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शुक्रवार, अप्रैल 20, 2012

आपकी फ़रमाइश पर ....(.चंद शेर)

मेरी पिछली पोस्ट  आदत .. (मतला और एक शेर पर )पर आदरणीय रविकर फैजाबादी ने
टिपण्णी में कहा था दो शेर और जोड़िये तो आज उनके आदेश का पालन कर रहा हूँ ।
यह पोस्ट उन्ही के नाम ........

हर शख्स को मैं इंसान कहूँ, 
यह तो मुमकिन ही नहीं ।
लोगों में इंसानियत ढूंढने की,
मुझे आदत जो पड़  गयी हैं।

रात होते ही मैं कब्रगाहों में, 
हर रोज़ निकल पड़ता हूँ ।
क्योंकि मुर्दों से दिल लगाने की, 
मुझे आदत जो पड़ गयी हैं ।

सारे जहाँ का रंज ओ ग़म, 
आप मुझको ही दे दीजिये ।
मुझको तो ग़म उठाने की, 
अब आदत जो पड़ गयी हैं।