रविवार, जुलाई 17, 2011

सहानुभूति, आक्रोश और समझौता ....


गाड़ी ने धीरे धीरे रेंगना शुरू कर दिया था जब  सभी यात्री अपना सामान ठीक से रख चुके | तब शुरू हुआ औपचरिक प्रश्नों का सिलसिला जैसे आप भी यहीं चढ़े है क्या , कहाँ जायेंगे , आजकल तो टिकट मिलना मुश्किल हो गया है , कितने दिन पहले लिया | थोड़ी देर में कुछ  लोगों ने आत्मीयता कि परिधि में प्रवेश करना शुरू कर दिया | आजकल  दहेज़ कि मांग ज्यादा हो आगयी है | सामने बैठी लगभग साठ साल  की  औरत ने प्रश्न किया आपके कितने बच्चे है ?उसने कहा जी दो तुरंत ही उस औरत  ने प्रश्न किया एक लड़का और एक लड़की ? उस आदमी ने कहा जी नहीं दोनों लड़की |  उस औरत ने दयनीय भाव से देखा और सहानुभूति पूर्वक कहा कोई बात नहीं अगली बार लड़का होगा | यह कह कर वह उठ खड़ी हुई शायद उसका स्टेशन आने वाला था | फिर शुरू हुई एक अंतहीन बहस लड़का और लड़की के बीच , कोई कह रहा विचारधारा बदलने कि आवश्यकता है | आजकल कोई फर्क नहीं है | किसी ने अपने दो लड़की बता कर और खुश रहने कि बात कह कर विषय को विराम देना चाहा| कुछ लोग तो लड़कियों के पक्ष में बोल कर अपने को महान सिद्ध कर रहे थे |अचानक गाड़ी  ने तेज आवाज कि शायद पटरी बदल रही थी तभी सामने बैठी एक औरत  उम्र लगभग पेंतालिस साल , जो अब ताक शान्त थी उसने बोलना शुरू किया | क्या आप मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर देंगे ?
       क्या आप अपनी  बीस बाईस साल कि लड़की को रात में अकेले दवाई लेने भेज सकते है ?
       अगर आपकी लड़की स्कूल या कालेज से दो घंटे लेट आये तो  क्या चैन की नींद सो सकते है ?
        बिना दहेज़ की शादी की बात आप क्या सोंच सकते है ?
जिस देश में प्रत्येक पांच मिनट में बलात्कार और प्रतिदिन बहुओं को जलाने की परंपरा बन चुकी हो वहां आप दोनों को एक कैसे मान सकते है? क्यों बार बार तुलना करते है एक दूसरे में जबकि तुलनात्मक अध्यन दो विभिन्न तत्वों का किया जाता है|   दोनों को सामान बता कर आप अपनी मानसिक कमज़ोरी को छिपाने  का प्रयास क्यों कर रहे हैं ? एक व्यक्ति की विचारधारा बदलने से कुछ नहीं होगा बदलना है तो समाज की सोंच को बदलो |
 लगातार बोलने से उसका गला रुंध गया था थोड़ा पानी पीने के वह बोली सामने की वर्थ पर मेरी बेटी है जिसका एड्मिसन कालेज में हुआ छोड़ने जा रही हूँ इसके पिता जी अस्पताल में भर्ती  है मुझे तो सभी धर्म निभाने है कहीं कोई चूक हो गयी तो सब कहेंगे गैर जिम्मेदार औरत .........................
अपनी बात ख़त्म करने के बाद वह उसी मुद्रा में पढ़ने लगी |हम सभी लोग उसकी बातों पर  विचार  करने की मुद्रा में बैठे रहे | एक सन्नाटा छाया  रहा...........................
तभी सामने बैठी एक पच्चीस छब्बीस साल की औरत ने चुप्पी तोड़ी और बोली आप लोग संतरे लेंगे क्या ? सबने ना में सिर हिला दिया |और बोली इस समस्या का हल सब अपने हिसाब से निकालते है | लगभग पांच साल पहले मेरी शादी हुई थी बहुत धूमधाम से एक अच्छी शादी का अर्थ तो आप समझ ही गए होंगे | कुछ दिन पति ने अपना आदमी का रूप दिखाना शुरू कर दिया |शराब पी कर मारा पीटी, गली गलौज एक दिनचर्या बन चुकी थी और उसे सिर झुका कर सहन करना मेरी आदत , मैंने अपनी बुजदिली को सहनशीलता का नाम दे दिया था |और एक दिन उसने तलाक के पेपर मेरे सामने रख दिए मैंने चुपचाप हस्ताक्षर कर दिए | बेटी , पत्नी , माँ और ना जाने कितने नाम के साथ एक नाम और जुड़ गया परित्यक्ता ..................        उसकी बात सुनकर हम सब स्तब्ध थे और अपना मुंह छिपाने के लिए इधर उधर देख रहे थे | अब गाड़ी रुक चुकी थी  मै  खिड़की से  बाहर देखने लगा अचानक अपनी ऑंखें बंद कर ली क्योंकि प्लेटफोर्म पर लगा भारत सरकार का महिला सशक्तिकरण  का विज्ञापन मेरा मुंह चिढ़ा रहा था .................

