रविवार, जनवरी 02, 2011
नये साल का कैलंडर
नये साल पर एक मित्र हमारे घर आये |
दीवार पे टंगे सभी धर्मों के देवी , देवताओं के,
कैलंडर को देख कर मुस्कराए |
समझ नहीं आता कि क्यों कुछ लोग
मंदिर मस्जिद का मुद्दा उठाते है |
एक आप है जो कौमी एकता की
जीती जागती मिसाल नज़र आते है |
हमने कहा , हम नहीं जानते की
यह अपने धर्म में कितनी श्रद्धा से पूजे जाते है |
मग़र यह मेरी दीवार के टूटे प्लास्टर को ,
बहुत अच्छी तरह छिपाते है |
सोमवार, दिसंबर 27, 2010
नये साल के दो रंग
पहला रंग
चलो कुछ दिन बाद एक नया साल फिर आने वाला है |
और अपने साथ खुशियाँ ही खुशियाँ लाने वाला है |
नये साल में तो बास की सीट भी खाली हो जाएगी |
सीनियर तो मैं ही हूँ,बस मुझको ही मिल जाएगी |
तंगी से जूझते गुप्ता जी की पैसे की समस्या हल हो जाएगी|
क्योंकि अलमारी में पड़ी एन एस सी भी मैच्योर हो जाएगी |
अगले साल बेटे की पोस्टिंग भी अपने शहर में हो जाएगी |
और बेटी की शादी भी से किसी अफसर से हो जायगी |
गैराज में खड़ी होंडा सिटी अब आउट डेटऐड हो जाएगी |
अगले साल तो पाण्डेय जी की नई बी ऍम डब्लू आयगी |
दूसरा रंग
चलो कुछ दिनों बाद एक नया साल फिर आएगा
और अपने साथ साथ फिर वही समस्याएँ लायेगा |
एक बार फिर पत्नी बच्ची की नई फ्राक के लिए चिल्लाएगी
क्योंकि छुटकी की छलनी हुई फ्राक कुछ और छोटी हो जाएगी |
बड़की की बढती हुई उम्र अब एक साल और बढ जाएगी |
शादी का इंतजार करते करते अब तो वह बूढी कहलाएगी |
बेरोजगार बेटे की टूटी हुई चप्पल फिर उसका मुंह चिडाएगी |
अगले साल तो उसकी नौकरी की उम्र ही निकल जाएगी |
अगले साल तो महंगाई कुछ और ज्यादा ही बढ़ जाएगी
दूध की ख़ाली बोतल मेरी बच्ची का मुंह फिर चिडाएगी |
एक रूपए की टॉफी खरीदना एक बड़ी बात बन जाएगी |
मेरी बेटी नंगे फर्श पर अंगूठा चूसते चूसते ही सो जाएगी |
यह मेरी २०१० की अंतिम पोस्ट है| क्योंकि नया साल मेरे लिए बहुत अच्छा
होगा इस बात का भ्रम पाले हुए यह भ्रमित आदमी भ्रमण पर जा रहा है|
इस भ्रमण काल में मै २९-१२-२-१० को कानपुर,३०-१२ -२०१० से ०१-०१२०११
इस भ्रमण काल में मै २९-१२-२-१० को कानपुर,३०-१२ -२०१० से ०१-०१२०११
लखनऊ ,०२-०१ -२०११ काठगोदाम ,पन्तनगर (उधमसिंह नगर ),०५-०१ -२०११
से ०९-०१-२०११ दिल्ली में रह कर, लौट कर बुद्धू घर को आये की कहावत को चरितार्थ
करते हुए १०-०१ -२०११ को हैदराबाद आऊंगा|
आप सभी को नव वर्ष मंगलमय हो
शुक्रवार, दिसंबर 24, 2010
सृजन का कारण
मेरे एक मित्र का मानना ही की कवि या कोई रचनाकार एक दुखी प्राणी
होता है | मैंने उनसे कहा अगर आपका यह तथ्य सत्य है तो भारत में
१२० करोड़ कवि होने चाहिए | और उस फेहरिस्त में अम्बानी ,टाटा का
बिरला जैसे लोगों का नाम भी होना चाहिए क्योंकि वह भी तो दुखी है |
जहाँ तक मेरा प्रश्न है इस रचना के माध्यम से देखिये |
शब्दों का खेल नहीं दर्द है यह दिल का ,
कण कण रोता है जब मेरे अंतर्मन का |
जो आँखों से छलकता , उसे पानी मत मानिये |
तब एक फूटता है छाला मेरे दिल का |
खुली आँखें सपना संजोना कैसे छोड़ दे |
दूसरे के दर्द पे हम रोना कैसे छोड़ दे|
कलम दवात दी, जब पूर्वजों ने हाथ में ,
तब पुस्तिका के पन्नों को कोरा कैसे छोड़ दे |
रविवार, दिसंबर 19, 2010
एक सलाह !
