मंगलवार, मार्च 08, 2011

बाल कविताओं में व्यंग्यात्मक पुट


बाल कविताओं में व्यंग्यात्मक पुट ,  जी हाँ अचानक आज मुझे 
अपने बचपन की दो कवितायेँ याद आ गयीं | इनके रचियता  तो 
मुझे मालूम नहीं है मगर उनकी छाप मेरे जहन में आज भी है |
जहाँ तक मुझे ज्ञात है कि बाल कवितों का उद्देश्य शिक्षाप्रद होता है |
मगर इनका क्या उद्देश्य है | अब आप ही बताइए .....

       (१)

बिल्ली बोली चूहे भैया, 
आओं मिलाओ हाथ |
बिल में  क्यों छिप कर बैठे हो ,
मिल कर खेलो साथ |
चूहा बोला बिल्ली मौसी, 
मुझको ना बहलाओ |
आँगन में है कुत्ते मामा 
उनसे हाथ मिलाओ |

          (२)

डाक्टर देखो भली प्रकार ,
मेरी गुडिया है बीमार |
परसों बरसा रिमझिम पानी 
उसमे भींगी गुडिया रानी |
भींगे कपड़े दिए उतार,
फिर उसको  चढ़ा तेज  बुखार |
सौ के ऊपर डिग्री चार |
डाक्टर देखो भली प्रकार
जब तक गुडिया रहे बीमार 
तब तक पैसे रहे उधार| 


शुक्रवार, मार्च 04, 2011

आज बस मतला और एक शेर



 आज मै चिरागों को 
बुझाना चाहता हूँ |
मैं अकेला हूँ यह, 
 ज़माने को दिखाना चाहता हूँ | 

मौत को  तो गले ,
लगाना है एक  दिन |
मग़र ऐ ज़िन्दगी,
तुझे भी आजमाना चाहता हूँ | 



सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

गज़ल



कुछ तो करो तुम जिक्र, मेरे शहर का आज ,
माना कि तुमसे मेरा , अब कोई वास्ता नहीं |

   देख कर दीबार तुमने अपना रास्ता बदल लिया |
  सोचा कि तुमने आगे, अब  कोई रास्ता नहीं |

 अचानक मुझको देख कर क्यूँ  परेशान हो गए |
 दुनिया है कितनी छोटी, शायद तुमको पता नही |

 अपने मिलकर विछ्ड़ने का जो यह हादसा हुआ |
 ना कसूर था तुम्हारा, और इसमें मेरी भी ख़ता नहीं |

 टूटा ज़रूर हूँ मै, मगर बिखरा नहीं अभी तक  |
 किस चीज से बना हूँ, यह मुझको पता नहीं | 



शुक्रवार, फ़रवरी 25, 2011

न्याय या सौदा ?



सामने  के प्लाट में खुदाई का काम तेजी से चल रहा था | सुनने 
में आया कि एक बहुमंजिला  ईमारत बनने वाली है | मजदूरों के 
साथ साथ मशीनों का शोर भी मुझे परेशान कर रहा था | मजदूर 
एक दुसरे से मजाक करते हुए अपने काम में लगे रहते और 
बीच बीच में ठेकेदार कि गालियाँ  भी खाते रहते थे | उन्ही में था एक
राम  खिलावन बीस बाईस साल का हंसमुख  नौजवान , उसके साथी 
उसे छेड़ते हुए पूछते थे "व्याह  तेरा होगा की नाहीं या कुंबारा ही मरिहो?
वह बहुत रौब से कहता था" देखना  इ  जेठ में शादी ओउर अगले जेठ में 
लड़का" सब इस पर हँसते और अपने कम पर लग जाते |
कुछ दिनों के बाद वह अपने गाँव गया और शादी करके अपनी बीबी 
के साथ एक टीन का बक्सा और साईकिल भी लेके आया |
रोज सुबह शाम को टीन का बक्सा बजा कर गाना गाता" हमरे अंगना खेले मोरा लाल " कुछ दी तक सब सामान्य रहा |
 फिर एक दिन अचानक ठेकेदार की नजर उसकी बीबी पर पड़ी
 फिर  वही हुआ जिसका डर था |
पुलिस आयी पंचायत बैठी और थमा दिए गए कुछ रुपये उसके हाँथों में 
अगले दिन जब टीन का बक्सा नहीं बजा तो लोग अन्दर गए जो देखा 
सब स्तब्ध रह गए क्योंकि दो लाशें छतपर  लटक  रही थी और उनके हांथों में वह रुपये थे और  ऑंखें खुली थी जैसे वह पूछ रही हों क्या यही
 तुम्हारा न्याय है या  चुप रहने का सौदा ? अगर यह सौदा था |   
 तो हमें मंजूर है | क्योंकि अब हम  चुप हो गये हमेशा के लिए ....






