शनिवार, जून 05, 2010

एक परित्यक्ता को सांत्वना

 
क्यों सहती हो ?

कल कल बहती नदी यहाँ पर
मंद पवन भी कुछ कहती है | 
फिर साँसों के रथ पर सवार हो कर,
तुम गुमशुम सी क्यों रहती हो | 
थोड़ा सा ग़म बाँट लो तू भी
तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |
तुमने उसको अपना माना,
पर उसने, उसको अपना जाना
जिसने तुमको  कुछ न माना,
क्यों उसको अपना कहती हो |
थोड़ा सा ग़म बाँट लो तुम भी
तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |
नहीं प्रेम अब एक तपस्या ,
अब तो यह व्यापार बना है |
और न तुम मीरा न वह कृष्ण , 
फिर विष का प्याला क्यों पीती हो |
थोड़ा सा ग़म बाँट लो तुम भी
तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |
जिस जीवन में बरसे प्रेम सुधा , 
तब एक प्रेम वाटिका  बन जाती है |
क्यों नागफनी के जंगल में
अब खुशबू को ढूंढा करती हो |
थोड़ा सा ग़म बाँट लो तुम भी
तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |



17 टिप्‍पणियां:

  1. क्यों नागफनी के जंगल में
    अब खुशबू को ढूंढा करती हो |

    bahut khoobsurat chitr kheencha is rachna k dwara. badhayi.

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  2. कल कल बहती नदी यहाँ पर
    मंद पवन भी कुछ कहती है |
    फिर साँसों के रथ पर सवार हो कर,
    तुम गुमशुम सी क्यों रहती हो |
    थोड़ा सा ग़म बाँट लो तू भी
    तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |
    ..........क्या बात है सुनील भाई।

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  3. बेहद खूबसूरती से भावों को उकेरा है………आपकी पोस्ट कल के चर्चा मन्च पर होगी।

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  6. सुन्दर भावाभिव्यक्ति.....रचना अच्छी लगी

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  8. शानदार और दिल को छूने वाली लेखनी लिये साधुवाद एवं शुभकामनाएँ। यदि आप चाहते हैं या आपको आपत्ति नहीं हो तो आपके ब्लॉग पर उपलब्ध सामग्री को हम १७ राज्यों के पाठकों तक पहुँचाना चाहते हैं। प्रेसपालिका पाक्षिक समाचार-पत्र के पाठकों को भी इसका लाभ होगा, लेकिन कृपया पारिश्रमिक की आशा नहीं करें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, या सरकार या अन्य बाहरी किसी भी व्यक्ति से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३०९ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६

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  9. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  10. सुंदर प्रस्तुति...
    मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 05-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



    जय हिंद जय भारत...


    मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...

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  11. शुभ प्रभात
    पसंदीदा रचना
    सादर

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