मंचीय कवितायेँ हमेशा ,
पुलिस ,पोलिटिशियन और पाकिस्तान की आभारी हैं |
यह भी एक इत्तफ़ाक है ,
यही तीनों हमारे देश पर भारी है |
मैं इन तीनों को रचना के माध्यम से नमन करता हूँ |
एक नये शहर में हम पहली बार आये
सोचा क्यों ना पुलिस की सहायता ली जाये |
हमने पूछा १६ नंबर की बस कहाँ से जाएगी ?
वह बोला क्या यह भी आपको पुलिस बताएगी |
टीवी में लोकसभा की कार्यवाही को देख कर
एक दिन हमारी बच्ची ने पूछा
श्वेत वर्ण तो शांति का प्रतीक है |
फिर यह क्यों इतना हल्ला मचा रहे है |
फिर यह सफ़ेद कपड़े पहन कर ,
क्या किसी मातम में जा रहे है |
मैंने कहा हाँ , यह संसद में जायेगे |
वहां लोकतंत्र की अर्थी को कन्धा लगायेगे |
देख रहे थे सुबह का अख़बार
सामने था एक इश्तहार ,
चूहे दवाई खाकर ,
मरते है घर से बाहर जा कर ,
हमने सोचा काश !
ऐसी दवा आतंकवादियों की बना पाते |
तो सारी की सारी लाशें ,
हम पड़ोसी मुल्क में पा जाते |