मंगलवार, नवंबर 09, 2010

यूँही नही हम ऐसे



माना कि ज़िंदगी की दौड़ में 
हम सबसे  पीछे रह गए |
बदल लेते अगर, रास्ता अपना 
तो हम भी बहुत दूर निकल जाते |

ऐ दोस्त  रौशनी की ज़रूरत 
अगर होती नहीं हमको |
तो ऐ  आफ़ताब कुछ लोग तो ,
तुझको भी ज़िन्दा निगल जाते | 

बुधवार, नवंबर 03, 2010

यह कैसी दीवाली







                जितने भी तुम दीप जलालो
               मैं नहीं कहूँगा इसे दीवाली |
जब रावण नित सीता को हरता
राम खोज में वन वन फिरता
सुग्रीव ना जाने  कहाँ खो गया,
अब तो बस मिलते बाली |
                        जितने भी तुम दीप जलालो
                        मैं नहीं कहूँगा इसे दीवाली |
आज छाया है घनघोर अँधेरा 
और  तेज चल रही नफ़रत की आँधी
क्या मै आस करूं उस दीपक से 
जिसकी गोद पड़ी हो खाली
                 जितने भी तुम दीप जलालो |
                  मैं नहीं कहूँगा इसे दीवाली 
हाँ जब कोई आँसू ना छलके 
और खुशियाँ चेहरे पर झलके |
जब सबको अपना हक़ मिल जाये 
और कोई पेट ना हो खाली |
                   तब तुम बस एक दीप जलाना 
                    तब  उसे कहूँगा मैं दीवाली |



 चित्र गूगल के सौजन्य से 

सोमवार, नवंबर 01, 2010

हास्य कवितायेँ ,दीवाली की फुलझड़ी



जलते हुए मकान से
जिन  लोगों ने दस आदमियों को निकाला
वह तो बस दो हिम्मत वाले  थे 
मग़र दोनों को जेल हो गयी .
क्योंकि मकान के अन्दर तो फायर ब्रिगेड वाले थे |


              




एक मिठाई की दुकान पर लिखा था |
शुद्ध देशी घी से बनी मिठाई की दुकान 
और नकली सिद्ध करने वाले को 
एक हज़ार रुपये नकद इनाम |
बोर्ड के नीचे लिखा था ,
हम अपना वादा बहुत ईमानदारी से निभाते है |
और यह इनाम एक साल में दो बार दे जाते है |
                     





 एक  छोटी चाय की दुकान पर लिखा  था |
होटल ओवेराय  शेरेटन यही है 
और नीचे लिखा था 
हमारी दूसरी कोई ब्राँच नहीं है |

बुधवार, अक्टूबर 27, 2010

यथार्थ


झाँक कर देखा खिड़की से
उमड़ते हुए बादलों को
दौड़ कर आँगन में आया | 
और आकाश में बादलों का एक झुंड पाया | 
और शुरू हो गया तलाश का
एक अंतहीन सिलसिला
अचानक खिल उठा चेहरा |
और प्रसन्न हुआ अंतर्मन
क्योंकि मिल गयी थी मुझे ,
मुन्नी की गुड़िया और पत्नी का कंगन
फिर अचानक कुछ सोंच कर डर गया
यथार्थ के धरातल पर गिर गया |
दौड़ कर अन्दर आया
बंद कर ली खिड़की और दरवाजे
कहीं भिगो न दे यह
मेरे तन का एकमात्र कपड़ा |

 (एक पुरानी रचना पुनः  प्रकाशित)  


बुधवार, अक्टूबर 20, 2010

मुझे अच्छा नहीं लगता



खड़ी हो अगर  दीवार  आँगन में
बस किसी तरह मै बर्दाश्त  करता हूँ |
मग़र दिलों के बीच दीवार  का होना ,
ना जाने क्यों, मुझे  अच्छा नहीं लगता  |


लबों पे सजी रहें हमेशा मुस्कराहटें ,
यह दुआ मैंने ख़ुदा से माँगी है |
मग़र किसी की बदहाल हालत पर ,
उसका  मुस्कराना, मुझे अच्छा नहीं लगता |


हर पुरानी बात को भूल जाना चाहिए  
 यह है सबको मशविरा मेरा ,
मग़र किसी के अहसानों को ,
भूल  जाना, मुझे अच्छा नहीं लगता |


