शनिवार, सितंबर 11, 2010

हिंदी सप्ताह के उपलक्ष्य में राजभाषा को समर्पित एक कविता


हिंदी एक पुष्प


 



रंग बिरंगे फूल खिले है 
भाषा के इस उपवन में |
सबकी अपनी सुगंध बसी है
हर मानस के मन में |
मग़र इस उपवन की शोभा को
बस एक ही पुष्प बढ़ाता
नाम पड़ा है हिंदी जिसका
और जो सबको महकता |
अपने रस की कुछ बूंदों को
जब इसने कविता में डाला
अमर हो गए कवि देश के
पन्त प्रसाद और निराला |

  
 


जिसके मन में बसी यह भाषा
या जो इसको अपनाता |
नहीं ज़रूरत किसी प्रमाण की
वह सच्चा देश भक्त कहलाता |

शनिवार, सितंबर 04, 2010

ज़िंदगी और रोटी




 दूध के दाँत जल्दी टूटने का,
 एक कारण सूखी रोटियां भी थी |
बचपन बीतने का अहसास तब हुआ
जब मैं रोटी कि तलाश को निकला |
जवानी एक रोटी से दूसरी रोटी के,
सफ़र को तय करने में  गुज़र गयी ,
और आज बुढ़ापा जली बासी रोटी कि तरह,
कचरे के डिब्बे का इंतजार कर रहा है |



(पुनः सम्पादित रचना)




सोमवार, अगस्त 30, 2010

तहजीब


तहजीब तो हमारे
पुरखों की शान होती है |
इसको संभालने में
हमारी उम्र तमाम होती है |

बेहयाई को फैशन का
जामा पहनाने वालों
मत भूलो ,तुम्हारे घर में भी
एक बेटी जवान रहती है |

सोमवार, अगस्त 23, 2010

ख़्वाबों को जीना



माना की ख्वाबों  को जीना ,
 भी कोई बुरी बात नहीं |
मग़र ख्वाबों  के टूटने पे 
टूटना भी सही बात नहीं |


अगर ख्वाबों को ही  जीना तो ,
उनको बदलने का कोई रास्ता निकाल लो |
वरना अपने ख्वाबों को ज़हर ,
देने की आदत भी डाल लो |


गुरुवार, अगस्त 12, 2010

आज का बेटा


ना जाने मै  अपनी ज़िंदगी के
किस मोड़ पर मै आया हूँ
जो मुझे छोड़ ही नहीं सकती
मै उस माँ को छोड़ आया हूँ |
 याद है मुझको, पड़ रही थी
धूप जब, ग़मों की  मुझ पर
बस उसके आँचल की छाँव थी मुझ पे 
मै आज यह भी भूल आया हूँ | 
 वह जो फर्ज की शक्ल में
अहसान हम सब  पर करती है
इसको खुदगर्जी कहूँ या मज़बूरी ?
 उनको कुछ सिक्कों से तोल आया हूँ |
बहते हुए आँसुओं से उसके ,
भींगते हुए आँचल का ख्याल था मुझको
बस इसलिए लौट कर आने का
झूठा दिलासा दे कर आया हूँ |

रविवार, अगस्त 01, 2010

"फ्रेंडशिप डे " पर एक दोस्त का दर्द



ना जाने किस तरह के  लव्ज
मेरी जुवां से फ़िसल गए |
जो सदियों से दिल में रहते थे
वह पल में निकल गए |
हालाँकि कि मुझको उनसे
कोई शिकवा गिला नहीं |
मग़र परेशां ज़रुर हूँ ,
क्या दोस्ती के मायने बदल गए |

