सोमवार, नवंबर 15, 2010

मंहगाई और आम आदमी



बढती हुई महँगाई की चिंता
अब हमें भी होने लगी है |
क्योंकि हमारी फटी मैली क़मीज में ,
लगे बदरंग बटनों का स्थान , 
आलपिन लेने  लगी है |
यह महँगाई यूँ ही बढती जाएगी  
और एक दिन आसमान को छू जाएगी  |
तब ज़मीन और आसमान के बीच का फ़ासला ,
कुछ भी  नहीं रह जायेगा |
आदमी ज़िंदगी के बोझ से मर जायेगा |

(यह रचना पुनः  सम्पादित एवम प्रकाशित है) 

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब... बहुत सही बात लिख दी आपने.

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  2. हालात का सही आंकलन. बहुत ही गहरी बात.

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  3. सुनील जी ...सहमत हूँ . आपने आम आदमी के दिल की बात कही है. आभार.

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  4. क्योंकि हमारी फटी मैली क़मीज में
    लगे बदरंग बटनों का स्थान
    आलपिन लेने लगी है ।

    उपरोक्त पंक्तियां लाजवाब है...बिल्कुल नया अंदाज़ है..
    बधाई , सुनील जी।

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  5. क्योंकि हमारी फटी मैली क़मीज में ,
    लगे बदरंग बटनों का स्थान ,
    आलपिन लेने लगी है ...

    वाह...वा ...वाह....क्या बात है ......!!
    महंगाई की ऐसी तुलना पहले किसी ने नहीं की होगी ....
    बहुत सुंदर .....!!

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  6. क्योंकि हमारी फटी मैली क़मीज में ,
    लगे बदरंग बटनों का स्थान ,
    आलपिन लेने लगी है |

    महंगाई की ऐसी तुलना .... कमाल... बेहद सुंदर

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  7. बहुत खूब
    बधाई
    वस्तुएं मंहगी, इंसान सस्ते में बिक रहे हैं
    कुछ लोग नोट न गिनके-अपने बैंक गिन रहे हैं

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  8. 4.5/10

    आपने कुछ नया कहने की कोशिश की है..बधाई.
    यूँ भी आज का इंसान वेताल बना घूम रहा है...अपना ही शव काँधे पे लादे.

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  9. हमारी फटी मैली क़मीज में ,
    लगे बदरंग बटनों का स्थान ,
    आलपिन लेने लगी है |

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  10. राजनेताओं के लिए महंगाई का नारा चुनाव जीतने का सोपान है पर सुरसा के मुख की भांति बढती महंगाई आम जनता की कमर तोड़ रही है . सटीक लेखन के लिए शुभकामना

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  11. अच्‍छी कोशिश। सुनील भाई अगर शब्‍दों के चयन और उनकी जगह पर थोड़ा सा और ध्‍यान दें तो आपकी कहन में पैनापन आ जाएगा।

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  12. महगाई के दर्द को अच्छी तरह से अभिव्यक्त किया है आपने।
    स्व0 चकाचक बनारसी की ये पंक्तियाँ याद आ गईं..

    इहाँ अदमिन के दू जून रोटी हौ भारी
    उफ्फर परे ई दशमी दीवारी...

    अर्थात..

    एक गरीब आदमी झल्ला कर कह रहा है..

    यहाँ आदमी को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं
    भाड़ में जाय तुम्हारे त्यौहार
    दशमी या फिर दीपावली।

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  13. क्योंकि हमारी फटी मैली क़मीज में ,
    लगे बदरंग बटनों का स्थान ,
    आलपिन लेने लगी है |
    Sundar Abhivyakti. Badhai........

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  14. काश की महँगाई की तरह ही इंसानियत भी बढ जाती
    धरती आसमां की तरह हमारे दिलों की दूरियां भी घट जाती

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