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शनिवार, सितंबर 08, 2012

असहाय भगवान् ............

एक  बार जब भगवान् शंकर धरती भ्रमण करके लौटे तो उनका मन बहुत अशांत था ।
पार्वती  ने कहा जब आप धरती लोक से बापस आते थे तो बहुत प्रसन्न होते थे मगर इस 
बार ऐसा क्या हुआ कि आपका मन अशांत हैं । भगवान् शंकर ने कहा तुम तो जानती हो 
की मैं धरती पर लोगों को सुखी देखना चाहता हूँ लोगों का दुःख पूछता हूँ उनका निवारण 
करता हूँ । और उनको सुखी करके बापस आ जाता हूँ । मगर इस बार मैं अपने को बहुत 
असहाय अनुभव कर रहा हूँ । इस बार  एक व्यक्ति के दुःख को मैं दूर नहीं कर सका । 
क्योंकि उसका दुःख था कि  मेरा पड़ोसी सुखी क्यों हैं .............

मंगलवार, अक्टूबर 25, 2011

दीवाली की कथाएं

 आज मैं आपके सामने दीपावली की एक दन्त कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ | जो लक्ष्मी पूजन के समय सुनाई जाती है| किसी गाँव मैं एक गरीब लकड़हारा अपने सात पुत्रों के साथ रहता था सातों के सात पूरे निकम्मे कोई कार्य नहीं करते सिवाय खाने के ,इस बात को लेकर लकड़हारा काफ़ीचिंतित था | पत्नी की मृत्यू के बाद तो दरिद्रता ने अपना स्थायी निवास उसके घर कोही बना लिया था| गाँव के लोगों ने सलाह दी की तुम अपने बेटे का विवाह कर दो तो घर में लक्ष्मी आयेगी और तुम्हारे दिन बदल जायेंगे |
उसने उनकी बात मान कर अपने बेटे का विवाह उसी गाँव की कन्या से कर दिया विवाह के पश्चात् बहू ने घर का सारा काम जल्दी ही संभाल लिया और अपने सभी देवरों से कहा की  आज के बाद तुम लोगों को कुछ ना कुछ काम अवश्य करना है और जो भी कमा के लाओगे वह मुझे दे देना | एक दिन उसका एक देवर आया और बोला " भाभी देखो हम क्या लायें हैं " देखा तो उसकी चप्पल में गोबर लगा हुआ था भाभी ने हंस कर
कहा अगर मेहनत से लाये हो तो संभाल कर रख दो |
अगले दिन दूसरा देवर आया और हंस कर बोला देखो भाभी हम क्या लाये हैं वह एक मरा हुआ सांप लाया था भाभी का वही उत्तर था संभाल कर रख दो |
एक दिन उसी राज्य के राजा की रानी जब स्नान कर रहीं थीं तो उनका नौलखा हार एक कौआ ले उड़ा राजा ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया जो कोई भी हार लाकर देगा उसे मुंह माँगा ईनाम दिया जायेगा | कुछ दिन के बाद जब नरक चौदस आया तो घर की सफाई की गयी देखा तो हार लकड़हारे की छत पर पड़ा हुआ है और मरा हुआ सांप वंहा से गायब है | यह देख कर लकड़हारा बहुत खुश हो गया और राजा के पास जाने लगा यह सोंचता हुआ कि वह मुंह मांगी दौलत मांग लेगा और बाकी जीवन आराम से बीत जायेगा |मगर उसकी बहु ने कहा जो मैं कहूँ वही मांगना | बहु ने राजा से कहा कि सारे गाँव की रुई दीया और तेल मुझे दिया जाये
क्योंकि राजा वचन दे चुके थे अत पालन करना भी आवश्यक था राजा ने तुरंत ही यह आदेश दे दिया कि पूरे गाँव का दीया तेल और रुई लकड़हारे के घर भेज दी जाये |
अगले दिन जब दिवाली कि रात आयी तो पूरे गाँव में अँधेरा और लकड़हारे के घर रौशनी रात को जब दरिद्र ने देखा कि यंहा तो उसकी आँखें फूट रही हैं क्योंकि वह तो अंधरे का अभ्यस्त था इसलिए उसने जाने कि कोशिश कि तो दरवाजे पर बहू बैठी थी बोली जाना है तो सात पुश्तों के लिए जाओ दरिद्र ने परेशान हो कर उसकी शर्त मान ली और घर से निकल गया|
इसके बाद जब रात में लक्ष्मी निकली वह भी परेशान अंधरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा तब उन्हें लकडहारे का घर दिखाई दिया वह आयीं और बोली मुझे अन्दर आने दे मेरे पैर में कांटा चुभा जा रहा है| बहु ने वही कहा आना है तो सात पुश्तों के लिए आओ कोई विकल्प ना होने का कारण लक्ष्मी ने उसकी यह शर्त भी मान ली और उसके घर निवास करने लगीं |
जिस तरह लकडहारे के दिन बहुरे उसी प्रकार सबके दिन बहुरे ...........

