शनिवार, अगस्त 27, 2011

तुलसी की व्यथा .......





आज आँगन की तुलसी ,
क्यों उदास है !
शायद उसको भी , 
घर के बटबारे का आभास है |
जब से दिलों के बीच ,
दूरियों बढ़ने लगीं थीं |
तभी से उसकी जड़ें ,
कमज़ोर पड़ने लगीं थीं|
कल जब आँगन में 
बटबारे की दीवार उठाई जाएगी |
वह तुलसी उसकी बुनियाद में,
यूँ ही दफ़न हो जाएगी|
 यह सोंच कर
वह आज परेशान है|
मुहब्बत की मिसाल ,
कही जाने वाली तुलसी,
कल क्या मुंह दिखाएगी |

(चित्र गूगल के सौंजन्य से)  

51 टिप्‍पणियां:

  1. उद्वेलित करने वाली कविता है सुनिल भाई॥

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  2. बहुत सुन्दर रचना, सार्थक और खूबसूरत प्रस्तुति .

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  3. सुन्दर सशक सार्थक प्रस्तुति .

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. सत्य को लिख दिया है तुलसी व्यथा में

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  6. वाह!बहुत खूब लिखा है आपने! मन की गहराई को बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! आपकी लेखनी को सलाम.

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  7. सच कहा ... घर घर तुलसी आ जायेगी पर आँगन की तुलसी पीली पड़ जायगी ...

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  8. adunik yug ka yathath aapne tulsi ke madhyam se prastut kiya hai............

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  9. मन के मेल पर आदमी बाहर घंटों उपदेश दे सकता है,मगर उसकी अपनी हक़ीक़त दीवार ही होती है।

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  10. क्‍या बात है.....
    बेहतरीन प्रस्‍तुति...............

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  11. नैतिकता की जिवंत जड़ों को अघात लगने लगा है ,ये सच है /
    बहुत ही कुशलता से संवेदना को सजीवता देने का प्रयास
    निश्चित रूप से सफल है ,........./शुभकामनायें सुनील जी /

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  12. सुनील जी बेहद संवेदनशील काव्य बधाई

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  13. जबरदस्त प्रस्तुति ||
    बधाई आपको ||

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  14. यथार्थ का सुंदर चित्रण।

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  15. very beautiful...
    a very serious problem expressed through those line.
    A stunner piece !!!

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  16. बंटवारा एक दुखद यथार्थ है ...सुंदर रचना

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  17. तुलसी थी तेरे आँगन की अब बंटवारा कहलाऊंगी ,मैं यूं ही dabaai jaaoongee .behtreen bhaav ko pradipt karti rachnaa ,behtreen prateek tulsi kaa ,jis ghar me tulsi us ghar me chain ,jahaan n tulsi vahaan n rain ..... http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
    Saturday, August 27, 2011

    अन्ना हजारे ने समय को शीर्षासन करवा दिया है ,समय परास्त हुआ जन मन अन्ना विजयी .

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  18. उफ़ तुलसी के माध्यम से एक यथार्थ प्रस्तुत कर दिया।

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  19. मर्म भरी आखरी पंक्ति ! सुन्दर

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  20. सोचने पर मजबूर करती रचना ...बेहद प्रभावशाली

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  21. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण कविता लिखा है आपने! दिल को छू गई हर एक पंक्तियाँ! मार्मिक प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  22. bantvara aur duriyan aaj ka katu satya hai....tulsi ki vyatha ke jariye marmik chitran ...badhai

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  23. अब तो तुलसी के साथ-साथ कुल देवता भी बांटने लगे हैं..संवेदनशील कविता

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  24. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना....

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  25. तुलसी अपने वजूद को
    बनाये रखना चाहती है
    ...बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति.. ...बधाई

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  26. एक भींगा सा अहसास है इस कविता में।

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  27. एक कटु सत्य की प्रभावी प्रस्तुति..

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  28. jivan ka satya yahi hai dil bat jata to makaan to batna hin hai. tulsi ke maadhyam se bahut sundar abhivyakti, badhai.

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  29. दरकते सम्बन्धों का दर्द .....
    हृदयस्पर्शी रचना

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  30. आपने तुलसी के ज़रिये संबंधों के बदलते सच पर बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुत की है ...

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  31. जैसे ही आसमान पे देखा हिलाले-ईद.
    दुनिया ख़ुशी से झूम उठी है,मनाले ईद.
    ईद मुबारक

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  32. बिल्कुल सही कहा आपने
    तलसी को माध्यम बनाकर
    अतिउत्तम प्रस्तुती।

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  33. तुलसी एक प्रतीक है हमारी संस्कृति की ,संस्कार की ...जिसका अतिक्रमण आजकल की भौतिकतावादी सोच निरंतर करती जा रही है .........मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद सुनील जी|

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