35 टिप्‍पणियां:

  1. सबसे सटीक
    क्यों बार-बार तुलना करते हैं ?

    क्या अपने बडप्पन को दिखाते हैं हम ?

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  2. महिला ने जो कुछ कहा उसमें मार्मिक सच्चाई है।
    चिंतन के लिए बाध्य करता सामयिक आलेख।

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  3. स्तब्ध हूँ..... लिखने को शब्द नहीं है.....सभी शब्द जैसे मुँह चिढा रहे है.....मगर विश्वास अब भी है .. सोच एक न एक दिन जरूर बदलेगी....

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  4. सोच बदलने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है , गाल bazane से कुछ नहीं होगा मुह में दर्द ही होगा , भले चुप रहे अंतर में झांके और क्या कर सकते है हम सोचे, सामूहिक आवाज़ उठाये . समाज को दिखाए. बेटा हो तो बिना दहेज़ शादी का संकल्प ले, समाज से न डरे प्रतिस्था का प्रश्न दहेज़ को न बनाये , बेटियों को भरपूर पढाये और अंत में, स्त्रियों को सम्मान दे बस .

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  5. अत्यंत गंभीर ,सोचनीय प्रश्न .............कि आखिर गलती कहाँ पे हुए है ..................................................

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  6. औरत से शुरू हुई बात को औरत के साथ ही औरत के मुताल्लिक ही ख़त्म करते हुए सार्थक सन्देश देने में कामयाब है यह छोटी सी कहानी| 'परित्यक्ता' का बिल्ला जिस पर लग गया, उस के लिए जीवन हर पल किसी भयंकर चुनौती से कम नहीं होता|

    ऐसी चर्चाएँ अक्सर रेलगाड़ियों में होती हैं| तत्काल कोई हल भले ही न निकले, पर हमारे अंतर्मन में ऎसी कुछ चर्चाएँ अपना प्रभाव अवश्य छोड़ जाती हैं|

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  7. स्त्री जीवन की त्रासदी को शब्दों में व्यक्त कर पाना अत्यंत मुश्किल है !
    मन पर देर तक प्रभाव छोड़ने में सफल रही कहानी. बधाई

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  8. अपने जीवन के दुखों के कारण औरों पर थोपने की प्रवृत्ति घरों को तोड़ रही है।

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  9. हकीकत तो यही है ...समाज का नंगा सत्य !
    हार्दिक शुभकामनायें ..

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  10. वास्तव में यह सत्य मुंह चिढ़ा रहे हैं

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  11. सच्चाई तो यही है। महिला सशक्तिकरण के किये दावे जमीनी हकीकत से काफी दूर है।

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  12. pपरित्यक्ता, बेवा, विधवा... ऐसे कई विशेषण जड़ दिए जाते हैं :(

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  13. ....सोचनीय प्रश्न ....मन पर देर तक प्रभाव छोड़ने में सफल...... बधाई

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  14. जब तक पति पत्नी एक दूसरे को अपने जैसा इंसान न समझेंगे उनमें शांति नहीं रह सकती. शादी निभाने की चीज़ है- बार-बार एक्सपेरीमेंट करने की नहीं.

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  15. सही चित्र खींचा है .महिला सशक्तिकरण की बातें केवल मुंह ही चिढाती है. सार्थक पोस्ट.

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  16. समाज की सोच जब तक नहीं बदलती ये प्रश्न बार बार उठते रहेंगे.

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  17. असल तस्वीर यही है।
    बहुत बढिया

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  18. मुझे लगता है की बहस करने के बजाये लोगों को खुद उदाहरण रखने चाहिए खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है जब एक समझदार व्यक्ति अपनी बेटी के साथ समानता की बात किये बिना बेटी को भी बेटे की तरह पलेगा उसे वही सुविधाए और देखभाल देगा जो अपनी बेटे को देता है तो उससे आप पास के लोगो पर ज्यादा असर होता है | रही बात रात को बेटी को घर से बाहर भेजने की बात तो ये कही से भी समानता की बात नहीं है ये तो समाज में बिगड़े कानून व्यवस्था का कारण है वरना देश में कुछ ऐसे इलाके भी है जहा शाम होते ही लोग खुद घर से बाहर नहीं निकते तो बेटी की क्या बात है |

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  19. विकृत समाज की सच्ची तस्वीर .

