सोमवार, सितंबर 20, 2010

ग़लतफ़हमी



मेरी ख़ामोशी को
मेरी कमज़ोरी समझने वालों
मत भूलो कि ,
मेरे मुंह में भी जुवान रहती है |

दोस्तों के लिए
प्यार भरा धड़कता है मेरे सीने में 
और दुश्मनों के लिए ,
 मेरी कमर में हमेशा  तलवार रहती है 



20 टिप्‍पणियां:

  1. सुनील जी .... बहुत ही उम्दा ,.......बहुत ही शानदार ...
    आभार .

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  2. वाह क्या बात है....
    http://veenakesur.blogspot.com/

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  3. सुनिल जी
    सुंदर काव्य!
    पर एक ग़लतफ़हमी सी है
    "मेरी कमर हमेशा में तलवार रहती है"
    मतलब मेरी कमर में हमेशा तलवार रहती है?

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  4. भाई हंस राज जी आप अपनी जगह बिलकुल सही है यह मेरी टाइपिंग कि गलती थी जिसे मैंने अब सही कर लिया है आपको धन्यवाद

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  5. sahi kaha rehe hai aap log hamesha khamoshi ko kamjori samajhate hai. bahut sunder................

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  6. दोस्तों के लिए
    प्यार भरा धड़कता है मेरे सीने में
    और दुश्मनों के लिए ,
    मेरी कमर में हमेशा तलवार रहती है ..
    वाह! वाह! क्या खूब कहा है आपने ! बहुत सुन्दर भाव!

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  7. .

    अक्सर खामोश रहकर , लोगों की नादानियों पे मुस्कुराया जाता है ।

    .

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  8. मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  9. बहुत बढ़िया प्रस्तुति .आभार

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  10. कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

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  11. सुन्दर रचना ..

    ब्लॉग जगत पर लाने के लिए धन्यवाद

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