शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

इनसे कुछ ना कहना

    अपनी बात आरम्भ करने से पहले मै यह बताना चाहता हूँ कि
रचनाकार कि कलम ना ही राजनीति के बृक्ष कि साख से बनती
है और ना ही इसमें किसी पार्टी कि स्याही का प्रयोग होता है |
पिछले  कुछ दिंनों से संसद में अवरोध बना हुआ है |  कारण है कुछ
घोटाले जो कि हमारे लिए एक आम बात बन चुके है  अब प्रश्न यह उठता 
जिस प्रकार सरकारी कर्मचारी के काम ना करने पर उसका वेतन" नो वर्क
नो पे" के आधार पर काट लिया जाता है| 
क्या इनके साथ भी यही होता है ?
क्या इनको सरकारी कार्यों में व्यवधान पहुँचाने का संविधानिक अधिकार है 
कुछ साल पहले तिरंगा यात्रा और दागी मंत्री का मुद्दा भी छाया  रहा था |
समय व्यर्थ मत कीजिये एक मंचीय रचना के माध्यम से इनका हाल देखिये

रोज रोज नये नये कुछ मुद्दे ढूंढ़  लाते है| 
भूख और गरीबी का यह मुद्दा भूल जाते है |
सिर अपना शर्म से कुछ और झुक जाता है 
जब देश का तिरंगा एक मुद्दा बन  जाता है 
|
                 दागी मंत्री 

दागी दागी , दागी कुछ दागी चिल्लाते है ,
शांत शांत , शांत कुछ शोर मचाते है |
दूसरों के दागों कि कहानी वह  सुनाते है, 
पर अपने दागों को जो देख नहीं पाते है|
दाग कैसे देखेंगे जब आँखें मूंद रखी है ,
और आइना भी ऐसा जिसमें कालिख पोत रखी है| 



35 टिप्‍पणियां:

  1. दाग कैसे देखेंगे जब आँखें मूंद रखी है,
    और आइना भी ऐसा जिसमें कालिख पोत रखी है।

    वाह..क्या बात है...
    जबर्दस्त प्रहार।

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  2. दाग कैसे देखेंगे जब आँखें मूंद रखी है ,
    और आइना भी ऐसा जिसमें कालिख पोत रखी है|

    बहुत तीखा और सटीक कटाक्ष आज की राजनीतिक व्यवस्था पर..आभार

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  3. देव के भावों को व्यक्त करती कविता।

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  4. sunil ji bahoot sahi kaha aapne. ek sarthak post. sare neta to dagi hi hai fir kispar shore macha hai.....

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  5. सिर अपना शर्म से कुछ और झुक जाता है
    जब देश का तिरंगा एक मुद्दा बन जाता है
    Aah!
    Betiyon kee kalakrutiyan behad sundar hain!Jeevan se bharpoor!

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  6. क्या बात है भाई सुनील जी।दागी दागी दागी कुछ दागी चिल्लाते है इस लााइन का व्यंग्य दिल को छू गया । आइना भी ऐसा कि जिस पर कालिख पेात रखी है

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  7. आपकी कविताओं ने वर्तमान की सही तस्वीर खीच दी है.
    सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  8. सुनील जी! आपने तो बिना कालिख पुता चमकदार आईना दिखा दिया! लेकिन गेंडे की खाल पर कोई असर नहीं होता!! मज़ा आ गया,व्यंग्य की धार देखकर!!

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  9. आइना भी ऐसा कि जिस पर कालिख पेात रखी है
    जबर्दस्त प्रहार। सही, सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति

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  10. रोज रोज नये नये कुछ मुद्दे ढूंढ़ लाते है|
    भूख और गरीबी का यह मुद्दा भूल जाते है |
    सिर अपना शर्म से कुछ और झुक जाता है
    जब देश का तिरंगा एक मुद्दा बन जाता है
    प्रभावी अभिव्यक्ति .......
    (शिवांगी और आरुषी की बनाई स्केच बहुत अच्छे हैं......)