अब डाक्टर सरोजनी प्रीतम की एक क्षणिका ....

अपने सर पर
हमेशा सवार  
रहने वाली पत्नी
को लक्ष्मी का नाम देकर
अपने को एक
नयी संज्ञा दी

इस आशा के साथ आप पर भी गृहलक्ष्मी और लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई ....

शनिवार, जुलाई 23, 2011

गुरु आख़िर गुरु है..................


अक्सर हम यह कहावत सुनते है की गुरु गुड़ रह गया और चेला शक्कर बन गया | मगर यह वास्तविकता नहीं है |इसका प्रमाण मैं एक दन्त कथा के माध्यम से देना चाहता हूँ |किसी गाँव में एक पहलवान गुरु रहते थे | और अपने अखाड़े के सभी शिष्यों को कुश्ती की शिक्षा दिया करते थे | उनके चेलों ने भी उनकी शिक्षा का लाभ उठा कर दूर दूर तक अपने गुरु  का नाम रोशन किया | एक दिन अचानक उनके एक शिष्य को किसी  ने  बरगला दिया | उससे कहा देखो तुम्हारे गुरु जी ने केवल पाँच गाँव को  हराया  था और तुमने तो दस गाँव के पहलवानों को हरा दिया | अब अगर तुम अपने गुरु को हरा दो तो  तुम गुरु बन जाओगे| तुरंत ही चेला गुरु के पास गया और कुश्ती का प्रस्ताव रखा ,जिसे सुनकर गुरु सकते में आ गए उन्होंने उसे बहुत समझाया की कुश्ती  दांव पेंच के साथ साथ शारीरिक बल का भी खेल है और मेरी उम्र सत्तर साल हो गयी है | मैं तुमसे कैसे कुश्ती लडूंगा ? मगर चेला नहीं माना बोला या  अपनी पराजय स्वीकार कर लो और आज से मैं तुंहारा गुरु हूँ यह मान लो | जब गुरु  ने देखा की चेला किसी तरह से भी समझने को तैयार नहीं है तो उन्होंने कहा आज से तुम अलग और मैं अलग रहूँगा  क्योंकि तुमने गुरु शिष्य परम्परा का अपमान किया है | और मुझे तुम्हार प्रस्ताव स्वीकार है मगर हमारी कुश्ती में लाठियों का प्रयोग होगा | चेले ने इसे स्वीकार कर लिया | और दोनों अलग अलग रहने लगे | लेकिन चेले के मन मन एक डर समाया हुआ था इसलिए उसने अपने गुप्तचर लगा दिए ताकि गुरु की तैयारियों का पता चल सके गुप्तचर ने सूचना दी की गुरु दस  फ़ुट की लाठी से अभ्यास कर रहे है |चेले ने तुरंत पंद्रह  फ़ुटकी लाठी मंगा ली | कुछ दिनों बाद गुप्तचरों ने सूचना दी की गुरु जी लाठियों को तेल में डुबो रहें है |चेले ने भी लाठियों को घी में डुबोना शुरू कर दिया |नियत  समय पर दोनों अपने अपने समूह के साथ  अखाड़े के आमने सामने खड़े हो गए चेला  अहंकार के स्वर में  अपनी पंद्रह फ़ुट की लाठी को हवा में लहरा कर, लेकर गुरु को ललकार रहा था | थोड़ी देर के बाद गुरु जी शान्त मुद्रा में  खाली हाँथ भीड़ से निकले और चेले से कहा तुमने  तो गुरु शिष्य परम्परा का सम्मान नहीं किया लेकिन मैं तुम्हें विजयी होने का आशीर्वाद देकर अवश्य करूँगा |यह कह कर वह चेले के पास आये और अपने कंधें पर टंगे झोले में से एक ढाई फ़ुट का डंडा निकाल कर चेले पर बरसाने शुरू कर दिए जब तक  चेला अपनी पंद्रह फ़ुट की लाठी को घुमाता तब तक गुरु जी दस पंद्रह डंडे उसको जड़ दिए | चेला घबरा कर मैदान छोड़ गया |फिर गुरु जी ने चेले को समझाया शारीरिक बल के साथ साथ दांव पेंच भी महत्व रखते है यह ढाई फ़ुट का डंडा मेरा दांव था जो आज चल गया ........................
इसलिए गुरु , गुरु ही है .............................