
जो इस आग में सेंकने को हाथ तैयार लिए बैठे हैं| 

ना जानें कौन से पढ़ी है किताब उन लोगों ने,
जो दहशतगर्दी को भी एक नया नाम दिए बैठे हैं|    

कहीं शर्मसार ना हो जाये यह इंसानियत अपनी ,
हम तो हर लाश के लिए कफ़न तैयार लिए बैठे हैं| 



शनिवार, नवंबर 05, 2011

व्यर्थ आंसू .......




मत बहाओ,
व्यर्थ
तुम अपने  यह आँसू |
ना ही कोई
दया का सागर उमडेगा
और ना ही कोई ,
आएगा
भावनाओं का सैलाब |
क्योंकि
गिर रहे हैं
तुम्हारे यह आँसू
संवेदनहीनता  की रेत पर|
 
 

मंगलवार, नवंबर 01, 2011

टुकड़ों -टुकड़ों में बँटी हुई ज़िन्दगी......


टुकड़ों -टुकड़ों में 
बँटी हुई यह जिन्दगी |
हर एक  टुकड़ा 
मांगता है अपना हिसाब 
मजबूर हूँ तलाशने को ,
उनके लिए रोज़ , 
नये नये जबाब| 
अपने दायित्वों का, 
बोझ में बदल जाना |
जिन्दगी की रफ़्तार को 
कुछ और कम कर जाना |
थकें मांदें सूरज का 
झूठा आश्वासन 
कल नया सूरज देगा, 
एक नया जीवन |
अब बन चुका है 
एक  चक्र ,
मन के सन्नाटे में, 
गूंजता है केवल एक प्रश्न |
क्या यही है जीवन ?
सुनाई पड़ती है प्रतिध्वनि
हाँ यही है जीवन ..............



शुक्रवार, अक्तूबर 28, 2011

जनता की मांग और उसकी चेतावनी

भ्रष्टाचार का बाज़ार आजकल  गर्म है | सभी राजनैतिक पार्टियाँ इसको मुद्दा बना कर सत्ता 
पर कब्ज़ा करना चाहते हैं |एक दुसरे को नंगा करने में सब लगे हुए हैं |यह सब तमाशा, 
बेचारी जनता को दिखा करआने वाले चुनावों में वोट पाने की यह एक तरकीब सिद्ध हो रही है| 
बेचारी जनता के  कुछ समझ में नहीं आ रहा है वह क्या करे ? और हमारे नेतागण एक 
के बाद एक खेल दिखाते जा रहें है | पता नहीं किस खेल पर जनता खुश हो जाये और  
ताली बजा दे और  उनको  वोट दे दे|क्योंकि जनता तो बहुत भोली  है ......
जनता क्या मांगती ?

तुमने क्या कमाया है यह हिसाब नहीं मांगती, 
कैसे वह कमाया है यह जबाब नहीं मांगती |
भूखी प्यासी जनता सोना चाँदी नहीं मांगती,
वह तो तन को एक कपड़ा और रोटी सुखी मांगती |

और अगर सरकार यह भी नहीं दे सकती तो उसके सरकार लिए एक चेतावनी भी यह जनता दे रही है | अगर इसको अनदेखा कर दिया तो क्या होगा .......
 जनता की चेतावनी !

जनता ही ने तो तुम्हें सिंहासन पर बिठाया है, 
एक आम आदमी से तुम्हें वी आई पी बनाया है|
जनता को जो भूलोगे तो यह तुम्हें भूल जायगी, 
सीट की तो छोडिये आपकी ज़मानत भी जायगी| 




