मेरे शहर में एक गली हो ऐसी ,
जहाँ मुहब्बत ही पल रही हो ।
जहाँ फ़ज़र की नमाज भी हो .
और लौ आरती की भी जल रही हो ।
क से काशी और क से काबा ,
म से मंदिर मस्जिद हैं ।
मुझे दिखा दो किताब ऐसी ,
जो मायने इनके बदल रही हो ।
चलो उखाड़ कर हम फेंकें ,
दहशत के उन पेंड़ों को ।
इधर साख हो जिनकी फैली,
मगर उधर जड़ निकल रही हो ।
जहाँ मुहब्बत ही पल रही हो ।
जहाँ फ़ज़र की नमाज भी हो .
और लौ आरती की भी जल रही हो ।
क से काशी और क से काबा ,
म से मंदिर मस्जिद हैं ।
मुझे दिखा दो किताब ऐसी ,
जो मायने इनके बदल रही हो ।
चलो उखाड़ कर हम फेंकें ,
दहशत के उन पेंड़ों को ।
इधर साख हो जिनकी फैली,
मगर उधर जड़ निकल रही हो ।