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  20. हमें अपनी सोच बदलनी होगी...
    तल्ख़ सच्चाई को उजागर करती मार्मिक एवं विचारणीय प्रस्तुति

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  21. बहुत मर्मस्पर्शी लेकिन कटु सत्य..लेकिन हमें अपनी सोच बदलनी ही होगी..बहुत सटीक प्रस्तुति..

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  22. सच्चाई को आपने बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! सार्थक लेख!

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  23. गहन विचारपूर्ण सार्थक लेख....

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  24. कडुवी सच्चाई कही है महिला ने ... कटु सत्य है जीवन का ...

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  25. गहन..कटु सत्य ्लेकिन सर्थक लेख...आभार..

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  26. महिलाओं की स्थिति! देश की प्रगति! सब दुखी करते हैं।

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  27. समाज का नण्गा सच आपने बहुत सही तरीके से दिखाया है कहना आसान है मगर बदलना मुश्किल बहुत लिखा कहा कि लडकी और लडके मे कोई फर्क नही लेकिन लडकियों की शादी के बाद पता चला कि बहुत फर्क है। जिन बेटिओं को बेटों की तरह पालते हैं उनको 4एक पल देखने के लिये भी तरस जाते हैं दुख सुख मे भी ससुराल या पति की आग्या बिना वो कुछ नही कर पाती। और इधर बूढे माँ बाप कितने छोटे छोटे कामों के लिये भी दूसरों का मुँह ताकते हैं। ये कभी न खत्म होने वाली बहस है। खुद को बदलना कोई नही चाहता बस दूसरों को नसीहत ही देते हैं। बहुत अच्छी लगी पोस्ट। धन्यवाद।

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  28. समझ से परे है सोच कब तक बदलेगी। आपने जो तीन प्रश्न किये है उनके 90 प्रतिशत उत्तर न मे ही होगे ।दस प्रतिशत का कह नहीं सकता ।लगभग 40 साल तो हो गये मुझे सोचते मगर स्थिति बद से बदतर ही होती चली जारही है । यह ऐसा अन्तहीन सिलसिला है जो न जाने कब से चल रहा है और कब तक चलेगा । देखिये आज से करीब 250 वर्ष पूर्व नजीर अकबराबादी ने कविता लिखी थी उसकी लाइन मुझे याद है ’’मुफलिस जो ब्याह बेटी का करता है बोल बोल /पैसा कहा जो जाके वो लावे दहेज मोल/सार्थक लेख। कुछ तो लोगों की बुध्दि में बात बैठेगी ।

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  29. भाई सुनील जी बहुत ही दिल को झकझोर देने वाली पोस्ट बधाई

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  30. सुनील जी बिल्कुल सही जगह पर चोट कर रही आपकी ये रचना .........एक के बदलने से क्या होगा जब तक समाज का एक एक अंग ना जाग जाये, आज बेटे और बेटियों को समान असमान कहने वाले लोग बहुत देखे हैं जिनके बोलने और करने में काफी फर्क है ,यदि आप सारे दिन में १० लोगो से इस पर चर्चा करें , बेटे बेटी के परवरिश में क्या वो अंतर करते हैं उन्हें एक की बजाय दुसरे को ज्यादा मान अहमियत देते हैं, पता चलेगा वो कहेंगे जी बिल्कुल मैंने तो कोई अंतर नहीं किया बेटे बेटी में ,,,,,,,,तो यदि ये समाज के कुछ लोग को ही मिला कर तो पूरा समुदाय और देश बन रहा फिर कौन है जो दोनों को समानता का हक़ नहीं दे रहा,
    क्या दुसरे दुनिया के लोग आते हैं बेटियों पर जुल्म करने , उन्हें एक बेटी से पत्नी बहू माँ ना जाने किस किस नाम के साथ क्या क्या बना देते हैं ये हमारा सभ्य समाज ही है जो सदियों से मापदंड ख़ुद तय करते आये है ख़ुद के हिसाब से ,और जहाँ नारी इसका विरोध करना चाहती है उसे दबाने की चेष्टा, और यदि बगावत पर आ जाये तो कुलटा ,बदचलन ,समाज के नियमो से bahar जानेवाली ना जाने और क्या क्या ,यदि उसमे सहनशीलता है तो वो बुराइयों से लडती है और यदि व्यंग्य बातों से टूट गयी तो सिलसिला जो सदियों का चला आ रहा नारी को सहनशील और त्यागशिला होना चाहिए को दुहराती रहेगी ,,,,,

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