मंगलवार, अक्तूबर 25, 2011

दीवाली की कथाएं

 आज मैं आपके सामने दीपावली की एक दन्त कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ | जो लक्ष्मी पूजन के समय सुनाई जाती है| किसी गाँव मैं एक गरीब लकड़हारा अपने सात पुत्रों के साथ रहता था सातों के सात पूरे निकम्मे कोई कार्य नहीं करते सिवाय खाने के ,इस बात को लेकर लकड़हारा काफ़ीचिंतित था | पत्नी की मृत्यू के बाद तो दरिद्रता ने अपना स्थायी निवास उसके घर कोही बना लिया था| गाँव के लोगों ने सलाह दी की तुम अपने बेटे का विवाह कर दो तो घर में लक्ष्मी आयेगी और तुम्हारे दिन बदल जायेंगे |
उसने उनकी बात मान कर अपने बेटे का विवाह उसी गाँव की कन्या से कर दिया विवाह के पश्चात् बहू ने घर का सारा काम जल्दी ही संभाल लिया और अपने सभी देवरों से कहा की  आज के बाद तुम लोगों को कुछ ना कुछ काम अवश्य करना है और जो भी कमा के लाओगे वह मुझे दे देना | एक दिन उसका एक देवर आया और बोला " भाभी देखो हम क्या लायें हैं " देखा तो उसकी चप्पल में गोबर लगा हुआ था भाभी ने हंस कर
कहा अगर मेहनत से लाये हो तो संभाल कर रख दो |
अगले दिन दूसरा देवर आया और हंस कर बोला देखो भाभी हम क्या लाये हैं वह एक मरा हुआ सांप लाया था भाभी का वही उत्तर था संभाल कर रख दो |
एक दिन उसी राज्य के राजा की रानी जब स्नान कर रहीं थीं तो उनका नौलखा हार एक कौआ ले उड़ा राजा ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया जो कोई भी हार लाकर देगा उसे मुंह माँगा ईनाम दिया जायेगा | कुछ दिन के बाद जब नरक चौदस आया तो घर की सफाई की गयी देखा तो हार लकड़हारे की छत पर पड़ा हुआ है और मरा हुआ सांप वंहा से गायब है | यह देख कर लकड़हारा बहुत खुश हो गया और राजा के पास जाने लगा यह सोंचता हुआ कि वह मुंह मांगी दौलत मांग लेगा और बाकी जीवन आराम से बीत जायेगा |मगर उसकी बहु ने कहा जो मैं कहूँ वही मांगना | बहु ने राजा से कहा कि सारे गाँव की रुई दीया और तेल मुझे दिया जाये
क्योंकि राजा वचन दे चुके थे अत पालन करना भी आवश्यक था राजा ने तुरंत ही यह आदेश दे दिया कि पूरे गाँव का दीया तेल और रुई लकड़हारे के घर भेज दी जाये |
अगले दिन जब दिवाली कि रात आयी तो पूरे गाँव में अँधेरा और लकड़हारे के घर रौशनी रात को जब दरिद्र ने देखा कि यंहा तो उसकी आँखें फूट रही हैं क्योंकि वह तो अंधरे का अभ्यस्त था इसलिए उसने जाने कि कोशिश कि तो दरवाजे पर बहू बैठी थी बोली जाना है तो सात पुश्तों के लिए जाओ दरिद्र ने परेशान हो कर उसकी शर्त मान ली और घर से निकल गया|
इसके बाद जब रात में लक्ष्मी निकली वह भी परेशान अंधरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा तब उन्हें लकडहारे का घर दिखाई दिया वह आयीं और बोली मुझे अन्दर आने दे मेरे पैर में कांटा चुभा जा रहा है| बहु ने वही कहा आना है तो सात पुश्तों के लिए आओ कोई विकल्प ना होने का कारण लक्ष्मी ने उसकी यह शर्त भी मान ली और उसके घर निवास करने लगीं |
जिस तरह लकडहारे के दिन बहुरे उसी प्रकार सबके दिन बहुरे ...........

अब डाक्टर सरोजनी प्रीतम की एक क्षणिका ....

अपने सर पर
हमेशा सवार  
रहने वाली पत्नी
को लक्ष्मी का नाम देकर
अपने को एक
नयी संज्ञा दी

इस आशा के साथ आप पर भी गृहलक्ष्मी और लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई ....

शनिवार, अक्तूबर 22, 2011

कल आज और सच्चाई .....





कल 

कल सरेआम लुटी  थी  एक अस्मत ,
जो काफ़ी थी इंसानियत के शर्मसार के लिए |

और तरस कर पथरा गयीं आँखें उसकी,
देखने को बस एक अदद मददगार के लिए |

आज 

कल जो तमाशायी भीड़ का हिस्सा  बने थे लोग ,
वह आज सुना रहें हैं सज़ा गुनहगार के लिए |

कुछ कलम के सिपहसालार भी खुश हो कर घूमते है, 
अच्छी ख़बर मिली है कल के अख़बार के लिए |

सियासत के एक हलके को मुद्दा भी मिल गया ,
कल वह मुश्किल खड़ी करेंगे सरकार के लिए |

कुछ मजलिस ए खवातीन भी सड़कों पे आ गए 
मौका मिला था उनको अपने इश्तहार के लिए |

जो मुफ़लिसी के दौर से गुजर रहा था आजकल ,
कुछ राहत सी मिल गयी थी उस थानेदार के लिए |


सच्चाई 

हाँलाकि यह हादसा सब को कुछ ना कुछ दे गया, 
और बस एक ज़ख्म दे गया किसी खुद्दार के लिए | 




(चित्र गूगल के सौंजन्य से ) 

मंगलवार, अक्तूबर 18, 2011

एक पिता की चिंता .........