 हर शेर में अल्फ़ाज की बंदिश भी हो |
और ख्याल की नजाकत भी 
फिर भी गज़ल  का नाकामयाब ,
हो जाना, मुझे अच्छा नहीं लगता |




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शुक्रवार, अक्टूबर 15, 2010

शोहरत की धूल


जैसे जैसे हमारी पहचान 
 समाज में बढने लगती है |
वैसे वैसे हमारी रिश्तों की,
चादर सिमटने लगती है |
प्रेम और आत्मीयता के फूलों के रंग  ,
अब धुंधले पड़ने लगे है |
क्योंकि उसमें गरीबी और बदहाली के, 
निशान उभरने लगे है |
आज हमें अपनों की शक्लें की
अनजानी लगने लगी है |
क्योंकि आँखों पे चढ़े चश्में पर 
शोहरत की धूल जमने लगी है |

शुक्रवार, अक्टूबर 08, 2010

एक हास्य कविता , शिव का धनुष


 इंस्पेक्टर आफ स्कूल ने पूछा,
बच्चों यदि तुम्हें अपनी संस्कृति का ज्ञान है
तब यह प्रश्न बहुत ही आसान है |
सीधा सा प्रश्न है  ना तोड़ा ना मरोड़ा है
यह बताओ शिव का धनुष  किसने तोड़ा है
सामने बैठे बच्चे ने उत्तर दिया
अपने यह आरोप लगाकर मुझे कहीं का नहीं छोड़ा है
सत्य तो यह है शिव का धनुष मैंने नहीं तोड़ा है |
तभी पास खड़ा हिन्दी का अध्यापक सामने आता है |
और वह भी उसको निर्दोष बताता है |
मानता हूँ की यह बच्चा बहुत शैतान है ,
मग़र धनुष का तोड़ना इसका नहीं काम है |
उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया
इंस्पेक्टर सीधा प्रिंसिपल के रूम में घुस गया |
प्रिंसिपल ने प्यार से बिठाया और समझाया
खेल में तो बड़े बड़े रिकार्ड टूट जाते है ,
एक आप है जो एक धनुष के टूटने पे चिल्लाते है |
इसका उत्तर हम आपको अभी बताते है ,
अपने क्रीडा अध्यापक को अभी बुलाते है |
तभी एक व्यक्ति अंदर आता है |
अपनी उखड़ी हुई साँसों को लाइन से लगाता ,
और अपने को पी टी आइ बताता है |
उसका उत्तर था श्रीमान जी धनुष विद्या तो हमारे कोर्स में भी नहीं था |
और दावे से कहता हूँ की एक भी धनुष हमारे स्टोर्स में भी नही था |
इंस्पेक्टर सीधा शिक्षा मंत्री के पास गया
अपनी समस्या से अवगत कराया |
मंत्री जी बोले आप यह बात किसी को नहीं बताएँगे|
नहीं तो विरोधी दल  ,चुनाव में इसको मुद्दा बनायेंगे |
हाँ अब अपनी संस्कृति का अपमान
अब और नहीं सह पाएंगे
 जल्दी ही  हर स्कूल में दो दो धनुष भिजवायेगे |
कल ही हम एक फाइल वित्त मंत्री को भिजवाएंगे
अगर आप कहें तो दो चार परसेंट कमीशन आपको दिलवा देंगे |
फाइल वित्त मंत्री के पास गयी
कुछ टिप्पणी के साथ वापस आयी
कृपया धनुष कि अनुमानित लागत बताएं |
 और कृपया तीन कुटेशनभी  भिजवाये
और साथ में तीन प्रश्नों का उत्तर बताएं
धनुष टूटा तो कब ,कहाँ और क्यों
यह देख कर इंस्पेक्टर ज़ोर से चिल्लाया |
और अपने आप पर झल्लाया
आखिर मैंने यह प्रश्न पूछा क्यों  .........