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  11. सिर अपना शर्म से कुछ और झुक जाता है
    जब देश का तिरंगा एक मुद्दा बन जाता है
    अपनी हालत भी कुछ ऐसी है ...बहुत खूब

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  12. और आइना भी ऐसा जिसमें कालिख पोत रखी है| शानदार प्रस्तुतिकरण वर्तमान राजनीतिक हालात का ।

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  13. अच्छा व्यंग्य लिखा आपने, सब वोट की राजनिती है क्या पक्ष क्या विपक्ष |

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  14. गिरगिट भी इनकी फितरत देख कर शरमाया है
    क्योकि इन नेताओ ने इसकी कहावत को भी झुठलाया है
    कल तक सब कहते थे सियार धूर्तता मे सबसे आगे है
    आज वो भी बेचारा अपनी गिरती पोजीशन पर खिसियाया है
    बहुत सही व्यंग किया आपने ॥॥।

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  15. 5/10

    रचना के अन्दर आज की राजनीतिक माहौल पर तीखा और सटीक कटाक्ष प्रस्तुत किया है
    यह पंक्ति दिल बेधती है :
    'जब देश का तिरंगा एक मुद्दा बन जाता है'

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  16. आपके व्यंग की धार बहुत तेज है .... गज़ब का लिखा है ..

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  17. आपका ब्लॉग ....सुन्दर ,अनेक रस से भरा हुआ , प्रेरक व प्रभावी है .यहाँ आना सुखद प्रतीत हो रहा है .. आपको बधाई

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  18. बढ़िया व्यंग्य ! शुभकामनायें !

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  19. sunil ji bahut hi sarthak avam samyanukul rachna hai aapki.
    aapki kavita padhkar kabeer das ji ka ek doha yaad aa gaya.
    -----------chale hasat -hasat
    aapno yaad na aavai ,
    jako aadi na ant.
    maaf kijiye ga shuruwat yaad nahi aa rahi hai.
    han ,aapne puuchha tha ki main kis umra ki baat kar rahi hun, to batati chalu ki maine us umrake baare me likha hai ki jab koi bhi shaksh
    yuvavastha me pravesh karta hai to har kisi ke man ke kahi kone me kuchh khvahishe kuchh ,kuchh aakrshhhan ya bahut sare armaan savrte bigadte
    rahte hai,chhahe vo us umara ka hi prabhauv matr aakarshhan bhar hi hota ho.
    par jo aapne chahto ko pa jaata hai
    vah to safal ho jaata hai aur jo nahi pura kar paata vo ise apni jindgi ka ek sunahara sapna
    samajh saath liye chalta hai.jaroori nahi ke yah sabhi ke saath hota hai.
    kyonki vo umr hi aise hoti hai jisme insaan ko haqikat ki pahchan nahi hoti.
    aapne meri kavita ko itne gahre soch ke saath padha iske liye bahut bahut dhanyvaad.
    poonam

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  20. वर्तमान स्थिति पर करारा व्यंग्य !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  21. सुनील जी मैं आपसे 100 प्रतिशत सहमत हूँ। प्रभावी कटाक्ष।

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  22. kai cheeje aisi hoti hai jis pr thithak kr insan nhi sochta hai bs vkt ki kmi ka bhana kr ke aage bd jata hai . aisi sthiti me aapki ye rchna bhut hi prasngik lgi . bhut bhut dhnywaad .

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  23. सिर अपना शर्म से कुछ और झुक जाता है
    जब देश का तिरंगा एक मुद्दा बन जाता है
    |
    iske baad bhi kuchh bachaa kyaa? Are ye besharm hai sb, bhrast to hai hi, pata nahi sb kuchh jaante aur sabak sikhaane ka dambh bharti Janta bhi ain waqt chhalaawe me aa jaati hai. Shaayad sabhi ke andar yah rog nyoonaadhik roop me lag gayaa hai. Kuchh to karna hi padega......

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  24. .

    दागी दागी वाली पंक्ति बहुत जबरदस्त लगी । ये दागदार सफेदपोश इसी खुशफ़हमी में जीते हैं की -- " दाग अच्छे हैं "

    .

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  25. आपने तो बहुत सुन्दर लिखा..बधाई.
    'पाखी की दुनिया' में भी आपका स्वागत है.

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