कूद कर मेरी बेटी का 
गोद में बैठ जाना 
गलें  में बाहें डाल कर ,
कुछ माँगना
और हँसकर,मेरा उसकी ,
 मांग को पूरी करना |
मगर आज, माँगा है उसने ,
सलवार और कुर्ता,
फ्राक के बदले |
क्योंकि वह हो गयी है बड़ी|
अचानक मेरा ,
गहरी सोंच में डूब जाना   
डर कर सहम जाना |
उसे इस वहशी समाज ,
 से कैसे है बचाना ?


शनिवार, अक्तूबर 15, 2011

ठूँठ और झाड़ी.........



झाड़ी की कुटिल मुस्कान 
और ठूंठ पर कटाक्ष ,
क्या मिला तुमको ?
सह कर आँधियों के  थपेड़े ,
और मौसम का कहर |
बढ़ना सूखना और टूट कर गिरना ,
यही था तुम्हारा जीवन चक्र 
फिर लकड़हारों की टोलियों का 
तुम पर टूट पड़ना |
पल भर में ,
बना देना तुम्हें एक ठूँठ |
और मैं हंसती खेलती हूँ 
हवाओं के साथ आज भी |
ठूँठ की मधुर मुस्कान,
और दिया झाड़ी को उत्तर   
मैंने दिया , निमंत्रण पास आने का 
पथिकों को छाया 
और परिंदों को आशियाँ |
और तुमने दिया भय, 
काँटों के चुभने का 
और सबको तुमसे दूर रहने का |


मंगलवार, अक्तूबर 11, 2011

ऐसा भी होता है ............




ज़मीं पर जब जुगनुओं की
एक  महफ़िल सजी , 
आसमां पर सितारों के   , 
 ना जाने क्यूँ, दिल जल गए |

 और मेरा महबूब जब    
उस बज़्म में शामिल हुआ  ,
तब चाँद की पेशानी पे, 
ना जाने क्यूँ,सैकड़ों बल पड़ गए |


(चित्र गूगल के सौंजन्य से)

शुक्रवार, अक्तूबर 07, 2011

इसे मैं क्या कहूँ ?........





मैंने आज तक उसको, 
कभी  बेवफा कहा ही नहीं |
मगर वफ़ा की बात हो तो ,
उसका ज़िक्र भी अच्छा नहीं लगता |

ज़रूर उसकी बेवफायी भी
एक मज़बूरी रही होगी |
मेरे इस भरम का टूटना भी , 
मुझे कभी अच्छा नहीं लगता |

(चित्र गूगल के सौंजन्य से) 


शनिवार, अक्तूबर 01, 2011

रिश्तों का सोफ्टवेयर














रिश्तों की फाइल से, 
बना है परिवार का फोल्डर |
क्यों नहीं होता ओपन ?
क्या लगा है कोई वायरस |
मंथन के एंटीवायरस से 
स्केन करने पर पाता हूँ ,
रिश्ते की एक फाइल में 
अहंकार का वायरस |
रिमूव  करने के
कई  असफल प्रयास ,
और पूरी फाइल को डिलीट करने का 
अंतिम निर्णय |
मगर  फिर हो जाता हूँ असफल ,
क्योंकि मेरे ह्रदय के सिस्टम में
इंस्टॉल है ,
प्रेम और आत्मीय संबंधों का 
एक सोफ्टवेयर   .............





शनिवार, सितंबर 24, 2011

जीने का यह अंदाज़.........


जो अपने उसूलों पर, 
अपनी जिन्दगी जी रहा होगा |
जरुर उसका दोस्ताना भी, 
मुफ़लिसी से रहा  होगा |

जब वह इन्सान बनने की,
कोशिश कर रहा होगा| 
जरुर कोई इसको उसका,
पागलपन कह रहा होगा |


मंगलवार, सितंबर 20, 2011

बेटियों पर यह कैसा अत्याचार .......

