शनिवार, अक्तूबर 15, 2011

ठूँठ और झाड़ी.........



झाड़ी की कुटिल मुस्कान 
और ठूंठ पर कटाक्ष ,
क्या मिला तुमको ?
सह कर आँधियों के  थपेड़े ,
और मौसम का कहर |
बढ़ना सूखना और टूट कर गिरना ,
यही था तुम्हारा जीवन चक्र 
फिर लकड़हारों की टोलियों का 
तुम पर टूट पड़ना |
पल भर में ,
बना देना तुम्हें एक ठूँठ |
और मैं हंसती खेलती हूँ 
हवाओं के साथ आज भी |
ठूँठ की मधुर मुस्कान,
और दिया झाड़ी को उत्तर   
मैंने दिया , निमंत्रण पास आने का 
पथिकों को छाया 
और परिंदों को आशियाँ |
और तुमने दिया भय, 
काँटों के चुभने का 
और सबको तुमसे दूर रहने का |


33 टिप्‍पणियां:

  1. सही व्यंग्य, सिक्के के दोनों पहलुओं का सही प्रतिधित्व गुजर गया एक साल

    उत्तर देंहटाएं
  2. होता यही है झाड़ियां पनप रही है और पेड़ों क जड़ से काटा जा रहा है

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज के दौर पर सटीक है य‍ह रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सार्थक और सटीक चिन्तन को दर्शाती रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  5. यही मानवीय भावनाओं में भी व्यक्त होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्दर रचना है सुनील जी सचमुच
    बहुत बहुत बधाई हो आपको

    उत्तर देंहटाएं
  7. जो बचा लेता है खुद को दूसरों के काम कहाँ आता है... खुद को लुटा कर ही यहाँ अफसाने गढे जाते हैं...बहुत सुंदर कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  8. ठूँठ की मधुर मुस्कान,
    और दिया झाड़ी को उत्तर
    मैंने दिया , निमंत्रण पास आने का
    पथिकों को छाया
    और परिंदों को आशियाँ |
    और तुमने दिया भय,
    काँटों के चुभने का
    और सबको तुमसे दूर रहने का |...bahut hi badhiyaa

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
    शुभ-कामनाएं ||

    उत्तर देंहटाएं
  10. काँटों का ही बोलवाला है..सुन्दर संवाद

    उत्तर देंहटाएं
  11. हमारे जीवन में बहुत से ऐसे प्रसंग मिल सकते हैं ,,

    उत्तर देंहटाएं
  12. इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  13. सटीक चिन्तन, सार्थक अभिव्यक्क्ति. शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  14. मैंने दिया , निमंत्रण पास आने का
    पथिकों को छाया
    और परिंदों को आशियाँ ।
    और तुमने दिया भय,
    काँटों के चुभने का
    और सबको तुमसे दूर रहने का ।

    सत्कर्म करने वाले ही ज्यादा कष्ट सहते हैं।
    बढि़या कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  15. आद सुनील जी,
    आपकी रचनाएं नार्मल फॉण्ट में नहीं दिखती इसलिए पढ़ नहीं पाता...
    समझ नहीं आता यह मेरे सिस्टम की प्राब्लम है या कुछ और तकनिकी समस्या...
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  16. सार्थक और सटीक चिन्तन... . शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  17. हमारे आस-पास से बिम्ब उठाकर गहरी सीख देने वाली यह रचना.. सुनील जी आभार आपका!!

    उत्तर देंहटाएं
  18. Ab bhi mauka hai... pedon ko thunth hone se bachayen... kyonki unse chhaya to hame hi milni hai... Behtareen rachna

    उत्तर देंहटाएं



  19. ठूंठ और झाड़ी जैसे प्रतीकों को बिंब बना कर एक दर्शन की प्रस्तुति की है आपने अपनी कविता में …
    सुनील जी
    सादा लहज़े में बड़ी बात कहने के आपके अंदाज़ को मैं हमेशा से पसंद करता आया हूं … आभार… और बधाई इस रचना के लिए !

    त्यौंहारों के इस सीजन सहित
    आपको सपरिवार
    दीपावली की अग्रिम बधाइयां !
    शुभकामनाएं !
    मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  20. झाड़ी और ठूंठ का संवाद बहुत ही प्रभावशाली ......सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  21. प्रतीकों के माध्यम से सुन्दर बात उजागर हुई है!

    उत्तर देंहटाएं
  22. और दिया झाड़ी को उत्तर
    मैंने दिया , निमंत्रण पास आने का
    पथिकों को छाया
    और परिंदों को आशियाँ |
    और तुमने दिया भय,
    काँटों के चुभने का
    और सबको तुमसे दूर रहने का |
    sunder samvad
    badhai
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  23. ठूंठ और झाडी के माध्यम से मन की भाव्नाप्न को वुँक्त किया है ...

    उत्तर देंहटाएं
  24. मैंने दिया , निमंत्रण पास आने का
    पथिकों को छाया
    और परिंदों को आशियाँ |
    और तुमने दिया भय,
    काँटों के चुभने का.
    बहुत ही प्रभावशाली.

    उत्तर देंहटाएं