शुक्रवार, मार्च 11, 2011

सुनामी का दर्द



कुदरत की करामात को ,
कोई ना समझ पाया |
हरक़त तो की ज़मी ने ,
समंदर को गुस्सा आया |

बाँहों में जिनकी रहते थे ,
हम अपना समझ कर   | 
करवट क्या ली उन्होंने 
हमें ख़ाक में मिलाया |

किसी माँ से बिछड़ा बेटा ,
 और बहनों से बिछड़ा भाई |
कल बनाया जिसको दुल्हन 
उसी को बेवा  आज बनाया |   

30 टिप्‍पणियां:

  1. आपने सुनामी के दर्द के बहाने जीवन की सच्चाईयों बखूबी अभिव्यक्त किया है ....आपका आभार

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  2. मानव प्रकृति से खिलवाड़ करता है और प्रकृति कैसे उसका बदला ले लेती है ...बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

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  3. Qudrat ne kahar barpaa hai...raungate khade ho jate hain..

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  4. संगीता जी की बातों से सहमत। कुदरत से छेडछाड का नतीजा हमेशा बुरा ही होता है। अब यह छेडछाड हम करें या और कोई और भुगतना सबको पडता है।
    अच्‍छी और जीवन के पलछिन होने का अहसास कराती रचना।

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  5. इस दुखद घटना पर आपकी संवेदनाएं त्रासदी का अहसास कराती हैं. दिल दुखी है आज कुछ और नहीं. ईश्वर उन्हें और आपदाओं से सुरक्षित करे.

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  6. वाह..क्या खूब लिखा है आपने।
    बहुत प्यारी रचना !

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  7. कुदरत के आगे किसी का वश नहीं ।

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  8. सामयिक रचना ...तकलीफदेह हकीकत !
    :-(

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  9. सुनामी का दर्द सच मे बहुत तकलीफ देह है।

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  10. कुदरत के आगे इन्सान बेबस है . मार्मिक रचना .

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  11. बहुत संवेदनशील रचना..इतनी उन्नति होने के बावजूद इंसान आज भी कितना बेवस है कुदरत के सामने..

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  12. सुनामी का तांडव देखकर मन दहल गया!
    --
    सुन्दर रचना रची है आपने!

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  13. बहुत ही सुन्दर आलेख , सचमुच आज धरती चिल्ला रही हैं

    खुद के लिए मुझे ना संवारो
    वेवजह मेरी तस्वीर न बिगाड़ो.

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  14. सुनामी पर सरल शब्दों में सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  15. हां सही है, प्राकृतिक आपदा से पीड़ित व्यक्ति का दर्द कितना अप्रत्याशित होता है.सुन्दर रचना.

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  16. कुदरत के आगे किसी की नहीं चलती... संवेदनशील रचना..

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  17. प्रकृति के आक्रोश के समक्ष सब नतमस्तक हैं।
    मार्मिक कविता।

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  18. प्राकृति के प्रकोप के सारे कोई कुछ नही कर सकता ... बस ऊपर वाले से दुआ ही हो सकती है ...

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  19. दुखद त्रासदी...भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

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  20. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 15 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  21. यथार्थ से समझौता तो करना ही पड़ेगा -इसी का नाम जीवन है .

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  22. Sagar main Gagar hai yeh kavita, itani badi trasadi ko simit shabdon main dhalna... kabile tarif hai!

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