अपनी मुफ़लिसी को मत ,
अपनी तक़दीर का लिखा मानो |
ए दोस्त ,इसमें कुछ तो
अपनी तदबीर का हिस्सा मानो |
जब कोई दौलत के नशे में ,
अपने कद की नुमाइश करता हो |
बस उसी वक्त उसे ,
रेत के ढेर पर खड़ा जानो |
सोमवार, दिसंबर 13, 2010
शहीदों को सलाम !
लीजिये आज एक मौका फिर मिल गया हमारे महान नेताओं को
शहीदों के नाम पर ...............(शब्द अपने आप लगा लीजिये) आँसू
बहाने का | आज संसद पर हमले की नौवी बरसी है जिसमें देश के नौ
जवान शहीद हुए थे वैसे इन नेताओं की सोच और मानसिकता एक आम आदमी
की समझ से परे ही लगती है| आखिर यह चाहते क्या है ?
कभी यह बुलेटप्रूफ जाकिट का मुद्दा उठाते है कभी यह किसी की शहादत
को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते है , कारगिल युद्ध के समय ताबूत में
कमीशन का मुद्दा खैर छोडिये कहाँ तक गिनाये .................
मग़र शहीदों श्रद्धांजली देने में पीछे नहीं रहते है |एक रचना के माध्यम से देखिये |
ताबूत कांड
शहीदों की चिताओं पर मेले हम लगाते है |
और उनकी वीरता के गीत भी सुनाते है
ऐसी श्रद्धांजली मैंने कहीं देखी नहीं ,
जिसमें ताबूतों की भी पैसे खाये जाते है |
एक प्रार्थना
आज मेरे इन शहीदों पर ,
एक अहसान आप कीजिये |
यदि मान नहीं दे सकते
तो अपमान मत कीजिये |
चेतावनी
यदि शहीदों के बच्चे भूखे प्यासे सोते है
बूढी माँ के आँचल को आँसू ही भिगोते है
शहीदों की विधवाए यदि दर दर भटकेंगी |
तो फिर देश की सीमाये भी सैनिकों को तरसेंगी |
गुरुवार, दिसंबर 09, 2010
इसे मै क्या कहूँ ?
हम रास्ते में जिन्हें
पत्थर समझ कर छोड़ आये थे |
वह आज मंदिरों में
भगवान बने बैठे है |
अब कोई मेरे दुश्मन की
आज तक़दीर तो देखे ,
वह मेरे घर का मालिक
और हम उसके दरवान बने बैठे |
बचपन में करबट बदलने पर
जो खोल देती थी आँखें अपनी ,
आज उसके कराहने पर भी
हम अपनी आँखें मूंदें बैठे |
और बचपन में जो हमारी
तोतली जुबान की सारी बाते जान लेती थी |
आज एक हम है जो उसकी
पोपली जुबान से अनजान बने बैठे |
शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010
इनसे कुछ ना कहना
अपनी बात आरम्भ करने से पहले मै यह बताना चाहता हूँ कि
रचनाकार कि कलम ना ही राजनीति के बृक्ष कि साख से बनती
है और ना ही इसमें किसी पार्टी कि स्याही का प्रयोग होता है |
पिछले कुछ दिंनों से संसद में अवरोध बना हुआ है | कारण है कुछ
घोटाले जो कि हमारे लिए एक आम बात बन चुके है अब प्रश्न यह उठता
जिस प्रकार सरकारी कर्मचारी के काम ना करने पर उसका वेतन" नो वर्क
नो पे" के आधार पर काट लिया जाता है|
क्या इनके साथ भी यही होता है ?