(यह प्रसंग पूर्णतया काल्पनिक है मग़र इसके चरित्र हमारे समाज में है )


बुधवार, सितंबर 29, 2010

जीवन का गणित

जब मै जीवन के
जोड़, घटाने
और गुणा, भाग के
प्रश्नों को ,
हल नहीं कर पाता हूँ |
तब मै ,
मृत्यु के प्रश्न ,
पर आता हूँ |
तो  जीवन के दर्द को
हासिल की तरह
पहले से ही  वहाँ पाता हूँ |
जीवन के इस गणित में
जीवन और  मृत्यु में
दर्द का अनुपात
 मै समान ही पाता हूँ |

सोमवार, सितंबर 20, 2010

ग़लतफ़हमी



मेरी ख़ामोशी को
मेरी कमज़ोरी समझने वालों
मत भूलो कि ,
मेरे मुंह में भी जुवान रहती है |

दोस्तों के लिए
प्यार भरा धड़कता है मेरे सीने में 
और दुश्मनों के लिए ,
 मेरी कमर में हमेशा  तलवार रहती है 



मंगलवार, सितंबर 14, 2010

आज मेरी बेटी का जन्म दिन है


जी हाँ यह शीर्षक आपको कुछ अटपटा लगा होगा और लगना भी चाहिए क्योंकि इस तरह के शीर्षक से समाचार प्रकाशित करने अधिकार केवल अम्बानी, टाटा बिरला या किसी अन्य नए अमीर आदमी को है |यहाँ मै आपको विश्बास दिलाता हूँ की मै इनमे से कोई भी नही हूँ |जिसकी पुष्टि आप मेरे व्लाग के प्रोफाइल को देखकर कर सकते है | मै एक आम आदमी जिसे केवल रोटी और रोटी से मतलब है| जी हाँ यह बिलकुल सत्य है दिनांक १४सितम्बर १९८९को मेरी बेटी  पुन्नू का जन्म हुआ था | उसका जन्म एक निजी अस्पताल में आपरेशन से हुआ था | मै आपरेशन  थियेथर  दरवाजे पर ही खड़ा था |  दरवाजा खुला डाक्टर साहिबा अपने चेहरे पे नकली हँसी लाती हुई बोली बधाई हो लड़की हुई है | उस हँसी में खुशी कम और दुख ज्यादा था |मै उनके दुख के कारण खोजने  का प्रयास करने लगा | आसपास के सूचनापटों पर निगाह दौड़ाई शायद कहीं यह लिखा हो लड़की के जन्म पर डाक्टर की फ़ीस आधी मग़र बाद में याद आया वह भी उसी हिंदुस्तान में रहती जहाँ लड़की के जन्म को शोक दिवस के रूप में मनाया जाता है |सामने डाक्टर की नेमप्लेट थी जिस पर नाम के नीचे डिग्री की लम्बी लाइन थी | मुझे यह बात देख कर बहुत ख़ुशी हुई की  इस विषय पर शिक्षित या अशिक्षित सब  एकमत है |
मेरे पीछे कुछ कानाफूसी चल रही है अस्पताल की नर्से कह रही है की लड़की हुई तो क्या हुआ ५०० नहीं तो ३०० तो ले ही लेंगे |मुझे ऐसा लग रहा था की वह मुझे अप्रत्यक्ष्य   रूप से संवेदना दे रही हो |
तभी हमारे मोहल्ले की काकी जल्दी से रिक्शे से उतर के अंदर आयीं और बिना पूछे ही बापस चली गयी | हुआ यह की रिक्शे वाले ने २० पैसे कम दिए थे अब काकी उससे कह रही थी भइया कहीं से भी लाओ हमको हमारे पैसे चाहिए लड़की हुई अगर ऐसे लुटाते रहे तो फिर शादी कैसे करेंगे  | इस काकी की  हमारे प्रति आत्मीयता कहें या लड़की के जन्म के प्रति उनकी अलग धारणा समझ में नहीं आता ?

आज  मेरी बेटी २१  साल की   हो गयी  अब हम उसको शिवांगी श्रीवास्तव  के नाम से पुकारते वह इंजीनियरिंग  कालिज फौर्थ इयर की स्टुडेंट है | यहाँ मै यह भी बता देना चाहता हूँ कि मेरे दो बेटियाँ है दूसरी है आरुषी  श्रीवास्तव  जो इंजीनियरिंग के सेकंड इयर में है |

अब अगर आप उस डाक्टर ,नर्स या काकी से , बेटियों के प्रति कुछ अलग विचारधारा रखते है तो उसके  जन्म दिन कि बधाई दे सकते  है आपका स्वागत .......