  

रविवार, फ़रवरी 20, 2011

अपना अपना भाग्य


क्यों मिला उसको ?  
सपनों का संसार ,
अपनों का प्यार |
क्यों मिला मुझको ?
सपनों का टूटना ,
अपनों का रूठना |
क्यों पाया उसने ?
द्रुत गति का कालचक्र 
क्यों मिलीं मुझे ? 
बंद घड़ी की सूइयां |
प्रश्न है अनेक ,
पर उत्तर है एक 
अपना अपना भाग्य !

मंगलवार, फ़रवरी 15, 2011

भारतीय क्रिकेट टीम को शुभकामना

      




      विजय गीत 

धोनी की सेना निकली दोहराने फिर  इतिहास 
अब तो अपनी पूरी होगी विश्व विजय की आस |


        
क्रिस्टन की रणनीति भी है और सचिन का शौर्य ,
धोनी की तो धूम मची है विश्व में चारों ओर |
वीरू  का जब बल्ला बोले तब गेंदबाज  हो निराश,
अब तो अपनी पूरी होगी विश्व विजय की आस | 

          
जहीर ,मुनाफ छुड़ा रहे है बल्लेबाज के छक्के ,
तरकश में अभी तीर बचे है पीयूष और भजन के |
श्रीशांत अगर हो जाये रौद्र, तो कर दे सबका नाश ,
अब तो अपनी पूरी होगी विश्व विजय की आस |



राम का आशीर्वाद तुम्हें है ओर दुआएं अली की ,
अब शान बड़ा दो आपने देश  गाँव और गली की| 
विजय तिरंगा फहरा दो, करो ना हमको निराश ,
अब तो अपनी पूरी करदो विश्व विजय की आस |

धोनी की सेना निकली दोहराने फिर  इतिहास 
अब तो अपनी पूरी होगी विश्व विजय की आस |



समस्त चित्र गूगल के सौजन्य से    

बुधवार, फ़रवरी 09, 2011

माँ तो आख़िर माँ ही है

    
      अभावों से मेरा हमेशा चोली दामन का साथ रहा है  | बचपन से शुरू क्या
हुआ आज तक मुझे यह छोड़ने को तैयार नहीं है | कई  बार वक्त ने कोशिश भी
 की मग़र हमारी दोस्ती नहीं टूटी | और धीरे धीरे हम दोनों एक दूसरे के पूरक
बन गए | बेटे की फ़ीस जमा करने की आखिरी तारीख़ मुझे ऐसी लग रही थी
जैसे  मेरी फाँसी का दिन नियत कर दिया गया है | उस पर बेटी की शादी की चिंता
मकान मालिक आज कल मुझे यमराज लगता था | कुल मिला कर एक आम
आदमी की सभी समस्याएं मेरे आगे पीछे घूम रही थी  | इन समस्याओं का हल
 मुझे आत्महत्या की सिवा दूसरा कोई नज़र नहीं आ रहा था | अचानक फोन
की घंटी बजी बड़े भाई का फोन था" माँ नहीं रहीं " यह खबर मेरे लिए फाँसी का फंदा
गले तक आने जैसी थी | माँ के मरने का दुख उस पर गाँव आने जाने के किराये की
चिंता में डूबा हुआ बहुत देर तक कुर्सी पर बैठा रहा | पत्नी और बच्चे मेरे आसपास
घेरा बना कर खड़े थे जैसे क़ी मै कोई  मदारी हूँ | मेरा अगला खेल क्या होगा ?
अचानक ही मुझे कुछ याद आया और चल पड़ा स्टेशन क़ी ओर माँ के अंतिम दर्शन
के लिए रास्ते भर माँ के बारे में सोचता रहा ओर माँ क़ी ममता ओर उसके त्याग क़ी
कहानी मुझे सच्ची लगने लगी थीं | क्योंकि पिता क़ी वसीयत के अनुसार माँ के मरने
 के बाद खाते में जमा पैसे हम दो भाई में बाँट दिए जाएँ | अब मेरी आँखों से आंसू
बह निकले थे उस माँ के लिए जो खुद मर कर  मुझे एक नई ज़िंदगी दे गयी .........
  और दिल ने कहा माँ तो  आख़िर माँ ही है ..................