क्या इनको सरकारी कार्यों में व्यवधान पहुँचाने का संविधानिक अधिकार है
कुछ साल पहले तिरंगा यात्रा और दागी मंत्री का मुद्दा भी छाया रहा था |
समय व्यर्थ मत कीजिये एक मंचीय रचना के माध्यम से इनका हाल देखिये
रोज रोज नये नये कुछ मुद्दे ढूंढ़ लाते है|
भूख और गरीबी का यह मुद्दा भूल जाते है |
सिर अपना शर्म से कुछ और झुक जाता है
जब देश का तिरंगा एक मुद्दा बन जाता है
|
दागी मंत्री
दागी दागी , दागी कुछ दागी चिल्लाते है ,
शांत शांत , शांत कुछ शोर मचाते है |
दूसरों के दागों कि कहानी वह सुनाते है,
पर अपने दागों को जो देख नहीं पाते है|
दाग कैसे देखेंगे जब आँखें मूंद रखी है ,
और आइना भी ऐसा जिसमें कालिख पोत रखी है|
शुक्रवार, नवंबर 26, 2010
शहीद का घर
आज सारा भारतवर्ष २६/११ के शहीदों को अपने अपने अंदाज
में श्रद्धांजलि दे रहा है | कुछ साईकिल चला कर , कुछ मोमबत्ती
जला कर ओर कुछ शांति मार्च निकाल कर | अब प्रश्न उठता है
इनमें से कितने लोग इन्हें कल याद रखेंगे इसका उत्तर मै आप पर
छोड़ता हूँ |क्या आपने कभी यह सोचा जिस परिवार का कोई
व्यक्ति शहीद होता है उस घर का क्या हाल होता है |
मै इस रचना के माध्यम से आपको एक शहीद के घर में लेके चलता हूँ |
बेटे के जब मौत का संदेशा घर में आया था |
तब बूढी माँ के आँखों में तो सागर उतर आया था |
कंधे पर खिलाया था जिसने अपने लाल को ,
अर्थी का तो वोझ भी उसी कंधें ने उठाया था |
अभी सुहाग कि सेज के तो फूल मुरझाये नहीं ,
और चूड़ियों के टूटने का समय वहाँ आया था |
भाई ओर बहन के करुण क्रंदन को देख कर ,
अपने किये पे तो काल भी पछताया था |
शनिवार, नवंबर 20, 2010
व्यंग्य :आवश्यकता है एक समीक्षक की
आवश्यकता है एक समीक्षक की जो मेरी बिना सिर पैर की, बेतुकी और कवित्व दोष से
भरपूर रचनाओं की समीक्षा कर उन्हें साहित्य जगत की अनुपम कृति बता सके |
पारिश्रमिक साहित्य जगत में बने स्थान की स्थिति पर निर्भर करेगा |
यह विज्ञापन देने का कारण यह है कि मेरे एक कवि मित्र के अनुसार अच्छा लेखक बनने
के लिए सर्वप्रथम अच्छा पाठक ,साहित्यिक ज्ञान , साहित्यिक रूचि और सृजन क्षमता
होना आवश्यक है |यदि आपके पास इनमें से कुछ भी नहीं है तो एक ख्याति प्राप्त समीक्षक
अवश्य होना चाहिए| क्योंकि रचनाओं का स्तर, पाठकों कि पसंद नापसंद पर निर्भर नहीं
रहता वह तो समीक्षक के द्वारा नियत किया जाता है
उदाहरण के रूप में एक कविता कि कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है |
नीले आकाश
की ओर देखकर
कुत्ते ने अपने
पंजों में दबी
हड्डी को
पुन : चूसना शुरू कर दिया |
अब इन पंक्तियों कि समीक्षा देखिये प्रस्तुत पंक्तियों में कवि सूखे के कारण पड़े अकाल कि
भयानक स्थिति का वर्णन करता है यहाँ नीला आकाश सूखे को दर्शाता है तथा हड्डी मानव अबषेशों को ऐसा प्रतीत होता है कि धरती मानव विहीन हो चकी है,
ओर बचा हुआ एकमात्र जीव अपने अस्तित्व को बचा कर रखने का प्रयास कर रहा है
कविता कि इन पंक्तियों से पाठक के मस्तिष्क में साकार चित्र खिंच जाता है
बहुत सुंदर भावाव्यक्ति
सोमवार, नवंबर 15, 2010
मंहगाई और आम आदमी
बढती हुई महँगाई की चिंता
अब हमें भी होने लगी है |
क्योंकि हमारी फटी मैली क़मीज में ,
लगे बदरंग बटनों का स्थान ,
आलपिन लेने लगी है |
यह महँगाई यूँ ही बढती जाएगी
और एक दिन आसमान को छू जाएगी |
तब ज़मीन और आसमान के बीच का फ़ासला ,
कुछ भी नहीं रह जायेगा |
आदमी ज़िंदगी के बोझ से मर जायेगा |
(यह रचना पुनः सम्पादित एवम प्रकाशित है)
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