सोमवार, सितंबर 12, 2011

सीनियर सिटिजन स्पेशल....(.लघुकथा)


बस स्टेंड के पास एक चाय की छोटी सी दुकान जिसमें केवल चाय और बिस्कुट के 
सिवा कुछ भी नहीं इसके अतिरिक्त दो बेंच और अलग अलग भाषाओँ के तीन अख़बार
इन सब का मालिक है शंकर हँसमुख| नाम तो केवल शंकर था हँसमुख तो उसके व्यवहार 
को देख कर इस महानगर के लोगो ने लगा दिया था | शंकर की इंट्री बीस साल पहले  इस 
शहर में छोटू यानि होटल में काम  करने वाले बच्चों  के रूप में हुई थी | आज वह एक तेरह 
 साल के लड़के का बाप है| जिसे ड्रेस पहन  कर और टाई लगा कर स्कुल जाते देख उसकी 
ख़ुशी छिपाए नहीं छिपती | एक पाँच  रुपये का सिक्का शंकर के जेब में हर सुबह रहता बेटे 
की जेबखर्च के लिए या यूँ कहें ज़रूरत के लिए ........
सुबह छ बजे से लेकर नौ बजे तक का पीक आवरऔर उसके बाद शुरू होता घर के बूढ़े लोगों 
का आना जो कोई सामान खरीदने के नाम से निकलते  और एक  कट चाय जिसका नाम
सीनियर सिटिजन स्पेशल रखा था , पी कर, बतियाकर और सभी अख़बारों को 
आराम से पढ़ कर जाते थे | इस बीच में शंकर भी उनसे हाल - चाल पूछ लेता था |
शंकर ने गुप्ता जी से पूछा " साब आजकल शर्मा जी नहीं आ रहे हैं तबियत तो ठीक है ना "
गुप्ता जी ने कहा ऐसी कोई बात नहीं है मै तो रोज उन्हें छत पर अकेले बैठे हुए देखता हूँ |
अचानक एक दिन शर्मा जी दुकान के सामने से निकले तो शंकर ने पूछ ही लिया "क्या बात 
तबियत तो ठीक है सुगर उगर तो नहीं बढ़ा , चाय क्यों बंद कर दी?
शर्मा जी ने जबरदस्ती की मुस्कराहट चेहरे पर लाते हुए कहा भाई मंहगाई बढ़ गयी और 
बेटे ने जेबखर्च बंद कर दिया है |
यह सुनते ही शंकर ने अपनी जेब में पड़े हुए पाँच के सिक्के को जो उसने अपने बटे के जेबखर्च 
के लिए रखा था कस कर भींच लिया ...............
                                                                           
 

39 टिप्‍पणियां:

  1. शाद आज की यही हकीकत है बढ़िया एवं सार्थक कहानी ...
    समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  2. सार्थक और प्रासंगिक आलेख ....

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  3. ये कहानी तो राजेश खन्ना की फिल्म अवतार और अमिताभ की बागवान की याद दिलाती है पर शायद ये जिन्द्गी की हकीकत है कहानी अच्छी लगी,

    इक कहानी हमारी भी है कभी मन कर तो आईयेगा जरुर
    http://mirchinamak.blogspot.com/2011/09/blog-post_3297.html

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  4. कैसे भूल जाते हैं लोंग कि उन्होंने किस तरह पाला पोसा हमें !

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  5. सार्थक सन्देश और भयभीत करता भविष्य. प्रासंगिक आलेख.

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  6. ओह! क्या बुढ़ापा बच्चो के लिए अभिशाप है.
    मार्मिक,भावुक करती इस प्रस्तुति के लिए आभार,सुनील जी.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर भी आईयेगा.

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  7. मन को गहरे तक छू गई यह लघुकथा....

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  8. बहुत ही मार्मिक और दिल को छु लेनेवाली अनोखी लघु कथा /कभी भी कोई किसी पर आश्रित नहीं होना चाहिए खासकर बुढ़ापे में /अपने भविष्य के लिए बचा कर रखे भावुकता में ना आयें /क्योंकि आज के जमाने में पैसा ही भगवान् है /


    please visit my blog
    www.prernaargal.blogspot.com

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  9. मार्मिक ....ऐसा भी होता है ...कभी देखा नहीं ....पर सुना बहुत है

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  10. अंतर्मन को उद्देलित करती लघुकथा....

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  11. bahut sashakt aur maarmik kahaani. waqt kis roop mein saamne aaye kaun jaanta hai? saarthak rachna ke liye shubhkaamnaayen.

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  12. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  13. दुखद स्थिति। आज का सच्चा चित्रण। बधाई सुनिल भाई॥

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  14. Sunil jee आपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
    आप भी मेरे ब्लाग पर आये और मुझे अपने ब्लागर साथी बनने का मौका दे मुझे ज्वाइन करके या फालो करके आप निचे लिंक में क्लिक करके मेरे ब्लाग्स में पहुच जायेंगे जरुर आये और मेरे रचना पर अपने स्नेह जरुर दर्शाए...
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  15. बेटे के ज़ेब ख़र्च को केंद्र में रख कर बुनी गई प्रभावशाली लघुकथा

    अपनी वही ज़ुबान जो कि है हिन्दुस्तानी

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  16. सीनीयर सिटिज़न स्पेशल एक मार्मिक अपने समय के यथार्थ के डंठल कुरेदती व्यथा है .

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  17. सीनीयर सिटिज़न स्पेशल एक मार्मिक अपने समय के यथार्थ के डंठल कुरेदती व्यथा है .
    अफवाह फैलाना नहीं है वकील का काम .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/2011/09/blog-post_13.html

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  18. बहुत ही मार्मिक...आज के हालात पर करा्री चोट....

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  19. ऐसा ही होता है... हमारी स्मृति इतनी अल्पकालीन है कि माता-पिता के त्याग को भुला देती है...और ऐसा करते वक्त हम यह भी भूल जाते हैं कि कल हमें भी बूढा होना है...

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  20. आपकी हर रचना की तरह यह रचना भी बेमिसाल है !

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  21. शर्मा जी ने जबरदस्ती की मुस्कराहट चेहरे पर लाते हुए कहा भाई मंहगाई बढ़ गयी और
    बेटे ने जेबखर्च बंद कर दिया है |


    बहुत शशक्त लेखन है आपका ,लेख और काव्य दोनों
    आपका ब्लॉग पर आना और हौसला_अफजाई करना यक़ीनन मेरी खुशकिस्मती है

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  22. समय का बदलाव क्या क्या दिखाता और करवाता है ...
    बहुत ही प्रभावी कहानी ...

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  23. bahut -bahut hi prerak v yatharth ka aaina dikhane wali aapki is prastuti ne man ko bhaik kar diya aur sath-sath ek sawal bhi chod gaya.
    bahut hi sashakt laghu katha
    hardik badhai
    poonam

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  24. aaj ka katu yatharth jise jaan kar, delh kar dil lahuluhan ho jaata hai, Prabhu sabko sadbudhdhi dein ke sab apne mata-pita ke tyag ko yaad rakh sakein.

    achha likha hai

    shubhkamnayen

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  25. बेहद नाज़ुक और असरदार प्रस्तुति

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  26. Bhai ji,vichalit kardene wali sacchai hai ye,aaj ke pragatisheel yug ka aadarsh
    sader,
    dr.bhoopendra

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