बेटियों पर हो रहा, 
यह कैसा अत्याचार है |
एक आँख  रो रही है, 
और एक शर्मसार  है |

सृष्टि की रचना तो, 
देवों का उपकार है|
फिर क्यों उस मानव का, 
यह दानव सा व्यवहार है |

लक्ष्मी और दुर्गा का, 
नाम यहाँ पाती हैं|
जो कोख में तो बच गयीं 
फिर यहाँ मारी जाती है|

बेटी चाहे निर्धन की हो 
या हो वह धनवान की|
बेटी चाहे हिन्दू को 
या हो मुसलमान की  
बाज़ारों में बिकती है 
तो बेटी बस इन्सान की| 
और विदेशों में बिकती है जब, 
तो बस इज्ज़त हिंदुस्तान की|  


शनिवार, सितंबर 17, 2011

यह शख्स ......




मत कहो कि यह शख्स ,
सड़क पर नंगा पड़ा है |
धरती बिछौना है इसका ,
 इसने तो आसमान ओढ़ा है|

यह शख्स जो प्यास से,
बेहोश हो कर गिर पड़ा है|
उसने तो अपने आँखों में,
समुन्दर छिपा के रखा है|

गुरुवार, सितंबर 15, 2011

मेरा ख़त .........चंद शेर


इस ख़त में कुछ लफ्ज़   ,
खून ए ज़िगर से भी लिखे हैं |
नुक्ते की जगह मैंने , 
आँख का मोती लगा के रखा है

वह लफ्ज़ जिन्हें तेरे ख़त में 
मैं शामिल ना कर सका 
  उनको मैंने बस तेरी , 
ग़ज़ल के लिए बचा कर रखा हैं |

  

सोमवार, सितंबर 12, 2011

सीनियर सिटिजन स्पेशल....(.लघुकथा)


बस स्टेंड के पास एक चाय की छोटी सी दुकान जिसमें केवल चाय और बिस्कुट के 
सिवा कुछ भी नहीं इसके अतिरिक्त दो बेंच और अलग अलग भाषाओँ के तीन अख़बार
इन सब का मालिक है शंकर हँसमुख| नाम तो केवल शंकर था हँसमुख तो उसके व्यवहार 
को देख कर इस महानगर के लोगो ने लगा दिया था | शंकर की इंट्री बीस साल पहले  इस 
शहर में छोटू यानि होटल में काम  करने वाले बच्चों  के रूप में हुई थी | आज वह एक तेरह 
 साल के लड़के का बाप है| जिसे ड्रेस पहन  कर और टाई लगा कर स्कुल जाते देख उसकी 
ख़ुशी छिपाए नहीं छिपती | एक पाँच  रुपये का सिक्का शंकर के जेब में हर सुबह रहता बेटे 
की जेबखर्च के लिए या यूँ कहें ज़रूरत के लिए ........
सुबह छ बजे से लेकर नौ बजे तक का पीक आवरऔर उसके बाद शुरू होता घर के बूढ़े लोगों 
का आना जो कोई सामान खरीदने के नाम से निकलते  और एक  कट चाय जिसका नाम
सीनियर सिटिजन स्पेशल रखा था , पी कर, बतियाकर और सभी अख़बारों को 
आराम से पढ़ कर जाते थे | इस बीच में शंकर भी उनसे हाल - चाल पूछ लेता था |
शंकर ने गुप्ता जी से पूछा " साब आजकल शर्मा जी नहीं आ रहे हैं तबियत तो ठीक है ना "
गुप्ता जी ने कहा ऐसी कोई बात नहीं है मै तो रोज उन्हें छत पर अकेले बैठे हुए देखता हूँ |
अचानक एक दिन शर्मा जी दुकान के सामने से निकले तो शंकर ने पूछ ही लिया "क्या बात 
तबियत तो ठीक है सुगर उगर तो नहीं बढ़ा , चाय क्यों बंद कर दी?
शर्मा जी ने जबरदस्ती की मुस्कराहट चेहरे पर लाते हुए कहा भाई मंहगाई बढ़ गयी और 
बेटे ने जेबखर्च बंद कर दिया है |
यह सुनते ही शंकर ने अपनी जेब में पड़े हुए पाँच के सिक्के को जो उसने अपने बटे के जेबखर्च 
के लिए रखा था कस कर भींच लिया ...............