गुरुवार, दिसंबर 15, 2011

एक नवोदित कवि का दर्द......( व्यंग्य)

आज एक पूर्वप्रकाशित रचना प्रस्तुत है कारण यह है कि यह रचना मेरे उस समय की है |
जब मेरे ब्लॉग पर पाठकों कि संख्या बहुत कम होती थी|   

जब हम कविता लिख रहे होते है तब हम शब्द पकड़ते है| 
जब रचना लिख चुके होते है तब श्रोता पकड़ते है |
इस धर पकड़ के खेल का अंत तब हो जाता है |
जब किसी नवोदित कवि की पकड़ में कोई श्रोता आ जाता है  |
जब वह कवि श्रोताओं के पकड़ने की कला में पारंगत हो जाता 
तब जाकर किसी कवि-सम्मलेन का निमंत्रण पाता  है |
कवि-सम्मेलन में सबसे पहले सरस्वती वंदना की बारी आती है |
पहले एक कवयित्री  सरस्वती वंदना करती है |
फिर चार रचनाओं के बाद भी बंद  ना करती है |
नवोदित कवि हर रचना पर ज़ोर से ताली  बजाता है |
अपने मंच पर होने की याद, संचालक को दिलाता है |
तब जाकर वह कवि मंच पर पुकारा जाता , 
और देशी तमंचे की तरह एक फायर करके वापस आता है |
फिर मंच पर एक स्थापित कवि आता है |
वह मशीन गन की तरह फायर पे फायर करता जाता है |
कार्यक्रम के बाद स्थापित कवि को चेक थमा कर ,
कार में बिठाया  जाता है |
और नवोदित कवि को धन्यवाद दे कर, 

उसके रूट की  बस का नंबर बताया जाता है |
थका हारा कवि घर आता है |

मेज पर पड़े हुए संपादक के खेद सहित पत्रों को 
अपना मुंह चिढ़ाता हुआ पाता है |
आज वह अपनी रचनाओं को निठ्ल्लें पुत्र के समान पाता है |
अपने भविष्य के बारे में सोंच कर वह वर्तमान में मर जाता है |




42 टिप्‍पणियां:

  1. वाह सर आपने एक कवि के दर्द को खूब पकड़ा है.
    सुंदर रचना. आभार.

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  2. Only an established poet like you can write such an appealing creation ! Beautiful !

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  3. सटीक बात लिखी थी आपने , अच्छी कविता तब भी और आज भी निरंतर ये कोई अतिशयोक्ति नहीं बधाई

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  4. @आज वह अपनी रचनाओं को निठ्ल्लें पुत्र के समान पाता है |
    अपने भविष्य के बारे में सोंच कर वह वर्तमान में मर जाता है |
    सहज अभिव्यक्ति!

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  5. बहुत खूब, सबके मन का कष्ट रहा होगा यह।

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  6. प्रभावी प्रस्तुति ||
    बधाई भाई ||

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  7. इस दर्द कॊ हम भी झेल रहे हैं।

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  8. कवि यदि फंसने-फंसाने का धंधा छोड़ दे और मस्त हो जाये अपनी रचनाएँ लिखते समय ही...तब उधारी का झंझट ही खत्म..

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  9. आज वह अपनी रचनाओं को निठ्ल्लें पुत्र के समान पाता है |
    अपने भविष्य के बारे में सोंच कर वह वर्तमान में मर जाता है |
    Aah!

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  10. वाह क्या बात है बहुत सरल शब्दों में आपने हर नए लेखक के मन की बातों को कह दिया,,, बहुत खूब...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  11. अब अधिक टिप्पणियां मिल गई सुनिल भाई... बधाई हो:)

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  12. कमाल का लिखते हैं आप।जीवन का कटु सत्य है....... ।

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  13. एकदम सही बात कही ....अच्छी कविता!!!!!

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  14. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी से सहमत हूँ :)
    ......वैसे सरल शब्दों में बड़ी बात कही है !

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  15. नवोदित कवि की पीड़ा को बड़े दिलचस्प तरीके से दर्शाया है आपने . बहुत मजेदार .

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  16. naye lekhak kee maansik awastha ki bahut rochak abhivyakti.
    mere blog 'saajha-sansaar' par aapki aatmiye pratikriya mili, aabhar.
    shubhkaamnaayen.

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  17. सीधे और सरल शब्दों में रोचक ढंग से गहरी बात लिख दी है आपने .....बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  18. अपने भविष्य के बारे में सोंच कर वह वर्तमान में मर जाता है |

    सुनील जी बहुत बढिया व्यंग ...आभार

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  19. आज वह अपनी रचनाओं को निठ्ल्लें पुत्र के समान पाता है |
    अपने भविष्य के बारे में सोंच कर वह वर्तमान में मर जाता है |

    धारदार व्यंग. बढ़िया प्रस्तुति.

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  20. नवोदित कवि का दर्द :) सुन्दर प्रस्तुति.

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  21. :-)
    नए कवि की दशा ( दुर्दशा ) का बढ़िया चित्रण ...
    शुभकामनायें आपको !

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  22. नए कवियो कि दशा का बहूत हि बढीया चित्रण किया है
    बहूत खूब ..सार्थक रचना

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  23. कल 20/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  24. वाह. बहुत सुंदर
    कवियो कि दशा का बढीया चित्रण.
    सुन्दर प्रस्तुति.

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  25. बहुत खूब....एक दम सटीक व्यंग...
    पढ़ कर मज़ा भी आया ,दिल तार तार भी हुआ..

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