शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

हम ऐसे क्यों है ....



रसोई में काम  करती हुई पत्नी के चेहरे की खीझ साफ दिखाई दे रही थी | कारण था घर में काम करने वाली बाई यशोदा का ना आना | मुझे याद आ रहा था छुट्टी लेने से पहले वह कुछ पैसे मांग रही थी |  बाबूजी कुछ पैसे की सख्त ज़रूरत है "| मैंने पत्नी की तरफ इशारा करते हुए कहा "कुछ पैसे  इसको दे दो"|  उत्तर में पत्नी का क्रोधित स्वर सुनाई दिया  "घर में एक भी पैसा नहीं है | उसी समय  पत्नी बोली " किसी तरह से एक हज़ार रुपये सोनू के जन्मदिन पर गिफ्ट देने के लिए रखे हैं  अगर कुछ नहीं देंगे तो उसका मूड ख़राब हो  ख़राब हो जायेगा |   कुछ दिनों तक वह काम पर नहीं आई और एक दिन अचानक  फिर काम पर आ गयी  और उसी तन्मयता  से काम करने लगी | पत्नी ने गुस्से से पूछा इतने दिन कहाँ थी  ? उसने  अपना चेहरा उठाया और बोली कुछ दिनों से मेरा बेटा बीमार था और तीन दिन पहले चल बसा | मैंने चेहरे पर नकली क्रोध लाते हुए कहा इलाज कहाँ कराया उसने कहा सरकारी अस्पताल में, बाहर इलाज में तो हजार पाँच सौ  लग जाते | वह मेरे पास कहाँ! मैंने कहा तो मांग लेती वह बोली अगर आप दे देते तो सोनू के जन्मदिन पर गिफ्ट कैसे आती ? और फिर उसका मूड ख़राब हो जाता .........
यह कह कर वह ऊपर वाले मकान के सीड़ियाँ चढ़ गयी और धकेल गयी मुझे गहरी खाई में कुछ सोंचने के 
लिए  कि  हम ऐसे क्यों है ...... 


(एक पूर्व प्रकाशित एवं पुन : सम्पादित रचना )

32 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्तम रचना सोमवार को हमारे साथ आप देख सकते हैं ब्लॉगर्स मीट वीकली में। आपका स्वागत है।
    http://www.hbfint.blogspot.com/

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  2. सुनील जी ये संवेदनहीन समाज की प्रगति है छद्म प्रगति , पाश्चात्य प्रगति. दिलों में संवेदना भरने के प्रयास कैसे हो सोचने का विषय है .

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  3. आजकल के समयों की बेहद मार्मिक और सटीक अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  4. मानवीय भावनाओं का ह्वास हो रहा है स्वार्थ उत्थान पर है।

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  5. इस तरह की कहानिया पढ़ा कर सभी आते है और दूसरो को कोस कर चले जाते है यदि थोडा खुद पर ध्यान दे तो कभी थोडा कभी ज्यादा हम सभी कुछ ना कुछ ऐसा हम भी करते रहते है |

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  6. हमें अपने जमीर को मारकर नहीं जीना चाहिए पता नहीं हम ऐसे क्यों हो जाते हैं ......

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  7. बहुत गहरे भाव के साथ आपने सच्चाई को बड़े ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! मार्मिक प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  8. हकीकत है!! मगर झूठी कहानियां इतनी सुनाने को मिलाती हैं कि सच्चा मजबूर अगर सच्ची व्यथा भी सुनाये तो भरोसा नहीं होता!!

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  9. उफ़ …………एक ह्रदयविदारक मगर कटु सत्य झकझोरने को मजबूर करता है।

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  10. आंखे खोल देने वाली कहानी है। ईश्वर से यही प्रार्थना कि ये कहानी ही रहे, कभी ऐसी हकीकत से सामना ना करना पडे। वरना फिर इस सोनू का कभी जन्मदिन नहीं मनेगा।

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  11. सोचने क को मजबूर करनेवाली रचना... आखिर हम ऐसे क्यों हैं...

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  12. सुनील भाई इसे रचना न कहें ये तो बहुत ही शानदार लघु कथा है

    आपसे एक दरख्वास्त है एक बार कभी कुछ अपनी हैदराबादी स्टाइल में कुछ प्रस्तुत करें............... आय एम श्योर बाकी मित्र भी ठहाके मार कर हँसेंगे :)

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  13. sach mein hum aisa kaise kar saktein hain...........Apne siwa hum kisi aur ke baare mein kun nahi soch paate...

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  14. सच में हम ऐसे ही है ,अपना स्वार्थ पहले..सोचने को मजबूर करती रचना बहुत सुन्दर..

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  15. संवेदनाहीन होते जा रहे समाज से यह पूछा जाना आवश्यक है कि ‘हम ऐसे क्यों होते जा रहे हैं?‘
    मार्मिक लघुकथा।

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  16. आपकी कथाएँ स्तब्ध कर देती है.

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  17. आज के समाज का सच. बहुत मार्मिक प्रस्तुति.

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  18. सच्चाई को बड़े ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है!
    फ्रेंडशिप डे ' की आपको ढेर सारी शुभकामनाएँ ....

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  19. बेहद सम्वेदनशील रचना

    जो वकई सोचने पर मजबूर करती है , हम ऐसे क्यों है ????????

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  20. बेहद मर्मस्पर्शी ........नि:शब्द कर गयी .....

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  21. कल 12/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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