शुक्रवार, मार्च 25, 2011

मेरा सूरज क्यों जल्दी ढ़लता है ?


मेरी  छत पर आकर सूरज ,
क्यों जल्दी ढल जाता है ?

उगते सूरज की पहली किरण ,
जब मेरे आँगन में पड़ती है |
फटा बिछौना , टूटी खटिया ,
यही तो उसको दिखती है |

धीरे धीरे तपता सूरज ,
जब मेरी रसोई में आता है |
ख़ाली बर्तन, ठंडा चूल्हा  
और नहीं कुछ पाता है |

लिए लालिमा सूरज जब ,
मेरी  खिड़की पर आता है |
बूढी माँ का पीला चेहरा ,
शायद वह देख ना पाता है| 

तभी  तो मेरी छत पर आकर ,
सूरज जल्दी से ढल  जाता है |



33 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन के ढलते सूरज को उत्सव सा स्वीकार करें।

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  2. शायद सूरज भी ये सूनापन बर्दास्त नहीं कर पाता | अच्छी रचना |

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  3. शिकायत सूरज से। ये नये दौर का सूरज है।
    लगता है इसने भी इंसानों से भेदभाव सीख लिया है।
    सुंदर रचना।
    शुभकामनाएं आपको।

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  4. सूरज क्या करे बेचारा.....इसे समझाने वाला कोई नाहे है...

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  5. फटा बिछौना, टूटी खटिया
    यही तो उसको दिखती है....

    बहुत सुन्दर भावपूर्ण गीत...हार्दिक शुभकामनाएं...

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  6. सूरज का बिम्ब ले कही संवेदनशील बातें..... बेहतरीन भावाभिव्यक्ति.....

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  7. सूरज के जल्दी ढलने के पीछे जो कारण कहें हैं वो एक सामाजिक चेतना को कहते हैं ...सुन्दर अभिव्यक्ति

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  8. अजीब अजीब सा हो गया है मन ...उदास सा ..

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  9. होली की आपको बहुत बहुत शुभकामनाये आपका ब्लॉग देखा बहुत सुन्दर और बहुत ही विचारनीय है | बस इश्वर से कामनाये है की app इसी तरह जीवन में आगे बढते रहे | http://dineshpareek19.blogspot.com/
    http://vangaydinesh.blogspot.com/
    धन्यवाद
    दिनेश पारीक

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  10. बहुत खुबसुरती से की गई शिकायत. वाह...

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  11. वाह! भाई वाह! लगे रहिये !!
    बहुत सुन्दर भावपूर्ण गीत...दिल को छू गई प्रस्तुति!!
    हार्दिक शुभकामनाएं..

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  12. समाज के दो छोरों का सुन्दर चित्रण.

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  13. ढलता सूरज अधिक रंग बिखेरता है.
    अच्छी पोस्ट.

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  14. Beautiful poem...you made me emotional by revealing the bitter truth.

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  15. तभी तो मेरी छत पर आकार
    सूरज जल्दी से ढल जाता है.

    सच्चाई बयां करती संवेदनशील कविता. मन को छू लेने वाली. बहुत सुंदर.

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  16. संवेदनाओं से लबरेज़ रचना.
    बहुत अच्छी लगी.

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  17. सूरज ढलता है अगले दिन की सुबह को रास्ता दिखाने के लिये ....
    पहली बार आपका ब्लाग पढा ,बहुत संवेदनशील लगा । आभार !!!

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  18. सूरज का ढलना, परछाई का बड़ा होना . जीवन को सकारात्मक ढंग से लेना , जीवन का मूल मंत्र बन जाए तो अच्छा .

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  19. सूरज तो जब ढलता है तब ढलता है हम ही उसे देख नहीं पाते ! सुंदर रचना !

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  20. सुन्दर रचना, सूरज ढलता है तो कल फिर आने के लिए... आप कल उसके आने पर क्या-क्या करेंगे इसकी तैयारी अभी से करना शुरू कर दीजिये| वोह भी तो रोज़ सुबह कुछ उम्मीदें लेकर आता है न आपके द्वार...

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  21. संवेदनशील रचना ने मन को द्रवित कर दिया।
    आपकी सोच को नमन।

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  22. Beautiful poem and the sketch made by ur daughters r very very beautiful sir.

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  23. ढलता सूरज जरा मन उदास कर गया !
    अच्छी लगी रचना .........

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  24. bahut gahre bhavo se likhi gayi rachna.....bahut khub kabile tareef...

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  25. वाह सुनील जी !

    गरीब बेबस इंसानियत की इतनी भावपूर्ण सार्थक अभिव्यक्ति सराहनीय है |

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  26. Sach hai ye sooraj bhi itna tanha jo rahta hai din bhar ... vo kaise bardaasht karega ...

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