मंगलवार, जुलाई 12, 2011

आक्रोश का बीज

बंद करो तुम
अपने,
अत्याचार की
बारिश  को |
सब कुछ
बहा ले जाने का
तुम्हारा  सपना
उस पल चूर चूर
हो जायेगा |
जब एक बीज
अंकुरित होकर
एक बृक्ष
बन जायेगा |
क्योंकि !
मेरे अंदर
जमा है ,
आक्रोश का,
एक बीज|

38 टिप्‍पणियां:

  1. आक्रोश के बीज को वृक्ष बनाने का अच्छा सपना बुना है आपने.
    इसका आत्मविश्वास आपकी कविता मे दृष्टिगोचर हो रहा है.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

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  2. कल 13/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. बहुत खूब अनिल कुमारजी .आक्रोश की काव्यात्मक अभिव्यक्ति खबरदार करती सी .

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  4. आक्रोश को यूँ ही पलने दीजिये.
    जब भड़केगा तो ज्वालामुखी बन के
    ----------------------
    दहेज़ कु-प्रथा !

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  5. इस बीज को पेड़ बनने दिजिए। तभी तो ये चारो तरफ फैलेगा।

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  6. आक्रोश का बीज और अत्यचार की बारिश ... बहुत कुछ कह गयी

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  7. यही बीज न जाने कितने अध्याय रचेगा।

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  8. संवेदना से भरी मार्मिक रचना....

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  9. कमाल है लगभग इन्हीं भावों के इर्द गिर्द बनी थी मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की दो फ़िल्में "अंकुर" और "आक्रोश".. आज आपने चंद पंक्तियों में इनको समाहित किया है!! सुन्दर!!

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  10. गहरी बात।
    कम शब्‍दों में काफी कुछ कह गए जनाब।
    शुभकामनाएं आपको.........

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  11. भावप्रवण कविता पढवाने का आभार,

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  12. एक जोश भरी, आक्रोश भरी कविता !

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  13. कभी लिखी दो पंक्तियाँ आप से साझा करता हूँ


    गरमी बिना जलधार से कब गगन भू धोता
    हर क्रान्ति का आधार निश्चय दमन ही होता

    ये अत्याचार की बारिश ही, आक्रोश के बीजों को वृक्ष बनने में मददगार साबित होती है|

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  14. बेहद भावपूर्ण रचना। मन को छू गई।

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  15. akoush ka bij bahut kuchh in tin shbdon me bahut sunder
    rachana

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  16. सुन्दर विचार, शायद ऐसे बीज हर ओर पनप रहे हैं।

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  17. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना ! बढ़िया प्रस्तुती!

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  18. सारगर्भित रचना.
    मनोभाव को सहज रूप से प्रस्तुत किया है.

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  19. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है आपकी...
    उत्साह और आक्रोश से ओतप्रोत...
    आभार.

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