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शुक्रवार, फ़रवरी 01, 2013

आज एक ताज़ा ग़ज़ल


ज़िन्दगी की कश्ती में हिम्मत की पतवार होना चाहिए ।
मोड़  सकते हैं हम तूफानों का रुख, दिल में यह एतवार होना चाहिए।

मेरी कश्ती तो टूटी थी जो मौजों में फंस कर डूब गयी ।
मेरे डूबने पर तूफानो  को नहीं नाज़  होना चाहिए ।

मेरी कश्ती दो चार हिचकोले खा गयी तो क्या हुआ ।
कश्तियों को भी अपने कमज़ोरी का, अहसास होना चाहिए ।

वह कश्तियाँ जो हवाओं  के सहारे ही किनारों से जा लगी ।
उनको अपनी किस्मत का एहसानमन्द    होना चाहिए ।

कागज  की कश्तियों  से  वह समुन्दर भी पार करले  ।
बस उस नाख़ुदा को, ख़ुदा पर एतवार  हों चाहिए ।


गुरुवार, जनवरी 12, 2012

ग़ज़ल

चलो उस शख्स का एहतिराम कर लें ,
जो आंधियों में चिराग़ जलाने चला है |


ना कोई लावलश्कर ना कोई कारवां ,
बस अकेले ही ज़माने से लड़ने चला है |


मालूम है उसको शिकस्त ही मिलेगी ,
फिर भी वह किस्मत  आजमाने चला है |


समुन्दर भी उसकी हिम्मत पर हैरान हैं ,
जो रेत में अपना आशियाना बनाने चला हैं |
   

रविवार, जून 26, 2011

चलो थोडा सा रूमानी हो जायें ............. ( ग़ज़ल)






वह समंदर भी अब तो हमको आबे-हयात लगे, 
जिसमें दरिया तेरे शहर का बस आकर मिले|

तेरी मुहब्बत ने बदल दी अब तो फ़ितरत अपनी,
आज तो हमको अपना, रकीब भी अज़ीज़ लगे|

गुमाँ गुलशन को तेरे आने का हो गया होगा,
तभी तो टूट कर गुल तेरी राहों में बिखरने लगे|

तू आये या ना आये, अब यह कोई मुद्दा ही नहीं,
यह क्या कम है कि तेरे दीदार अब ख्बाबों में होने लगे|