रविवार, जुलाई 25, 2010

मग़र




सावन की रिमझिम फुहारों  में आप .
अपने जीवन का आनंद लीजिये |
मग़र टूटे मकानों में रहते है जो , 
कुछ उनकी छतों का भी ध्यान कीजिये |
सींचा है तुमने जिस वृक्ष को
आप उसे कल्प वृक्ष नाम दीजिये |
मग़र सूखे दरख्तों के गिर जाने पर
आँधियों को मत इल्जाम  दीजिये |
अपने घरों की बहू बेटियों को
आप देवियों सा सम्मान दीजिये |
मग़र रोटी से तन का जो सौदा करे
कोई उसे दूजा मत नाम दीजिये |
आँखों  से टपके जो आँसू कोई
आप उसे मोतियों  का नाम दीजिये |
मग़र रोटी को रोते हुए बच्चे के 
आँसुओं  को पानी मत मान लीजिये |

मंगलवार, जुलाई 13, 2010

क्या यही हमारा विकास है

 
माना पगडंडी को सड़क बना कर
हमने विकास का काम किया है |
और रोटी पर बिछी हुई सब्जी को
हमने पिज्ज़ा का नाम दिया है |
अब आँगन तुलसी  को तरसे ,
और बगिया तरसे  फूलों को
लगा के छत पर नागफ़नी को
 उसे रूफ गार्डन नाम दिया है |
दरकिनार कर अपनी प्रतिभा को
 कंप्यूटर को सब कुछ मान लिया है |
चोरी गड़बड़  घोटालों को ,
हमने हैकिंग का नाम दिया है |
अब मेरे घर में जगह नहीं है
अपने बूढ़े- बूढ़े  लोगों की ,
अलग बना कर घर उनका
उसे ओल्डएज होम का नाम दिया है |

बुधवार, जुलाई 07, 2010

इन आम आदमियों को भूल मत जाना


आम आदमी

तुमको तुम्हारे शहर की
सड़कों पर पड़ी ,
जिन्दा लाशों की कसम
मत डालना तुम ,
इन पर झूठी सहानुभूति का कफ़न
इनको यूँही पड़ा रहने दो
चीखने दो चिल्लाने दो
तुम्हारी सभ्यता की कहानी
इनको ही सुनाने दो
सड़क पर पड़े हुए यह लोग
हमारे बहुत काम आते है |
तभी तो हमारे राजनेता
इनके भूखे नंगे तपते हुए पेटों पर
राजनीति की रोटियां सेंक जाते है |
इनको तरह तरह से 
उपयोग में लाया जाता है |
कभी राम कभी अल्लाह के नाम पर ,
इनका  ही  तो खून बहाया जाता है
और कभी कभी अपनी सियासत,
चमकाने और ताकत दिखाने के लिए
इन आम आदमियों के नाम पर
भारत बंद बुलाया जाता है |
चुनावों के समय हम ,
इनको आम जनता कहते है |
और फिर आने वाले चुनावों तक ,
आम की तरह चूसते रहते है |
यह रोते है तो रोने दो
मत जगाओ, सोने दो |
जिस दिन यह सोता हुआ,
आम आदमी जाग जायेगा ,
उस दिन से संसद का रास्ता
बहुत कठिन  हो जायेगा |

शनिवार, जून 05, 2010

एक परित्यक्ता को सांत्वना

 
क्यों सहती हो ?

कल कल बहती नदी यहाँ पर
मंद पवन भी कुछ कहती है | 
फिर साँसों के रथ पर सवार हो कर,
तुम गुमशुम सी क्यों रहती हो | 
थोड़ा सा ग़म बाँट लो तू भी
तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |
तुमने उसको अपना माना,
पर उसने, उसको अपना जाना
जिसने तुमको  कुछ न माना,
क्यों उसको अपना कहती हो |
थोड़ा सा ग़म बाँट लो तुम भी
तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |
नहीं प्रेम अब एक तपस्या ,
अब तो यह व्यापार बना है |
और न तुम मीरा न वह कृष्ण , 
फिर विष का प्याला क्यों पीती हो |
थोड़ा सा ग़म बाँट लो तुम भी
तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |
जिस जीवन में बरसे प्रेम सुधा , 
तब एक प्रेम वाटिका  बन जाती है |
क्यों नागफनी के जंगल में
अब खुशबू को ढूंढा करती हो |
थोड़ा सा ग़म बाँट लो तुम भी
तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |