शनिवार, जनवरी 22, 2011

मंच की कविता




मंचीय कवितायेँ हमेशा ,
पुलिस ,पोलिटिशियन     और पाकिस्तान की आभारी हैं |
यह भी एक इत्तफ़ाक है ,
यही तीनों हमारे देश पर भारी है |


मैं इन तीनों को रचना के माध्यम से नमन करता हूँ  |



 एक नये शहर में हम पहली बार आये
सोचा क्यों ना पुलिस की सहायता ली जाये |
हमने पूछा १६ नंबर की बस कहाँ से जाएगी ?
वह बोला क्या यह  भी आपको पुलिस बताएगी |



 टीवी में लोकसभा की कार्यवाही को देख कर  
एक दिन हमारी बच्ची ने पूछा
श्वेत वर्ण तो शांति का प्रतीक है |
फिर  यह क्यों इतना हल्ला मचा रहे है | 
फिर यह सफ़ेद कपड़े पहन कर  ,
क्या किसी मातम में जा रहे है  | 
मैंने  कहा  हाँ , यह संसद  में  जायेगे | 
वहां  लोकतंत्र  की अर्थी  को कन्धा  लगायेगे |



देख रहे थे  सुबह का अख़बार
सामने था   एक इश्तहार ,
चूहे दवाई खाकर ,
मरते है घर से बाहर जा कर ,
हमने सोचा काश !
ऐसी दवा आतंकवादियों की बना पाते |
तो सारी की सारी लाशें ,
हम पड़ोसी   मुल्क में पा जाते  |  



17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब .... तीनों ही रचनाएँ कमाल ...

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  2. बहुत ही सही कह रहे है आप...... तीनों ही बिल्कुल सटीक है. और शायद ही इन तीनों में कोई बदलाव हो................ सुंदर प्रस्तुति .
    बुलंद हौसले का दूसरा नाम : आभा खेत्रपाल

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  3. ज़बर्दस्त धमाका है सुनील जी!! आप तो बहुत सी व्यंग्य रचनाओं पर भारी पड़ रहे हैं, इसलिये लगता है आपको व्यंग्य कविता का प्रभारी बनाकर आभारी हो लें आपके.. तीनों कविताओं में कटाक्ष मारक है!!

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  4. मातमी शान्ति में है लोकतन्त्र।

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  5. बहुत ज़ोरदार व्यंग ...अच्छी हास्य कविताएँ जिनमें हास्य से ज्यादा सच्चाई है ..

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  6. शब्द नहीं है तारीफ़ के लिए, बहुत सुन्दर, बेहतरीन!

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  7. सुनील जी आई तो पहले भी थी पर किसी कारन से बिना कमेन्ट के उठाना पड़ा ......
    आपकी व्यंग की धार ने देखिये फिर बुला लिया .....
    चूहों की दवा तो काफी कारगर सिद्ध होती ....
    कुछ कीजिये ....!!

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  8. बेहद तीखा कटाक्ष करती बेहतरीन रचनाओं के लिये बधाई !

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