गुरुवार, फ़रवरी 03, 2011

क्या यही है हमारी पहचान



देखने में लगभग सात आठसाल का एक बच्चा फटे पुराने कपड़े 
या उन्हें चीथड़ा कहें आपने शरीर पर लपेटे हुए एक किराना शाप 
के सामने बैठा हुआ था | जैसे वह दुकान की सीड़ियाँ चढ़ने की 
कोशिश करता तभी दुकानदार दुत्कार कर भगा देता | वह  दो तीन 
बार प्रयास कर चुका था हर बार दुकानदार की गलियों में अभद्रता 
बढती जाती थी | वह चिल्लाकर कह रहा था कहाँ से चले आते है 
सवेरे सवेरे भीख मांगने वाले , दुकान खुली नहीं की सिर पर सवार हो 
गए | इस बार उसने अपनी  मुठ्ठी में दबे दस के नोट को आगे कर 
कहा " टॉफी लेनी है "  दुकानदार ने आपने स्वर में मधुरता लाते हुए कहा 
अन्दर आकर बताओ कौन सी टॉफी ?

सोमवार, जनवरी 31, 2011

एक रूप यह भी नारी का



यह घटना लगभग सात वर्ष पूर्व नागपुर में हुई थी | जिसमें एक बलात्कार के
आरोपी के साथ  कोर्ट परिसर में,शीघ्र न्याय ना मिलने के कारण  कुछ महिलाओं
ने उसके साथ हाथापाई की जिससे की उसकी मृत्यु हो गयी |
इस घटना की प्रशासन ने बहुत निंदा की और कहा  की इस तरह की घटनाओं 
से समाज में क्या सन्देश जायेगा और लोगों का न्याय व्यबस्था से विश्वाश   हट 
जायेगा | मग़र किसी ने उस आरोपी के  कृत्य की निंदा नहीं की,और ना ही किसी 
ने यह सोचा उसके इस कृत्य से समाज में क्या सन्देश जायेगा |
मै यहाँ आपको बताना चाहता हूँ की भारत की न्याय व्यबस्था  का मैं सम्मान 
करता हूँ और इस पर मुझे पूरा भरोसा है | 
 उस घटना से आहात होकर मैंने अपनी राय रचना के माध्यम से समाज के सामने 
रखी थी |  अब  आप की क्या राय है इस घटना पर  ? 




मेहँदी वाले हाँथों में अब  तलवारें  आयेंगी  , 
चूड़ियों की खन खन, झन झन में बदल जाएँगी |
अब कोई नारी नहीं अवला कहलाएगी ,
न्याय नहीं मिला तो वह काली  बन जायगी |
अब कोई द्रोपदी नहीं कृष्ण को पुकारेगी ,
अब  तो दुश्शासन  को द्रोपदी ही मारेगी |






मंगलवार, जनवरी 25, 2011

यह कैसा गणतन्त्र दिवस


एक और गणतंत्र दिवस
कल फिर हम मनाएंगे |
अपनी आजादी पर हम
संविधान की मुहर लगायेंगे |


कुछ लोग तिरंगा लेकर ,
गलियों सड़कों में घूमेंगें | 
भारत महान और जय हिंद ,
के नारे भी आकाश में गूंजेंगे |
मग़र उसी गली के भूखे बच्चे ,
उन्हीं सड़कों पर नंगे ही सो जायेंगे |


जय जवान और जय किसान के 
नारे भी दोहराय जायेंगे |
नई योजना औए नये वादों से ,
हम फिर बहलाए जायेंगे |
मग़र क़र्ज़ से दबे किसान 
बस यूँही मरते जायेंगे |


जय जवान की ज्योति पर ,
फिर फूल चढ़ाये  जायेंगे  |
कुछ बंदूकें भी गरजेंगी ,
कुछ गोले भी दागे जायेंगे |
मग़र उन्हीं शहीदों के भूखे  बच्चे ,
सड़कों पर दर दर ठोकर खायेंगे |



एक और गणतंत्र दिवस
कल फिर हम मनाएंगे |
अपनी आजादी पर हम
संविधान की मुहर लगायेंगे |