शुक्रवार, दिसंबर 07, 2012

आह्बान ...



चलो उठो
उठाओं फावड़े
खोदो कब्र
कुछ जिन्दा लाशों को
दफनाना हैं ।
धरती का बोझ
कुछ कम करना हैं ।




24 टिप्‍पणियां:

  1. आज हर तरफ बस जिन्दा लाशों का ही बोलबाला हैं ........खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  2. गर दबाना चाहा हर ज़िंदा लाश को तो ज़मीन कम पड़ जाएगी ....

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  3. मैं सोच रहा हूँ ... जिनको प्रेरित किया जा रहा है। जिनके लिए आह्वान है - चलो, उठो, उठाओ और खोदो जैसे एक के बाद एक आदेशात्मक शब्द ... क्या वे जन सोये हुए हैं या वे भी ज़िंदा लाश हैं? या इन शब्दों को सभी लाशों के बीच ये समझ कर बोला जा रहा है कि यदि उनमें जो कुछ अधिक ज़िंदा होंगी वो उठ खड़ी होंगी, जो केवल ज़िंदा होंगी वे दफना दी जायेंगी?

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  4. एक लघु नक़ल कविता :

    आओ
    ... इधर आओ !
    खोदो
    ... गड्ढा खोदो !
    जाओ
    ... हो जाओ !
    खड़े - उसके किनारे।
    देना है
    ... मुझे देना है।
    धक्का - तुमको ही
    देखो
    ... देखो - दिन में तारे।

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  5. गम्भीर विचार लिए हुई एक उम्दा कविता ...

    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/12/blog-post.html

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-12-2012) के चर्चा मंच-१०८८ (आइए कुछ बातें करें!) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  7. बहुत बढियां..
    इसकी जरुरत भी तो है..

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  8. बेहतरीन समायिक प्रस्तुति.....

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  9. ऐसे धरती के बोझ से धरती को हलका करने में ही भलाई है।

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  10. चलो उठो
    उठाओं फावड़े
    खोदो कब्र
    कुछ जिन्दा लाशों को
    दफनाना हैं
    धरती का बोझ
    कुछ कम करना हैं

    वाऽह ! क्या बात है !
    बहुत खूब !

    सुनील कुमार जी
    सच , हमारी छाती पर मूंग दल रहे इन धरती के बोझों को दफ़नाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है …

    पानी सिर से ऊपर जाने पर सच्चे क़लमकार का आक्रोश जागना स्वाभाविक है …
    परिवर्तन आने तक चलती रहे लेखनी अनवरत…


    शुभकामनाओं सहित…

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  11. बहुत पीड़ा छुपी है इन शब्दों में..

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  12. kya baat hai, sunil bhai! waqai aap chhupe rustam hain. aap the kahan abhi tak? aur,kahan vilupt hain aajkal?

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